Friday, July 9, 2010


संघर्ष के बीच नित नए आयाम गढ़ने वाली गुलदी
कला-संस्कृति के क्षेत्र में गुल बर्धन का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं । ता-उम्र इस क्षेत्र में अविस्मरणीय योगदान के लिए वर्ष 2009 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा है। हालांकि यह सम्मान उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था, लेकिन देर आयद-दुरुस्त आयद।
पद्मश्री गुल बर्धन और कला की दुनिया में श्रद्धा की पात्र गुल दी का जन्म 19 नवम्बर,1928 को मुंबई में गुजराती वैश्य परिवार में हुआ।
विवाह से पूर्व उनका कुलनाम झवेरी था। उनके पिता हंसराज शाह सौराष्टÑ से कारोबार के सिलसिले में मुंबई आकर बसे थे। गुल दी ने स्रातक की शिक्षा मुंबई से हासिल की। बचपन में चंचल स्वभाव की गुल झवेरी अंग्रेजों से नफरत करती थी। उनके मन में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश था। गुल झवेरी, इंदिरा गांधी की वानर सेना का नेतृत्व मुंबई में किया करती थी, जो हिन्दुस्तान को आजाद कराने के लिए दृढ़संकल्पित थी। यह सेना स्वाधीनता संग्राम सेनानियों को खुफिया सूचनाएं पहुंचाया करती थी। 1947 में देश आजाद हुआ और गुल दी का अंग्रेजों के साथ लुका-छिपी का खेल खत्म हुआ । अब गुल झवेरी युवा अवस्था में पहुंच चुकी थी। मान्य परंपरा में नया जोड़ने की ललक उन्हें नित नए विचारों की दुनिया में ले आयी। शास्त्रीय नृत्य विद्या में कुछ नया करने के लिए वे इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) से जुड़ गर्इं और नाट्य गीतों एवं नाटकों में भाग लेने लगी। पंडित जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक डिस्कवरी आॅफ इण्डिया पर केंद्रित बैले नाटक की तैयारी के दौरान जो उदयशंकर जी के शिष्य शांति बर्धन के निर्देशन में चल रहा था तथा जिसका प्रदर्शन दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू के समक्ष किया जाना था, की रिहर्सल के दौरान गुल दी, शांति बर्धन के सान्निध्य में आई। उनके काम, विचार और धैर्य देखकर गुल दी इतनी प्रभावित हुर्इं कि तपेदिक से ग्रस्त शांति बर्धन से उन्होंने विवाह कर लिया। दोनों ने मिलकर लिटिल बैले ग्रुप की स्थापना की। कला के प्रति शांति बर्धन के अप्रतिम समर्पण से नाट्यशाला की ख्याति दुनिया में फैलने लगी। 1954 में शांति बर्धन का निधन हो गया। नाट्यशाला की सारी जिम्मेदारी गुल बर्धन पर आ गई। तब से कर्मठ गुल दी ने अपना जीवन रंग श्री लिटिल बैले ट्रूप को समर्पित कर दिया।
रंग श्री लिटिल बैले ग्रुप की स्थापना 1952 में मुंबई में हुई थी। उसके बाद क्रमश: यह ग्रुप माधवराव सिंधिया के पिता के अनुरोध पर 1964 में ग्वालियर आ गया। यहां इसे लिटिल बैले ट्रूप नाम दिया गया। ग्वालियर में कलाकारों के वर्चस्व की लड़ाई के बीच गुल दी इतनी आहत हुर्इं कि उन्होंने ग्वालियर छोड़ भोपाल को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। यहां पर भी कलाकारों द्वारा इसे तोड़ने की कोशिश की गई। लेकिन गुल दी की जीवटता इस बात का साक्ष्य है, कि आज भी दुनिया का सबसे उम्रदराज बैले ग्रुप उनके नेतृत्व में लोक परंपराओं से प्रेरणा ग्रहण करते हुए निरंतर प्रयोगशील है। यहां केरल, ओड़िसा, बंगाल और मणिपुर के कलाकार अपनी कला प्रतिभा का प्रदर्शन गुलबर्धन के नेतृत्व में कर रहे हैं। शांति बर्धन के कलाकर्म पर गुल दी ने एक पुस्तक ताल अवतार की रचना की है। यह पुस्तक नृत्यकला को समृद्ध करने की दिशा में मूल्यवान है। ताल अवतार में गुल दी लिटिल बैले ट्रूप की विशेषताओं के साथ-साथ नृत्य गुरु शांति बर्धन की अनोखी विशिष्टता का उल्लेख किया है। पुस्तक में रामायण जैसे नए नृत्य नाटकों की खोज ,जो देश का अद्वितीय श्रृंगार के रूप में जाना जाता है, का खूबसूरती से वर्णन है।
कला पर उनकी दृष्टि, नवीनता और प्रयोगधर्मिता का सम्मान करते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें 2001 में सर्वाेच्च शिखर सम्मान प्रदान किया । इसके अलावा फ्रेंच केबिनेट ने 1964 में उनकी विशिष्टताओं को रेखांकित करते हुए उन्हें सम्मानित किया। गुल दी अब तक अनेक राष्टÑीय अर्न्तराष्टÑीय पुरस्कारों ने नवाजी जा चुकी हैं। उन्हें संगीत नाटक अकादमी ने रचनात्मक नृत्य के लिए 2001 में, गुजरात संगीत नाटक अकादमी ने गौरव पुरस्कार 1979 में गुल बर्धन के नेतृत्व में रामायण बैले को यूएसएसआर का पुरस्कार 1975 में मिला। इसके अतिरिक्त गुल दी कर्इ्र फिल्मों में नृत्य प्रदर्शन कर चुकी हैं। इसमें राजकपूर निर्देशित अवारा, चेतन आनंद निर्देशित अंजलि, बलराज साहनी निर्देशित लालब?ाी, केए अ?बास निर्देशित धरती के लाल, विजय भट्ट निर्देशित समाज को बदल डालो और राम रा%य, फणी मजूमदार निर्देशित बंधन और बिमल राय निर्देशित सुजाता शामिल है। विश्व के कई देशों में लिटिल बैले ट्रूप के प्रदर्शन को प्रशंसा-पत्र प्राप्त हुए हैं। इनमें फ्रांस, हालैण्ड, मेक्सिको, चायना, नेपाल, बेल्जियम, मोरक्को, ट्यूनिसिया, ब्राजील, चिली, अरजेंटिना, यूनाईटेड किंगडम, लेबनान, बुलगारिया,जापान, थाईलैण्ड, हांगकांग, साऊथ कोरिया, पुर्तगाल, इटली तथा जर्मनी प्रमुख हैं।
राष्टÑीय,अन्तर्राष्टÑीय पुरस्कार:
1- पद्मश्री सम्मान- 2009
2- मध्यप्रदेश सरकार की ओर से शिखर सम्मान- 2001
3- संगीत नाटक अकादमी, गुजरात की ओर से गौरव पुरस्कार-1979
4- फ्रांस केबिनेट की ओर से व्यक्तिगत सम्मान- 1964
5- रामायण बैले के निर्देशक के रूप में जीआईटीआईएस,यूएसएसआर-1975
रंगश्री लिटिल बैले ट्रूप की उपल?िधयां:
अर्न्तराष्टÑीय फेस्टिवल अवार्ड
1- थिएटर नेशन- फ्रांस
2- एडिनबरो फेस्टिवल
3- हॉलैण्ड फेस्टिवल
4- मेक्सिको फेस्टिवल
टूअर अवार्ड:
1- चायना- 1955
2- नेपाल-1956
3- यूएसएसआर, जर्मनी- 1957
4- फ्रांस, बेल्जियम, हॉलैण्ड, मोरक्को, ट्यूनिसिया, ब्राजिल, चिली, अर्जेंटिना, यूनाईटेड किंगडम-1960
5- लेबनन, यूएसएसआर, बुलगारिया- 1964
6- मेक्सिको- 1968
7- इंडोनेशिया, बर्मा- 1971
8- जापान, थाईलैण्ड- 1975
9- साउथ कोरिया, थाईलैण्ड- 1975
10- बेल्जियम, ईस्ट जर्मनी, पुर्तगाल, इटली-1982
11- यूएसएसआर- 1988
12- मॉरीशस-1990
13- थाईलैण्ड- 1995
(मध्य प्रदेश महिला संदर्भ के लिए रूबी सरकार द्वारा लिखा गया है)

