Thursday, June 8, 2023

80 साल तक कोदो धान नहीं होता पुराना

 





80 साल तक कोदो धान नहीं होता पुराना
रूबी सरकार


      कटनी जिले से करीब 12 किलोमीटर दूर शहडोल के रास्ते मझगवां में मिलेट प्रसंस्करण यूनिट के लोकार्पण के दौरान तहसील बहोरीबंद ग्राम पंचायत पहरुआ निवासी सदा सिंह 40 वर्ष पुरानी 20 किलो कोदो लेकर पहुंचे थे,जिसकी इसी प्रसंस्करण मशीन से दराई कर चावल निकाला गया। उन्होने कहावत सुनाकर बताया कि लकड़ी मंे सरई सागौन और अन्न में राना मतलब कोदो 80 साल तक पुराना नहीं होता। कोदो के फायदों के संबंध में बताया कि इसको खाने से शुगर की बीमारी नहीं होती, साथ ही शीत एवं जुकाम की समस्या भी नहीं रहती है।
सदा सिंह गोंड आदिवासी किसान है। उसके पास करीब 5 एकड़ कृषि भूमि है, जिसमें वह कोदो की खेती सदियों से करता रहा है। सदा सिंह के पास बीज भी भरपूर है। जिसे वह समय-समय पर किसानों को देता रहा है। अब चूंकि भारत सरकार मोटे अनाज की खेती को प्रोत्साहन देने लगा है, इसलिए सदा सिंह खुशी से फूले नहीं समा रहा है। प्रसंस्करण के लोकार्पण के लिए पहुंचे कलेक्टर अभि प्रसाद ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। मोटे अनाज वाली फसलों जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, सावा, कोदो, कुटकी आदि को मिलेट क्रॉप कहा जाता है। इनमें अधिक पोषक तत्व होने की वजह से इन्हे इन्हे सुपर फूड माना जाता है। वहीं मानव जीवन विकास समिति के  सचिव निर्भय सिंह ने कहा कि इस प्रसंस्करण यूनिट से क्षेत्रीय किसानों को अपने उत्पादों का प्रसंस्करण करने की सुविधा मिलेगी और वे अपने उत्पादों का बाजार में उचित मूल्य पर विक्रय भी कर सकेंगे इससे कटनी को एक नई पहचान मिलेगी।
दरअसल ढाई लाख रुपए की यह प्रसंस्करण मषीन कृषि से सम्बद्ध आत्मा विभाग ने मिलेट अभियान को बढ़ावा देने के लिए मुफ्त में उपलब्ध करवाया है, जिससे कोदो की दराई में किसानों को कोई परेशानी न हो। मानव जीवन विकास समिति के सचिव निर्भय सिंह ने बताया  कि इस साल करीब 100 किसानों को उत्पादन के लिए कोदो का बीज दिया गया था, जिसमें करीब 60 फीसदी से अधिक किसान कोदो की खेती में सफल रहे। निर्भय सिंह ने बताया कि ढाई किलो कोदो की दराई के बाद करीब एक किलो चावल निकलता है। इसलिए छोटे किसानों के लिए यह महंगा सौदा है। यह देख आत्मा विभाग ने मुफ्त में प्रसंस्करण मशीन उपलब्ध करवाया है , इतना ही नहीं,इसकी पैकेजिंग की व्यवस्था मानव जीवन विकास समिति और बाजार तक चावल पहुंचाने के लिए बेंगलुरु की एनएक्सथ्रीएफ कंपनी से मुफ्त में इलेक्ट्रिक ऑटो उपलब्ध करवाया है। यह कंपनी रसायन मुक्त खेती करने वाले किसानों को बढ़ावा देता है। इस तरह किसानों को कोदो का प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बाजार तक इसे पहुंचाने का वाहन सब कुछ मुफ्त में मिल रहा है, जिससे किसानों पर आर्थिक बोझ कम हो रहा है।
निर्भय सिंह बताते हैं कि इस साल मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए मानव जीवन विकास समिति ने कटनी जिले के भीमरखेड़ा, तेंदूखेड़ा, जबेरा और बड़वारा विकास खंडों के 1200 किसानों को मुफ्त कोदो बीज उपलब्ध करवा कर दो हजार एकड़ में  कोदो की खेती करने का लक्ष्य रखा है। इसमें कृषि विभाग व कृषि विज्ञान केंद्र का सहयोग रहेगा। कृषि विभाग 200 किसानों को तो कृषि विज्ञान केंद्र 5 किसानों को मुफ्त में बीज देने का आश्वासन दिया है। 700 किसानों के पास बीज पहले से ही उपलब्ध है, शेष बचे किसानों को मानव जीवन विकास समिति बीज देकर सहयोग करने का संकल्प लिया है। निर्भय ने बताया पहले बाजार में कोदो चावल की कीमत 20 से 25 रुपए प्रति किलो रहा, अब यह बढ़कर 30 से 35 रुपए प्रति किलो हो गया है। उन्होंने कहा कि मोटे अनाज के लिए हमारी समिति युद्धस्तर पर काम कर रही है और इसमें सभी का सहयोग भी मिल रहा है। क्योंकि किसानों के लिए अभी भी मोटे अनाज की खेती बहुत महंगा है, वे इसी तरफ तभी जाएंगे जब उन्हें बाजार में भाव मिलने लगेगा। समिति अब धीरे-धीरे मध्यमवर्गीय लोगों तक कोदो चावल आसानी से पहुंचाने दिशा में काम कर रहा है। जलवायु की परिस्थितियों में मोटे अनाज के पोषण और स्वास्थ्य लाभ एवं खेती के लिए उपयुक्तता के बारे में जागरूकता और बढ़ाना है।  
गौरतलब है कि कोदो एक प्राचीन औषधीय मोटा अनाज है, इसके औषधीय गुणों के कारण ही इसे सुपर फूड, शुगर फ्री चावल, ऋषि अन्न, अकाल भोजन नामों से पुकारा जाता है। करीब 3000 हजार  साल पहले से यह भारत के विभिन्न भागों में उगाया जाता रहा है। लेकिन धीरे-धीरे किसान रसायन युक्त खेती की तरफ बढ़ने लगे और यह औषधीय मोटा अनाज लोगों की थाली से बाहर होता चला गया



तनाव मुक्त रखने युवाओं के प्रतिभा को बढ़ावा देना होगा

 





तनाव मुक्त रखने युवाओं के प्रतिभा को बढ़ावा देना होगा
रूबी सरकार

कोरोना संक्रमण के दौरान और उसके बाद का समय हर आयु वर्ग के लिए तनाव भरा है। युवाओं के सामने बेरोजगारी, पढ़ाई, विश्वविद्यालयों में दाखिला, मनपसंद विषय बहुत सारी समस्याएं हैं, जिसे वह किसी से साझा नहीं कर पाते।  वे अंदर ही अंदर घुटते रहते थे, जो उनके सेहत के लिए हानिकारक है। इससे अलग उन्हें खुद नहीं पता होता है कि उनमें कौन सी छिपी प्रतिभा है, जिसे वह भविष्य में अपना करियर बना सकते हैं। इसी छिपी प्रतिभा को उभारने के लिए विश्वविद्यालयों में प्रतिभा खोज प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है।माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की पत्रकारिता विभाग से मास्टर्स कर रही 22 वर्षीय रिसिका रघुवंशी ऐसी ही एक छात्रा है। जिन्हें विश्वविद्यालय ने प्रतिभा खोज प्रतियोगिता में मंच मिला और उसने अपने हुनर से लोगों को परिचित करवाया। शिक्षिका डॉ राखी तिवारी की भी इसमें अहम भूमिका रही। रिसिका स्वास्थ्य संसद में चित्रकला प्रतियोगिता में अव्वल रहीं। साथ ही प्रतिभा प्रतियोगिता में रंगोली और अन्य विधाओं में अपना हुनर दिखाया। रिसिका सिर्फ पढ़ाई में ही दूसरे विद्यार्थियों से बेहतर नहीं है, बल्कि पढ़ाई के अलावा वह अपने भविष्य के सपने भी बुनती है। रिसिका कहती है कि उसे खुद नहीं पता था  िक उसके भीतर एक कलाकार है। जिसे उसे दिशा देनी है।
दरअसल वह  कोरोना संक्रमण का दौर था यानी 2020 । पूरे देश में घरबंदी थी , दुनिया निराशा में जी रही थी । टीवी देखना या समाचार सुनने से लोगों का मन भारी हो जाता था। तनाव से उबरने को कोई रास्ता लोगों को समझ में नहीं आ रहा था। ऐसे में छिंदवाड़ा जिले की एक किसान की बेटी अपने परिवार को उदास देखकर उनके चेहरे में उम्मीद जगाने के लिए पूरे परिवार का कैनवास पर प्रतिकृति बनाने लगती है। जिसे देखकर माता-पिता उम्मीद से भर जाते हैं। उन्हें लगता है कि इसे तो फाइन आर्ट्स की पढ़ाई करनी थी। रिसिका ने इससे पहले कभी कोई प्रतिकृति नहीं बनाई थी। न ही कोई विधिवत इसकी षिक्षा ली थी। सिर्फ तनाव दूर करने के लिए उसने लोगों की तस्वीर देखकर उसे कैनवास पर उतारती और उसमें रंग भरने लगती। पहला कैनवास मां, मौसी के साथ रिसिका खड़ी हुई दिखती है। जिसे मां ने सोशल नेटवर्किंग साइट में आईकॉन बनाया। फिर क्या था , परिचित तारीफों की बरसात करने लगे। उसे प्रोत्साहन मिलने लगा और वह आगे बढ़ती गई।