Thursday, July 8, 2010


मध्यप्रदेश की विशिष्ठ अवदान वाली महिलाएं, जिन्होंने
मान्य परंपरा में कुछ जोड़ते हुए नवाचारी दृष्टि विकसित की है।


चंचल चुलबुली गुड्डी से हजार चौरासी की मां तक का सफर

शुद्ध भारतीय सौंदर्य की प्रतिमूर्ति पद्मश्री जया भादुड़ी हिन्दी फिल्मों में नरगिस, मीना कुमारी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली अभिनेत्री हैं। जया भादुड़ी बच्चन का जन्म मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में 9 अप्रैल,1948 को हुआ। इंदिरा और लेखक-पत्रकार तरुण कुमार भादुड़ी की बेटी जया ने बॉलीवुड की चमक-दमक भरी दुनिया में बगैर शरीर प्रदर्शन के अपनी हैसियत बनाई और चोटी की अभिनेत्री बनी। उनकी सादगी और कला के क्षेत्र में विशिष्ठ पहचान के आधार पर समाजवादी पार्टी ने 2004 में उन्हें पार्टी की ओर से रा%ससभा में भेजा। लेकिन जया का राजनीतिक जीवन विवादों से परे नहीं रहा। हिन्दी- मराठी के मुद्दे पर राज ठाकरे से टकराव हो या नेहरू-गांधी परिवार के बारे में टिप्पणी, उनके पति अमिताभ को हर मामले में सफाई देने आगे आना पड़ा। दूसरी ओर बच्चन परिवार को समाजवादी पार्टी में लाने वाले अमर सिंह खुद पार्टी से अलग हो गए, लेकिन जया मुलायम सिंह के साथ बनी रहीं। इस बीच वे राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ के एक नेता द्वारा आयोजित नदी महोत्सव में भी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुर्इं।