उसे अकेले में बैठकर पेंटिंग बनाते देख उसका इकलौता भाई भी उसका साथ देने लगा। फिर तो पता ही नहीं चला कि कब कोरोना का खौफ निकल गया।  मात्र दो साल के भीतर वह इतनी मंझ गई कि अब बैठे-बैठे 5 मिनट में किसी की भी प्रतिकृति (पोर्ट्रेट) बना लेती है।  जिसमें नाक, कान, ऑख न होते हुए भी लोग उसे आसानी से पहचान लेते हैं।  अब तक वह सैकड़ों प्रतिकृति बना चुकी हैं।
रिसिका कहती है कि मुझे दरअसल कार्टूनिस्ट बनना था,मैं पत्रकारिता की पढ़ाई ही इसलिए कर रही हूं। मेरी दिषा बदल सकती है, क्योंकि मेरे पास फेब्रिक कलर से बैग, मैटेरियल और साड़ियों के लिए ऑफर आने लगे। संभवतः मैं आगे चलकर ग्राफिक्स डिजाइनर बनूं। मैं अब अपनी कला को प्रोफेशन का रूप देने के लिए इसी विधा में पढ़ाई करना चाहूंगी, ताकि मैं अपने साथ-साथ दूसरे युवाओं को भी जोड़ सकूं। उसने कहा, मेरी कला को पहचान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने दी। मैंने प्रतिभा प्रतियोगिता में भाग लिया। स्वास्थ्य संसद में पेंटिंग बनाई, जिसके लिए मुझे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । इससे मेरा मनोबल बढा। अब तक तो एक्रेलिक रंगों से पोट््रेट तैयार करती थी। अब मैं वॉटर, फेब्रिक आदि कलर्स का इस्तेमाल कर अन्य विधाओं में भी हाथ अजमाउंगी। यही मेरा स्वंय का स्कील्ड है, मैं इसे और विस्तार दूंगी।
ताज्जुब यह है कि रिसिका ने कभी सुव्यवस्थित कला शिक्षा नहीं लिया, न ही किसी गुरु से दीक्षा ली। स्वयं के प्रयास से इतने सधे हुए हाथों से प्रतिकृति  की लंबी श्रृंखला तैयार करना कोई मामूली बात नहीं है। वह अभी कला की उठा-पटक, विचार की दुनिया से अंजान है। उसके पोट््रेट में मासूमियत साफ झलकती है। उसमें ठहराव है। वह शोर से दूर रहना पसंद करती है । वह जितनी बेहतर कलाकार है उतनी अच्छी विद्यार्थी भी है। रिसिका को कला के प्रोफेशन में कदम रखने के लिए चित्रण का पाठ, अवधारणा, प्रक्रिया की सजावट, दृश्य व्याख्या सब सिखना होगा। रिसिका का मानना है कि हर बच्चों में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होता है। उसे आकार देना अभिभावक व शिक्षकों का काम है। इससे बच्चा हमेशा तनाव मुक्त रहेगा और  उसे गलत दिशा में जाने से भी बचाया जा सकता है।
कला में बहुत संभावना है । बैग और कपड़ों के अलावा भी पोस्टर, फलायर्स, पत्रिकाओं, पुस्तकों, ष्षक्षिण सामग्री, एनीमेशन, वीडियो गेम में एकीकरण, फिल्म, वेबसाइट और ऐप्स को अधिक उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाने के लिए भी इस तरह के डिजाइन किया जाता है । दरअसल चित्रण का अर्थ ही है उदाहरण प्रस्तुत करना या तो लिखित रूप में हो या फिर चित्र के रूप में। अब लोगों के पास समय कम है, इसलिए वे पढ़ने की अपेक्षा देखना अधिक पसंद करते हैं।  



मासिक धर्म- अनगिनत अंधविश्वास व पुरानी सोच से मुक्त होने की बारी

 


मासिक धर्म- अनगिनत अंधविश्वास व पुरानी सोच से मुक्त होने की बारी

रूबी सरकार


मासिक धर्म एक ऐसा विषय है, जिसके ग्रामीण इलाकों में अनगिनत अंधविश्वास और पुरानी सोच जुड़ी हुई है। सामाजिक प्रतिबंध के कारण यहां ऐसे विषयों पर बात करना भी पाप माना जाता है, जिस वजह से महिलाएं सही जानकारी के अभाव में बीमारियों का शिकार हो जाती हैं और उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

माहवारी के समय किशोरियों के साथ-साथ गरीब महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना काफी आवश्यक है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (2015-2016) की रिपोर्ट की मानें तो ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत महिलाएं सेनेटरी नैपकिन (पैड) का उपयोग करती हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में 77.5 प्रतिशत महिलाएं इसका इस्तेमाल करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सैनिटरी नैपकिन को लेकर उम्रदराज महिलाओं की सोच रूढ़ियों से भरी पड़ी है। वे अपने बीच भी माहवारी के संबंध में बात करने से सकुचाती हैं। अंदरूनी अंगों की स्वच्छता के प्रति शर्म महसूस करती हैं। नतीजतन घर की किशोरियां भी खुलकर बातें करने में गुरेज करती हैं।