हिन्दी फिल्मों में आने के पहले जया ने तीन बंगला फिल्में की थी। सत्यजीत राय की फिल्म महानगर में जया ने पहली बार कैमरे का सामना किया। उस समय वह स्कूल में पढ़ती थी। स्कूली शिक्षा पूरी कर जया ने पुणे फिल्म संस्थान से अभिनय का प्रशिक्षण लिया और ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में गुड्डी में काम किया। गुड्डी 1971 में रिलीज हुई। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान ही जया की मुलाकात अमिताभ से हुई। 1973 में जंजीर की सफलता के बाद दोनों ने विवाह कर लिया। तब तक जया स्टार बन चुकी थी और अमिताभ संघर्ष कर रहे थे। दोनों ने अभिमान, मिली, चुपके-चुपके में साथ काम किया और जया ने अपनी अभिनय क्षमता का परचम लहरा दिया। शोले तो दोनों की बाद की फिल्म है। जया ने जीतेंद्र के साथ परिचय के अलावा संजीव कुमार के साथ कई फिल्में की और सभी सफल रही। नायिका के रूप में सिलसिला उनकी आखिरी फिल्म थी। जया ने चंचल चुलबुली लड़की का रोल किया तो कभी बेहद गंभीर भूमिका भी निभाई। लेकिन दो बच्चों अभिषेक और श्वेता की मां बनने के बाद अचानक उन्होंने फिल्मों को अलविदा कह दिया। बेटे और बेटी की बेहतर परवरिश के लिए उन्होंने यह निर्णय लिया। जब बच्चे बड़े हो गए तो उन्होंने फिल्मों में फिर से प्रवेश किया। 18 साल के अंतराल के बाद अपनी नई पारी में जया ने नक्सली पृष्ठभूमि पर आधारित हजार चौरासी की मां फिल्म में यादगार भूमिका की। यह फिल्म 1998 में रिलीज हुई । 2000 में फिल्म फिजा जो मिशन कश्मीर पर आधारित थी में ऋतिक रोशन की मां की भूमिका की । इस फिल्म में उत्कृष्ट अभिनय के लिए जया को सहायक अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया था। जया अपने पति अमिताभ के साथ भी कभी खुशी कभी गम में काम किया । कल हो न हो,द्रोण और लागा चुनरी में दाग के रिलीज के बाद उनकी दूसरी पारी अभी चल रही है । बेहद साधारण चेहरा मोहरे, किंतु बेजोड़ भाव प्रदर्शन से जयाजी ने जो मुकाम हासिल किया, वह अपने आप में एक मिसाल है।
पुरस्कार, सम्मान:
1992 - भारत सरकार की ओर से चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री
1998- ओमेगा लाइफटाइम एचीवमेंट
2004-उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सर्वोच्च नागरिक सम्मान यश भारती
2004- सन्सुई लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
2004- उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलप कौन्सिल की अध्यक्ष
2004- राज्यसभा सदस्य
1974- फिल्मफेयर : सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री अभिमान के लिए
1975- फिल्मफेयर: सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री कोरा कागज के लिए
1980- फिल्मफेयर: सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री नौकर के लिए
1998- फिल्म फेयर: फिल्म उद्योग में विशेष योगदान के लिए
2001- फिल्मफेयर और जी सिने अवार्ड: सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री फिजा के लिए
2002- फिल्मफेयर: सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री कभी खुशी कभी गम के लिए
2004- फिल्मफेयर: सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री कल हो न हो के लिए
2007- फिल्मफेयर: लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड
अन्तर्राष्टÑीय भारतीय फिल्म अकादमी
2001- आई आई एफ ए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री फिजा के लिए
2002- आई आई एफ ए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री कभी खुशी कभी गम के लिए
2004- आई आई एफ ए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री कल हो न हो के लिए
2010- लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड लंदन में जीभ पर आग फिल्म फेस्टिवल में
(मध्यप्रदेश महिला संदर्भ के लिए रूबी सरकार ने लिखा है)

Wednesday, July 7, 2010


भावनाओं की कथाकार मन्नू भंडारी
मन्नू भण्डारी हिन्दी की सुविख्यात बहुपठित अत्यंत महत्वपूर्णऔर बहुत सारी भाषाओं की रचनाकार हैं। जीवन जीने, उसे संभालने और संजोने की उनकी क्षमता और उनका बेहद निजी तौर तरीका आज की पीढ़ी के लिए एक मिसाल बन सकता है।
उनका जन्म 3 अप्रैल,1931 को मध्य प्रदेश के भानपुरा गांव जिला मंदसौर में हुआ । लेकिन कार्यक्षेत्र कलक?ाा और नई दिल्ली रहा। उनके बचपन का नाम महेंद्र कुमारी था, लेखन के लिए उन्होंने मन्नू नाम का चुनाव किया। 1949 में स्रातक की पढ़ाई कलक?ाा विश्वविद्यालय से करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह वाराणसी आ गर्इं और यहीं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1952 में एम. ए. की उपाधि हासिल की।
कलात्मकता उनके समूचे व्यक्तित्व से लेकर उनके लेखन तक में व्याप्त है। अजमेर के ठेठ मारवाड़ी और संबंधों में निष्ठा रखने वाले संयुक्त एकजुट परिवार जहां लड़कियों का नौकरी करना तौहीन समझी जाती थी, वहां मन्नूजी ने स्कूल में नौकरी कर पहली सीमा लांघी।
मन्नूजी अपनी हर रचनाओं में किसी न किसी रूप में उपस्थित रहती हैं। कभी विचारों, मान्यताओं और पक्षधरता के स्तर पर, तो कभी भावना और संवेदना के स्तर पर । ‘आपका बंटी’ उपन्यास में वह बताती है कि एक औरत जब अपनी अस्मिता का संधान करने लगती है, तो सक्षम भी हो जाती है और यही बात पुरुष के लिए चुनौती बन जाती है और तभी दाम्पत्य संबंधों में तनाव पैदा होता है, जो अलगाव तक पहुंच जाता है, इस तनाव और अलगाव की त्रासदी में पिसते हैं निर्दोष बच्चे।
‘एक इंच मुस्कान’ और ‘आपका बंटी’ जैसे संवेदनशील उपन्यास की लेखिका मन्नू भण्डारी न तो अपने जीवन में और न लेखन में कोई विशेष राजनीतिक रूझान रखती है, लेकिन शासन व्यवस्था के दोहरे चरित्र ने उन जैसी मानवीय सम्वेदना रखने वाली लेखिका को सृजनात्मक रूप से इतना विचलित किया कि उन्होंने इसी मन से ‘महाभोज’ जैसे उपन्यास की रचना कर डाली, जिसे राजनैतिक उपन्यास माना जाने लगा। मन्नूजी विजुअल मीडिया की भी गहरी समझ रखती हैं।