अब इस संबंध में मध्यप्रदेश के सुदूर इलाकों के दस्तक किशोरियों निजी संस्थाओं के सहयोग से ग्रामीणों को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। ग्रामीण आदिवासी व पिछड़ी जाति की किशोरियों ने ग्रामीण किशोरियों को मेंस्ट्रुअल कप के इस्तेमाल के बारे में बता रही हैं, जो अन्य सेनेटरी पैड की अपेक्षा महंगा तो है, परंतु इसे साफ कर कई वर्षों तक इसके उपयोग किया जा सकता है। इस कप को भोपाल की एक संस्था विकास संवाद ग्रामीण किशोरियों को निशुल्क उपलब्ध करा रही है। इसे इस्तेमाल करने के बाद किशोरियों ने बताया कि यह बेहद आसान, सुरक्षित और हाईजिन है।
विकास संवाद से जुड़े राकेश मालवीय ने बताया कि दरअसल दस्तक परियोजना के तहत मध्यप्रदेश के छोटे शहर रीवा, सतना, उमरिया जैसे आदिवासी और अनुसूचित जाति की आबादी वाले क्षेत्रों में संस्था ने जब काम करना शुरू किया था। तभी माहवारी को लेकर बहुत सी भ्रांतियां देखा गया। यहां तक कि इसे ग्रामीण इलाकों में एक बीमारी की तरह देखा जाता है। किशोरियों को माहवारी होने पर उसे अलग-थलग छिपाकर अंधेरे कमरे में रखा जाता है, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इन क्षेत्रों में ज्यादातर किशोरियों की पढ़ाई मासिक धर्म के बाद छूट जाती है। इस विषय पर किशोरियां खुलकर बात नहीं कर पातीं। संस्था ने सबसे पहले किशोरियों को इस मुद्दे पर बात करना सिखाया। धीरे-धीरे संस्था की प्रेरणा से किशोरियां सहज होकर बात करने लगी, तभी उन्हें मेंस्ट्रुअल कप के इस्तेमाल के बारे में बताया गया । मासिक धर्म जैसे विषय पर सुदूर ग्रामीण इलाकों में जाकर  किशोरियों से बात करना एक चुनौती भरा काम है। लेकिन अंजलि के सहयोग से यह थोड़ा आसान हो गया।
मझगवां विकासखंड,  सतना की पूजा चौधरी बताती है कि यह कप महंगा जरूर है, पर सुरक्षित है। फिलहाल तो यह विकास संवाद की तरफ से उपलब्ध कराया गया है। इसे बार-बार धोकर 10 साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह देखा जाए तो बहुत महंगा नहीं है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसके उपयोग से दर्द में कमी आई है। ष्षुरू में अजीब जरूर लगा, परंतु अब सामान्य लगने लगा। माहवारी को लेकर ग्रामीण किशोरियां अब खुलकर बात करती है। आपस में एक-दूसरे से अपनी तकलीफ बताती है। इससे समाधान भी आसान हो गया। घर के बड़े बुजुर्ग भी अब इस विषय पर चर्चा करने लगे हैं।
सतना की ही तेलईचुआ विकास खंड की निशा और चौरेही की शालू की राय भी पूजा से मिलती-जुलती है। दोनों ने कहा कि पहले की अपेक्षा गांव में झिझक कम हुई है। पहले तो महिलाओं को पीरियड क्यों होता है और कैसे होता है? इस विषय से ही ग्रामीण महिलाएं और किशोरियां अनजान थी। गांव में तो इस विषय पर बात करना अच्छा नहीं माना जाता था। किसी भी किशोरी को इससे जुड़े सवाल पूछने की मनाही है। यहां तक कि वह घर की महिलाओं से भी यह प्रश्न नहीं पूछ सकती है।
मंदिरों में प्रवेश और यहां तक कि पूजन सामग्री को छूना भी पाप है। इस प्रथा को सही ठहराते हुए रीवा जिले की रागिनी कहती है्रं कि महिलाएं उस दौरान अशुद्ध होती हैं, जिन्हें हरेक चीजों से अलग रहना होता है। खाने की वस्तु भी नहीं छूनी चाहिए। जब उससे पैड्स के बारे में पूछा गया तो उसने कहा कि गांव में आज भी अधिकतर महिलाएं इसे नाली या को शौचालय की फ्लष में प्रवाहित कर देती है।

उमरिया जिले की नगीना कहती हैं कि पहले तो यहां तक कहा जाता था कि  मासिक धर्म के दौरान श्रृंगार की वस्तु छूने से भी वो खराब हो जाती है। यहां की कई महिलाओं की बीच ऐसी मान्यता है कि मासिक धर्म के दौरान नहाने से गर्भाशय में पानी चला जाता है और जान का खतरा हो जाता है, इसलिए इस दौरान गांव की कई महिलाएं और किशोरियां नहाती नहीं हैं।

उमरिया जिले की बाजाकुंड विकास खंड की सरस्वती बताती है कि  गांव में लड़कियों को माहवारी के बारे में कुछ नहीं बताया जाता है, क्योंकि यह बात करने का विषय नहीं है। बच्चों और पुरुषों के बीच तो यह बातें करना भी गुनाह है। माहवारी के दौरान कामकाजी महिलाओं को खेतों में काम करने जाने नहीं दिया जाता है और पैसों की तंगी के कारण कोई जाए तो उन्हें भगा दिया जाता है।
मध्य प्रदेश में आंगनबाड़ी की सेविकाओं को किशोरियों और महिलाओं बीच जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी दी जाती है। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि माहवारी महिलाओं के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। इसमें सृष्टि के निर्माण के बीज होते हैं, जिन्हें पीरियड नहीं आता है, वे ना जाने कितने डॉक्टर के पास इलाज के लिए भटकती रहती हैं। मंदिर और ओझा-गुणी के पास जाकर झाड़-फूंक करने में हजारों रुपए खर्च करती हैं।
दूसरी ओर इस दौरान स्वच्छता का ध्यान न रखने और सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल नहीं करने से महिलाओं और किशोरियों को कई तरह की बीमारियों का सामना भी करना पड़ता है। खासकर ग्रामीण महिलाएं और किशोरियां माहवारी के समय स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं होती हैं। मजदूरी करने वाली बहुत सी महिलाओं के पास इतने पैसे भी नहीं होते कि वह ऐसे समय में सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल कर सके।लेकिन इन जिलों में विकास संवाद की ओर से मेंस्ट्रुअल कप उपलब्ध कराए जाने से उन दिनों में किशोरियां हर काम आसानी से कर लेती है।



Saturday, July 11, 2020

आत्मनिर्भर भारत में कराहते ग्रामीण

रूबी सरकार
बड़ा़ मलहरा विकास खण्ड (जिला. छतरपुर) का छोटा सा गांव बरेठी । वंशकार और अहिरवार समुदाय के लगभग तीन सौ परिवार यहां रहते हैं।  इस गांव में सौ फीसदी पलायन है, जो हरियाणा, पंजाब और दिल्ली शहर में जाकर चौकीदारी, निर्माण कार्य आदि में लगे थे।  ये सभी कोविड-19 की वैश्विक महावारी के कठिन वक्त में तीन-तीन दिन पैदल चलकर या  ट ªªक,  बस आदि पर लदकर अपने गांव पहुंचे। अब बाघ की तरह घात लगाये इनके दरवाजे पर भूख खड़ी है। सरकार के प्रबंध विहीन नीति से इनका पेट नहीं भर रहा है।
 इसी गांव का रहने वाला कालीचरण चिलचिलाती धूप में दरवाजे पर बैठकर सूपा बना रहा था। परिवार का कोई सदस्य इनका साथ नहीं दे रहे थे। कालीचरण ने बताया,  िक इस बस्ती में अधिकांष वंशकार हैं और इस समय किसी के पास कोई काम नहीं है। यहां लोगों के पास खेती भी नहीं है।  क्या करें, कैसे जीये, हमें यह बताने वाला भी कोई नहीं है। उसने बताया, कि वंषकारों के पास बांस से कलाकृति बनाने का जो हुनर था, वह सब पलायन के चलते खत्म हो चुका हैं। हमारे जैसे एक-आध बुजुर्ग ही होंगे, जो अभी तक इस हुनर को जिंदा रखे हैं। शाम को इसे बाजार में बेचकर दस-बीस रूपये कमा लेते हैं। कालीचरण किसानों से महंगे दामों पर बांस खरीद कर लाता हैं, फिर उससे सूपा, टोकरी आदि बनाता है। इसे बेचने के बाद वह किसान को बांस का पैसा वापस करता है।
  50 वर्षीय सुम्माबाई कहती है, कि कभी इतने सारे लोग गांव में इकट्ठा नहीं हुए। सब दिनभर इकट्ठे होकर पेड़ के नीचे बैठे रहते हैं। सामाजिक दूरी का यहां कोई मायने नहीं है। पानी के लिए यहां लोग तरस रहे हैं। तीन सौ परिवारों के लिए एक हैण्डपम्प है। वह भी गांव की जल सहेलियों के प्रयास से संभव हो पाया है। जरूरत पड़ने पर जल सहेलियां स्वयं इसकी मरम्मत भी कर लेती हैं। चूंकि पलायन करने वाले सभी सदस्य इस समय गांव में है। इसलिए पानी का संकट और गहरा गया है। ऐसे में बार-बार हाथ धोने की बात इनसे कौन करे, जब इनके पास पीने के लिए पानी नहीं है ।