बालीगंज सदन, कोलकाता (1952-1961) से उन्होंने अध्यापन कार्य शुरू किया। तत्पश्चात् रानी बिड़ला क ॉलेज, कोलकाता (1961-64) में अध्यापन कार्य के बाद सन् 1964 में वे मिरांडा कॉलेज,नई दिल्ली में हिन्दी की प्राध्यापक बनी और अवकाश प्राप्त करने (1991) तक कार्यरत रहीं। अवकाश प्राप्त करने के उपरांत 1992-94 तक वे उज्जैन में प्रेमचंद सृजनपीठ की निदेशक रहीं।
संयोग से उनका राजेन्द यादव से प्रेम विवाह हुआ था। विवाह के पैतीस साल बाद 1994 में राजेन्द्र जी से अलग होने के बाद ही उन्होंने अपने लिए जीना सीखा। जिंदगी के कड़वे अनुभवों और अपने निर्णय पर डटे रहने की मिसाल मन्नू जी का अकेलापन उनका अपना चुनाव है। उनका कहना है, कि जब किसी के साथ रहते हुए भी अकेले ही जीना हो, तो उस साथ के होने का भरम टूट जाना ही अ%छा होता है।
बहुमुखी प्रतिभा की धनी मन्नू भंडारी ने कहांनियां, उपन्यास, पटकथा, नाटक लिखे हैं। उनकी कहानियां कई भारतीय भाषाओं में अनुदित हुई। लेखन का संस्कार उन्हें विरासत में मिला। उनके पिता सुख सम्पतराय भी जाने माने लेखक थे। उनकी रचनाओं में ‘एक प्लेट सैलाब’ (1962),‘मैं हार गई’ (1957), ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’, ‘यही सच है’ (1966), ‘त्रिशंकु’ और ‘आंखों देखा झूठ’ उनके महत्वपूर्ण कहानी संगह हैं। विवाह वि%छेद की त्रासदी में पिस रहे एक बच्चों को केन्द्र में रखकर लिखा गया उनका उपन्यास ‘आपका बंटी’ (1971) हिन्दी के सफलतम उपन्यासों में गिना जाता है।
आपका बंटी धर्मयुग में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था। लेखक राजेन्द्र यादव के साथ लिखा गया उनका उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ (1962) पढ़े लिखे आधुनिक लोगों की एक दुखांत प्रेमकथा है, जिसका एक-एक अध्याय लेखक-द्वय ने क्रमानुसार लिखा था। ‘बिना दीवारों का घर’ (1966) शीर्षक से एक नाटक भी लिखा है।
नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार दोहरे चरित्र वाली राजनीति के बीच आम आदमी की पीड़ा और दर्द की गहराई को उद्घाटित करने वाले उनके उपन्यास ‘महाभोज’ (1979) पर आधारित नाटक अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था । इसी प्रकार ‘यही सच है’ पर आधारित ‘रजनीगंधा’ नामक फिल्म अत्यंत लोकप्रिय हुई थी और इसे 1974 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।
उनकी रचनाधर्मिता का सम्मान करते हुए हिन्दी अकादमी, दिल्ली ने उन्हें शिखर सम्मान, बिहार सरकार, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से भवभूति अलंकरण, बिरला व्यास सम्मान (2008) और उ?ार-प्रदेश हिंदी संस्थान ने अलंकृत किया।
प्रकाशित कृतियाँ:
कहानी-संग्रह : एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, तीन निगाहों की एक तस्वीर, यही सच है, त्रिशंकु, श्रेष्ठ कहानियाँ, आँखों देखा झूठ, नायक खलनायक विदूषक।
उपन्यास : आपका बंटी, महाभोज, स्वामी, एक इंच मुस्कान और कलवा, फिल्म पटकथाएँ : रजनीगंधा, निर्मला, स्वामी, दर्पण।
नाटक : बिना दीवारों का घर(1966), महाभोज का नाट्य रूपान्तरण(1983)
आत्मकथा: कहानी यह भी (2007)
प्रौढ़ शिक्षा के लिए: सवा सेर गेहूं (1993) (प्रेमचन्द की कहानी का रूपान्तरण)

Tuesday, July 6, 2010


कुशल सभा संचालन की सौम्य नेता नजमा हेपतुल्ला
डॉ. नजमा हेपतुल्ला उन राजनीतिज्ञों में से हैं, जिनका व्यक्तित्व बहुत समय तक राजनैतिक मंचों पर हलचल पैदा करता रहा है।
कहना न होगा, कि इसके पीछे उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, अध्ययन की व्यपकता और वक्तृत्व क्षमता का मुख्य योगदान रहा है। रा%यसभा उपाध्यक्ष के नाते उनका विधि सम्मत और निष्पक्ष सभा संचालन सदस्यों को बहुत प्रभावित करता रहा। इसीलिए उनकी लोकप्रियता दलीय सीमाओं को लांघते हुए सर्वव्यापी हो गई।
नजमा जी स्वाधीनता संग्राम सेनानी, शिक्षाविद् एवं आजाद भारत के प्रथम शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम की नवासी हैं। उनका जन्म 13 अप्रैल,1940 को भोपाल में हुआ । उनके पिता सैयद युसूफ अली और मां श्रीमती फातिमा युसूफ अली ने नजमाजी को बचपन से ही उच्च लक्ष्य निर्धारित करने की सीख दी। 1960 में उन्होंने मोतीलाल नेहरू विज्ञान महाविद्यालय (विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से सम्बद्ध) से एमएससी %युलॉजी प्रथम श्रेणी से उतीर्ण हुईं। विक्रम विश्वविद्यालय से उन्होंने 1962 में %युलॉजी में पीएचडी प्राप्त की। उन्हें आगरा विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की।
7 दिसम्बर,1966 को नजमाजी का निकाह श्री अकबर अली हेपतुल्ला से हुआ। आज वह तीन पुत्रियों की मां हैं।
डॉ हेपतुल्ला 1973 में कांग्रेस से जुड़ी । सौम्य और मिलनसार होने के कारण अन्तर्राष्टÑीय स्तर पर उनका प्रभाव फैलता गया। कुशल नेतृत्व और कार्यक्षमता के बल पर उन्होंने 1980 में पार्टी में युवा गतिविधियों में कई नए आयाम जोड़े। इसी वर्ष महासचिव के पद पर रहते हुए उन्होंने भारतीय राष्टÑीय छात्रसंघ के प्रभारी का दायित्व भी संभाला। 1980 में पहली बार महाराष्टÑ से वे रा%यसभा के लिए चुनी गर्इं और 2004 तक इस सदन की सदस्य रहीं। इतना ही नहीं नजमा जी 1985-86 तथा 1988 से 2004 तक लगातार रा%यसभा की उपसभापति भी निर्वाचित हुर्इं।
उपसभापति पद पर रहते हुए उन्होंने 1993 में अंतर संसदीय संघ के महिला संसदीय समूह की संस्थापक अध्यक्ष बनीं और 16 अक्टूबर ,1999 से 27 सितम्बर, 2002 तक लगातार इस समूह की अध्यक्षता करती रहीं।
डॉ. हेपतुल्ला को इस बीच भारतीय सांस्कृतिक परिषद का प्रमुख भी मनोनीत किया गया । संयुक्त राष्टÑ विकास कार्यक्रम की मानद राजदूत रहीं और उन्होंने 1997 तक संयुक्त राष्टÑ आयोग के महिला समूह के प्रतिनिधिमण्डल का नेतृत्व किया।
उनके अध्ययन और राजनीतिक उपल?िधयों की फेहरिस्त काफी लम्बी है। नजमा जी 1982-96 तक हारवर्ड विश्वविद्यालय के मिडिल ईस्टर्न स्टडीज़ में सलाहकार रहीं। वह लंदन %युलॉजिकल सोसाइटी से जुड़ी हैं। उन्होंने एड्स शीर्षक से एक पुस्तक लिखी, जिसमें मनुष्य के सामाजिक सुरक्षा,स्थायित्व, विकास, पर्यावरण, पश्चिम एशिया और भारतीय महिलाओं के सुधार पर तुलनात्मक अध्ययन जैसे विषय शामिल हैं।
मध्य एशिया से उनका विशेष संबंध रहा। वह इण्डो- अरब सोसाइटी की अध्यक्ष रही हैं। एक कुशल कूटनीतिज्ञ की तरह उन्होंने भारतीय संस्कृति और व्यापार को मध्य एशिया में नये आयाम दिए।
श्रीमती हेपतुल्ला ने 2004 में भारतीय राष्टÑीय कांग्रेस ‘आई’ छोड़कर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। कांग्रेस पार्टी छोड़ते समय उन्होंने सोनिया गांधी पर कई आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा कि उपराष्टÑपति पद के लिए वह कांग्रेस पार्टी की ओर से चुनाव लड़ना चाहती थी, लेकिन सोनियाजी का कहना था कि चूंकि राष्टÑपति पद पर डॉ. एपीजे अबुल कलाम आसीन है, दोनों उच्च संवैधानिक पदों पर अल्पसंख्यकों का होना ठीक नहीं होगा । सोनिया गांधी के इस निर्णय से वह आहत हुई और
उन्होंने संयुक्त जनतांत्रिक गठबंधन की ओर से हामिद अंसारी के खिलाफ उपराष्टÑपति का चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें मात्र 222 मत ही मिले, जबकि हामिद अंसारी को 455 मत प्राप्त हुए।
नजमा जी का सार्वजनिक जीवन निर्विवाद नहीं रहा। उन पर नवम्बर,2006 में आरोप लगा कि वे भारतीय सांस्कृतिक परिषद के अध्यक्ष पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार और आर्थिक अनियमितताएं की है। साथ ही उस समय प्रकाशित ‘जर्नी आॅफ द लीजेंड’ पुस्तक में काफी टेबल पर बैठे शाह इरान और मौलाना अबुल कलाम आजाद के बीच अपनी तस्वीर चस्पा करवाया था। सत्यता की जांच के लिए यह मामला सीबीआई को सौंपा गया था।
इसमें कोई शक नहीं है, कि नजमा जी वैश्विक सांसदों के बीच बहुत प्रभावशाली और लोकप्रिय रहीं उनके बहुत सारे लेख और शोध पत्र भारतीय और विदेशी जर्नल्स में प्रकाशित हुए। उन्होंने भारतीय और विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में महिलाएं और सामाजिक विकास से जुड़ी समसामयिक लेखन कार्य किया है। वे द इण्डियन जनरल आॅफ %युलॉजी एटोनॉमी विषयों पर प्रकाशित शोध-पत्रों की सलाहकार समिति व संपादकीय मण्डल में भी रहीं। उन्होंने त्रैमासिक पत्रिका डायलॉग टुडे 1986 में प्रारंभ की, जिसकी वह संपादक और प्रकाशक दोनों रहीं। इसके अलावा इण्डिया प्रोग्रेस साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी, कन्टीन्यूटी एण्ड चेंज 1985, इण्डो-वेस्ट एशियन रिलेशन- द नेहरू एरा 1992, रिफार्म फॉर वुमन फ्यूचर आॅफ्शन 1992, इनवॉयरमेंट प्रोडक्शन आॅफ डेवलपमेंट कंट्रीज 1993, ह्युमन सोशल सिक्युरिटी एण्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट1995, और एड्स एप्रोच टू प्रिवेन्सशंस 1996 और डेमोक्रेसी द ग्लोबल प्रोस्पेक्टिव 2004 जैसी अनेक पुस्तक लिखीं।
समाज सेवा और विज्ञान शोध में अग्रणी भूमिका निभाने वाली नजमाजी के साक्षरता, कला और विज्ञान सहित कई विषय विशेष रुचि के हैं। उन्होंने हमेशा विज्ञान संबंधी जानकारी, अन्तर्राष्टÑीय आर्थिक समन्वय, अन्तर्राष्टÑीय समझ, महिलाओं के उत्थान और उनसे संबंधित अन्य विषयों जैसे सद्भाव, मूल्यों, मानव विकास तथा पर्यावरण आदि क्षेत्रों में काम किया है, जिसे अन्तर्राष्टÑीय स्तर पर सराहा भी गया है।
उन्हें मोरक्को का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ग्राण्ड कार्डोन आफ अलवई-अल-वामस’ से मोरक्को के राजा अलालुम वाफ्मम्स ने नवाजा। इजिप्त के राष्ट्रपति हुस्त्रे मुबारक ने भी नजमा जी को अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया। सेन मेरिनो के कैप्टन रीजेंट ने लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा।
उनकी दिलचस्पी खेल में भी है। बेडमिंटन और स्क्वायश जैसे खेल उन्हें प्रिय है।नजमाजी जिमखाना क्लब दिल्ली, मुंबई प्रेसिडेंसी रेडियो क्लब, मुंबई, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली, सी रॉक होटल क्लब मुंबई, इंडिया हेबिटाट सेंटर और इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर, नई दिल्ली की सदस्य हैँ।
लिखने-पढ़ने अलावा पत्रकारिता, विभिन्न भाषाओं और विभिन्न देशों के संगीत सुनने में भी वे रुचि रखती हैं। उन्होंने पूरे विश्व की यात्रा की हैं। 4 सितम्बर, 2007 को उन्होंने अपने पति को हमेशा के लिए खो दिया। नजमा जी तीन बेटियों की मां हैं और फिलहाल राजस्थान से रा%यसभा की सदस्य हैं।
(मध्यप्रदेश महिला संदर्भ के लिए रूबी सरकार ने लिखा है)