लीला अहिरवार पति और 5 बच्चों के साथ हरियाणा से गांव लौटी हैं। वह वहां पति के साथ टाइल्स का काम कर रही थी। वह कहती है, चलते-चलते रास्ते में उसका चप्पल टूट गया था। उसे नंगे पांव चलना पड़ा। पैर में छाले पड़ गये। रास्ते में उसके पैसे भी खत्म हो गये। गांव पहुंचे तो खाली हाथ। वह बताती है, सरकार ने दावे बहुत किये थे, लेकिन गांव में काम अभी तक नहीं मिला। उल्टे जो राषन मिला, उसमें कर्मचारी कटौती कर लेते हैं। जबकि सरकार की ओर से दावा किया गया था, कि अपने-अपने गांव लौटे सभी प्रवासी मजदूरों का उनके हुनर के हिसाब से पंजीयन होगा। उन्हें सरकार की ओर से प्रशिक्षण दिया जायेगां । जिससे वे स्वयं और गांव को आत्मनिर्भर बनायेे। यह भी कहा गया, कि  पलायन रोकने के लिए  महात्मा गांधी राष्ट्रªªªीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदुरों को  काम मिलेगा। काम तो दूर, अभी तक गांव में किसी का श्रमिक पंजीयन ही नहीं हुआ है । पहले पंजीयन होगा, फिर कौषल के अनुरूप काम मिलेगा। हालांकि पंजीयन न होने वालों में केवल बरेठी के मजदूर नहीं है, बल्कि बड़ा मलहरा के भगुवां, चौधरीखेड़ा और सपलपट्टी जैसे असंख्य गांव है, जहां मजदूरों का पंजीयन नहीं हुआ है। इधर सरकार दावा कर रही है, कि मध्यप्रदेश ने कुल 17 लाख 10 हजार ,186 मजदूरों को सर्वे में चिन्हित किया है। सरकार का दावा है, कि मध्यप्रदेश पहला राज्य हैं, जिसने प्रवासी मजदूरों का प्रामाणिक सर्वे पूरा किया है। बरेठी में अधिकतर लोगों के पास जॉब कार्ड नहीं है। 40 वर्षीय बलदेव ने बताया, कि गांव के सभी लोगों का जॉब कार्ड सरपंच ने अपने पास रखवा लिया है । कई साल पहले उन्होंने हमसे जॉब कार्ड ले लिया था, फिर वापस नहीं किया। 28 वर्षीय रमेश ने बताया, वह हरियाणा में चौकीदारी करता है और हालात सुधरने के बाद वह वापस जाना चाहता है।  वजह गिनाते हुए उसने कहा, यहां सामंती प्रथा आज भी जिंदा है। सामंतों के सामने न हम बैठ सकते हैं, न चप्पल पहनकर उनके सामने से गुजर सकते हैं। अगर उनकी बात नहीं मानी, तो वे सबके सामने बुरी तरह मारते हैं। हमें सबके सामने दबंगों ने बहुत मारा । समुदाय में किसी के पास इतनी हिम्मत नहीं है,  िकवे आगे आकर हमें पीटने से रोक सके। इससे तो अच्छा है, कि शहर में पन्नी का घर बनाकर रहे। इसके अलावा यहां काम भी नहीं है। गुजारा कैसे होगा।