Monday, July 5, 2010


अपनी गवाह खुद मृणाल पाण्डे

वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पाण्डे कथाकार, राजनीतिक-सामाजिक, आर्थिक

विश्लेषक के रूप में जानी जाती हैं। प्रतिगामी ताकतों के खिलाफ बेबाक कलम चलाने वाली मृणालजी वर्तमान में प्रसार भारती बोर्ड की अध्यक्ष हैं। लम्बे अर्से से कथा लेखन और पत्रकारिता से जुड़ी मृणाल पाण्डे वामा टाइम्स आॅफ इण्डिया की पत्रिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और दैनिक हिन्दुस्तान की समूह सम्पादक के अलावा एनडीटीवी और दूरदर्शन में एंकर और समाचार वाचक के पद कार्य कर चुकी हैं । पत्रकारिता के क्षेत्र में बेबाक टिप्पणियों से उन्होंने नया अध्याय रचा और दुनिया को स्त्री पक्ष से देखने के लिए विवश किया। जहां उन्होंने कचरा बीनने, स?िजयां बेचने और घरों में काम करने वाली महिलाओं के पक्ष में कई सवाल उठाए, वहीं दैनिक हिन्दुस्तान अखबार को व्यवसायिक संस्कृति भी दी। उनके पत्रकारिता जीवन की शुरुआत1984 से हुई, जब वे पहली बार वामा पत्रिका की संपादक बनीं। इससे पूर्व उनका रूझान साहित्य की ओर था। मृणाल पाण्डे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक चुनौतियों की गहराई और समग्रता से पड़ताल कर खूब लिखती हैं। टीवी पर उनकी राजनीतिक टिप्पणी और बातचीत काफी पसंद की जाती है।

मृणालजी का जन्म मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में 26 फरवरी,1946 को हुआ। लेखन का संस्कार उन्हें अपनी मां और सुविख्यात लेखिका गौरा पंत शिवानी से मिला। उनके पिता सुखदेव पंत शिक्षा विभाग, उ?ार प्रदेश में कार्यरत थे। पिता के असामयिक निधन के बाद चारों भाई-बहन मां के संरक्षण में ही पले। मृणालजी की प्रारंभिक शिक्षा नैनीताल में हुई। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। जहां उन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी साहित्य और प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विषय के साथ स्रातक की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ कारकोरन कॉलेज आॅफ आर्ट एण्ड डिजाइन, वाशिंगटन डीसी से विजुअल आर्ट की उपाधि प्राप्त की। उनकी पहली कहानी प्रतिष्ठित पत्रिका धर्मयुग में तब प्रकाशित हुई जब वे मात्र 21 वर्ष की थी।

1984 में पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखते ही पत्रकार की छवि उनकी साहित्यकार की छवि से बड़ी हो गई। शायद इसलिए अनेक रचनाओं के बाद भी उनके साहित्य का जो मूल्यांकन होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया।

हिन्दी में षटरंग पुराण उनका चर्चित उपन्यास है। जिसमें उन्होंने पीढ़ियों के अंतराल और बदलाव की विशेषता को रेखांकित किया है। उनकी कहानियां

पैनी है तथा शिल्प और भाषा की प्रयोगात्मकता इन कहानियों की विशेषता है। इनमें एकल किस्सागोई भी है, और सामूहिक हुंकार भी। मृणाल जी संभवत: अकेली ऐसी महिला पत्रकार हैं, जिसने 25 बरस लगातार संपादक की भूमिका का सर्वप्रथम निर्वाह किया हो।

महज 38 साल की आयु में 1984 में वे वामा पत्रिका की संपादक बनीं और तीन साल तक यह जिम्मेदारी निभाती रहीं। उसके बाद क्रमश: साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दैनिक हिन्दुस्तान और आगे चलकर इसी समूह से प्रकाशित होने वाली सभी हिन्दी पत्रिकाओं की वे संपादक बन गर्इं। अनेक विरोधों के बीच अंतत: 31 अगस्त,2009 को वह पद मुक्त हुर्इं और प्रसार भारती के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया। मृणालजी प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों में सक्रिय हैं। उन्होंने एनडीटीवी और दूरदर्शन में समाचार वाचन एवं एंकरिंग भी की हैं।

े अंग्रेजी में उनकी उपन्यास माई ओन विटनेस इस तय को उजागर करा है, कि किस तरह हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाई पत्रकारिता अंग्रेजी पत्रकारिता से चोट खाती है। चाहे वह प्रिन्ट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। अपने इस उपन्यास में मृणाल जी ने मीडिया की चकाचौंध के पीछे स्याह पहलू को उजागर किया है। उन्होंने अपने उपन्यास में लिखा है, कि जो सुविधाएं अंग्रेजी माध्यम के पत्रकारों को मुहैया कराई जाती हैं, उसका अंशमात्र ही

हिन्दी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओें के पत्रकारों को प्राप्त होता है।

इसी कारण प्रोत्साहन के अभाव में हिन्दी पत्रकार योग्य होते हुए भी गुणव?ाा की दृष्टि से पीछे रह जाता है। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश के साथ ही यह कथा उनके भीतर उबाल खाने लगी थी। उन्हें लगने लगा था कि अपने मानस की शांति के लिए यह कथा उन्हें कहनी ही होगी। यह आत्मकय शैली में रची गई है और उपन्यास में मीडिया के क्षेत्र में महिलाओं के प्रति होने वाले भेदभाव को रेखांकित किया गया है।

मृणालजी कई वर्षों तक महिलाओं के स्वरोजगार आयोग में सदस्य रहीं।

राजस्थान और दिल्ली रा य ने साहित्यक लेखन और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया। मृणाल पाण्डे का दखल बांग्ला, हिन्दी एवं अंग्रेजी साहित्य में बराबरी से पाया जाता है।

मृणाल पाण्डे का विवाह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और अर्थशास्त्री अरविंद पाण्डे से हुआ है। रोहिनी और राधिका के रूप में उनकी दो पुत्रियां हैं।

(यह प्रोफाइल मध्य प्रदेश संदर्भ के लिए रूबी सरकार ने लिखी है)

Friday, July 2, 2010


संगीत प्रेमी नीरजा बिरला

मध्य प्रदेश की बेटी नीरजा देश के एक सबसे बड़े और सबसे पुराने औद्योगिक घराने की बहू हैं। नीरजा का जन्म इंदौर के एक सुप्रसिद्ध औद्योगिक घराने में हुआ। उनके पिता उद्योगपति एस. के. कास्लीवाल टेक्सटाइल टायकून हैं। मात्र 18 साल की उम्र में 1989 में उनका विवाह बिरला परिवार के कुमार मंगलम (22) के साथ हो सम्पन्न हो गया। नीरजा की प्राथमिक शिक्षा केरल में हुई। आम मध्यमवर्गी लड़की की तरह उसने भी बचपन में खूब मस्ती की। रेल के दूसरे दर्जे और बस में सफर किया। लेकिन एक बड़े औद्योग घराने में विवाह होने के बाद उनकी जिंदगी ही बदल गई। सामाजिक सरोकारों और मूल्यों से उनका सीधा बास्ता हो गया। अपने ससुर आदित्य बिरला से उन्होंने सीखा कि सारे बकाया कामों को निपटाने के बाद ही अन्य मनोरंजन पर ध्यान देना चाहिए। दो पुत्री अनन्याश्री, अद्वैतिशा और एक पुत्र आर्यमान विक्रम की मां नीरजा ने अपने बच्चों की परवरिश भी इन्हीं मूल्य और संस्कारों के अनुरुप किया। उनके मन में यह बात कभी आने ही नहीं किया कि वह बड़े औद्योगिक घराने के बचे हैं।
नीरजा परिवार की सभी उ?ारदायित्व को संभालने के साथ एक महत्वपूर्ण काम यह किया कि उन्होंने बिरला परिवार को संगीत प्रेमी बना दिया। पति कुमारमंगलम और बेटा आर्यमान दोनों को उसने अच्छा गायक बना दिया। नीरजा बिरला का पूरा परिवार एक साथ बैठकर संगीत सुनता है, वह कहती हैं कि संगीत में वह अलौकिक आनंद है, जो थकान तो मिटाता ही है साथ ही मनुष्य को अध्यात्म की ऊंचाई तक ले जाता है। नीरजा ने संगीत का अत्यधिक मौलिक उपयोग कर संगीत के माध्यम से आध्यात्मिक संदेश परिवार को दिया। उन्होंने संगीत अकादमी के सहयोग से रामायण पर लघु नृत्य नाटिक ा तैयार की, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा। यह नाटिका के माध्यम से उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि मनुष्य को सदा अच्छे कर्म ही करने चाहिए। नीरजा का संगीत प्रेम सिर्फ भारतीय संगीत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह रॉक, जाज की भी प्रशंसक हैं। अपने साथ-साथ वह पूरे परिवार को संगीत सुनने के लिए प्रेरित क रती हैं। बिलट्स और आरडी वर्मन उनके पसंदीदा संगीतकार है।
खाली समय में वे वाद्ययंत्रों पर भी हाथ आजमाती हैं। संतूर उनके प्रिय वाद्ययंत्र है। उन्होंने पियानो, सितार जैसे साजों पर भी हाथ साफ किया है। उनकी दिलचस्पी नृत्यकला और गार्डनिंग में भी है।

Thursday, July 1, 2010


भाजपा का एकमात्र नारी चेहरा सुषमा स्वराज
विदिशा जिले की सांसद श्रीमती सुषमा स्वराज 15वीं लोकसभा में प्रथम महिला नेता प्रतिपक्ष जैसे प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण पद पर आसीन हैं। सबसे कम आयु में मंत्री बनने का उनका रेकार्ड आज तक कायम है। विशेष दम्पति होने का रेकार्ड भी लिम्का बुक आॅफ रेकार्ड में उनके नाम दर्ज है। उनके पति श्री कौशल स्वराज भी राजनीति से जुड़े हैं। वे रा%यसभा सदस्य तथा मिजोरम के रा%यपाल रहे हैं।
सुरुचिपूर्ण पहनावा, बड़ी-बड़ी आंखें, माथे पर बड़ी गोल लाल रंग की बिंदी, शालीन चेहरा और वक्तृत्व कला में निपुण सुषमाजी गृहस्थी और राजनीति दोनों को समान रूप से साथ लेकर चलती हैं। पार्टी ने उनकी योग्यता का मूल्यांकन कर उन्हें कई अहम जिम्मेदारियां दी है। जहां बेल्लारी में श्रीमती सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए उन्हें चुना गया था, वहीं 18 दिसम्बर, 2009 से संसद में सरकार को घेरने की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंपी गई है।
सन् 2004 में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मसले पर सुषमा ने विरोध स्वरूप सिर मुड़ाने की घोषणा कर देश को चौंका दिया था। हालांकि अब वे संसद में महिला आरक्षण के मुद्दे पर सोनिया गांधी के साथ खड़ी हैं। श्रीमती सुषमा स्वराज भाजपा की पहली ऐसी नेता हैं, जो 21 मई,2010 को स्व. राजीव गांधी की 19वीं पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देने वीरभूमि पहुंची थी और वे वहां श्रीमती गांधी, उपराष्टÑपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बैठीं भी। उनके इस अप्रत्याशित सौजन्य से सोनिया गांधी काफी प्रभावित हुर्इं।
14 फरवरी,1952 को अंबाला छावनी (हरियाणा) में सुषमा स्वराज का जन्म हुआ। अंबाला कैंट के एस डी कॉलेज से उन्होंने स्रातक की उपाधि प्राप्त की । 1973 में इसी कॉलेज से उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ वक्ता और एनसीसी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट होने का गौरव प्राप्त हुआ। कानून की पढ़ाई उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से की। कुछ समय तक उन्होंने वकालत के पेशे में भी गुजारा ।
श्रीमती इंदिरा गांधी सरकार के नीतियों के विरोध के कारण1970 में छात्रनेता के रूप में उनकी पहचान बन चुकी थी। 1977 में वे पहली बार 80 वर्षीय देवराज आनंद के खिलाफ विधानसभा चुनाव जीतकर हरियाणा सरकार में श्रममंत्री बनीं। उस समय उनकी आयु मात्र 25 वर्ष थी। उनकी यह उपल?िध उनके लम्बे सियासी सफर का पहला पड़ाव थी। 1977-82 तक हरियाणा विधानसभा सदस्य रहीं। इसके बाद 1987-90 तक सुषमा जी ने जनता पार्टी की देवीलाल सरकार में श्रम एवं रोजगार की केबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। 1980 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली और देवीलाल के नेतृत्व में संयुक्त लोकदल सरकार में शिक्षा, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री (1987-1990) बनीं। हरियाणा विधानसभा की अध्यक्ष की ओर से उन्हें लगातार तीन वर्षों तक विधानसभा में श्रेष्ठ वक्ता होने का गौरव प्राप्त हुआ।
करनाल (हरियाणा) चुनाव क्षेत्र से श्रीमती स्वराज लगातार 1980,1984 एवं 1989 में कांग्रेस प्रत्याशी चिरंजीलाल शर्मा के खिलाफ लोकसभा लड़ीं,
लेकिन तीनों ही बार वह चुनाव जीतने में असफल रहीं। 1990 और 1996 में वे रा%यसभा के लिए चुनी गईं। जल्द ही वे 11वीं लोकसभा का चुनाव दक्षिण दिल्ली से जीत कर 1996 में 13 दिन की वाजपेयी सरकार में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री बन गर्इं। इसी तरह 1998 में 12वीं लोकसभा चुनाव दोबारा जीतकर वह वाजपेयी सरकार में पुन: केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनीं। 19 मार्च से 12 अक्टूबर,1998 तक दूरसंचार मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार भी उन्हें सौंपा गया था।
13 अक्टूबर, 1998 को दिल्ली विधानसभा चुनाव का नेतृत्व करने के लिए भाजपा आलाकमान ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। हालांकि इस कुर्सी पर वे 3 दिसम्बर,1998 तक ही रह पार्इं।
1999 तक आते-आते श्रीमती स्वराज का राजनीतिक कद इतना बढ़ गया कि भाजपा ने उन्हें बेल्लारी (कर्नाटक) लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के खिलाफ प्रत्याशी बनाया। इस चुनाव में 44.7 फीसदी वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहीं, लेकिन अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज करवाने में वे सफल रहीं।
अप्रैल 2000 में श्रीमती स्वराज को उ?ाराखण्ड से रा%यसभा सदस्य बनाया गया। एक बार फिर राष्टÑीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में उन्हें बतौर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री शामिल किया गया। सितम्बर 2000 से जनवरी 2003 तक वह इस पद पर कायम रहीं। इस बार उन्हें स्वास्य एवं परिवार कल्याण तथा संसदीय कार्यमंत्री की जिम्मेदारी भी दी गई। मई 2004 में राष्टÑीय जनतांत्रिक गठबंधन के आम चुनाव हार जाने के दो साल बाद श्रीमती स्वराज को मध्यप्रदेश से न केवल रा%यसभा सदस्य बनाया गया, बल्कि उन्हें रा%यसभा में उपनेता भी बनाया । लेकिन पहले रा%यसभा, फिर लोकसभा मे जाने का अपना ही इतिहास दोहराते हुए वे 2009 का 15वीं लोकसभा चुनाव मध्यप्रदेश की विदिशा जिले से 3.89 लाख मतों से जीत गर्इं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से श्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा त्याग पत्र दिये जाने पर श्रीमती स्वराज को यह जिम्मेदारी सौंपी गई।
विश्लेषक मानते हैं, कि श्रीमती सुषमा स्वराज के राजनीतिक व्यक्तित्व को आकार अपने समय के युवा तुर्क और प्रखर समाजवादी नेता चन्द्रशेखर ने दिया। उनके इस स्वरूप को आगे बढ़ाने में जार्ज फर्नाडीज ने समर्थन दिया। हालांकि भारतीय जनता पार्टी में उन्हें अहम जिम्मेदारियां संभालने के लिए तैयार करने का श्रेय लालकृष्ण आडवाणी और राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ के के.सी. सुदर्शन को जाता है।
(मध्यप्रदेश महिला संदर्भ के लिए रूबी सरकार ने लिखा है)