परमार्थ समाज सेवी संगठन के सचिव संजय सिंह बताते हैं, कि किसी तरह मजदूर गांव तो पहुंच गये, लेकिन अब इन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए काम की आवश्यकता है। ताकि वे अपना पेट भर सकें। वर्तमान में निहायत ही खराब परिस्थितियों में ये अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अभी सरकार को ग्रामीण अर्थव्यवस्था को किसी तरह पुनर्जीवित करना होगा।  
आंकड़ों के मुताबिक बुंदेलखण्ड के जिलों से जितना पलायन है। उनमें सबसे ज्यादा छतरपुर जिले से है। लगभग 80 फीसदी ग्रामीण परिवारों कां कम से कम एक सदस्य पलायन पर जाता है।  
                                                                                  
कोविड-19- संकटकाल में महिला समूहों ने बनाई नई पहचान  





रूबी सरकार
मध्य प्रदेश में खाद्य और पोषण सुरक्षा में लचीलापन लाने के उद्देश्य से गैर-लाभकारी संगठनों के साथ मिलकर सामुदायिक पोषण वाटिका कार्यक्रम शुरू किया गया ।  कार्यक्रम के अनुसार ग्रामसभा की खाली पड़ी भूमि चिन्हित कर उसे ग्रामीण महिलाओं को लीज पर दे दी जाती है और महिलाएं स्वयं सेवी संगठनों की मदद से उस पर सब्जियां और फल उगाती है। इसके बाद तैयार सब्जी -फलों  को बाजार में बेचती हैं,। इसके लाभंाष का  2 फीसदी हिस्सा ग्रामसभा के पास जाता हैं। चूंकि बुंदेलखण्ड का छतरपुर जिला बहुत पिछड़ा है और यहां के लगभग 42 फीसदी बच्चे कुपाेिषत है तथा 6 से 59 माह तक के 66 फीसदी बच्चे एनिमिक है। इसलिए सरकार ने इस कार्यक्रम की शुरूआत इसी जिले से की है। यहां लगभग 70 फीसदी पलायन है। इस कार्यक्रम से जुड़ने के लिए महिलाओं ने सबसे पहले 12-12 की संख्या में एक-एक समूह बनाया। रगोली गांव की कुराबाई बताती हैं, कि ग्रामसभा की चिन्हित एक हेक्टेअर भूमि उनके समूह ने लीज पर ली। बंजर और  ऊबड़-खाबड़ भूमि को समूह ने अपने श्रम से समतल किया, उसे उपजाऊ बनाया। इस काम में समूह की मदद स्वयं सेवी संगठन परमार्थ समाज सेवी संस्थान ने किया।  संस्थान ने पोषण वाटिका बनाने के लिए सर्वप्रथम महिलाओं के साथ गांव में बैठक की। उन्हें पोषण वाटिका क्या है, क्यों आवश्यक है तथा इसे कैसे बनाया जा सकता है और इससे क्या लाभ हैं इन पर उनके साथ चर्चा की और उन्हें निःशुल्क तौरई, लौकी, कद्दू, भिंडी, सेम, पालक, करेला व टमाटर, आलू,  प्याज, मेथी, बथुआ, चौलाई, मूली, गाजर, शलजम, शिमला मिर्च, बैंगन, मिर्च तथा काशीफल आदि का जैविक बीज उपलब्ध कराया । साथ ही उन्हें नींबू,आंवला,अनार,पपीता,फालसा,जामुन, अमरुद,सहजन के वृक्ष लगाने की सलाह दी। मात्र 6 महीने में ही इनके खेत फल और सब्जियों से लहलहाने लगे। इससे एक ओर तो यहां की महिलाएं पोषण विविधता के महत्व कोे जान पायी,, दूसरी तरफ वे अपने परिवार को स्वस्थ रखने के प्रति भी जागरूक हुईं।
परिवार के साथ पलायन करने वाली इसी गांव की मनीषा कुश्वाहा बताती हैं, कि हमें यह मालूम था, कि पररदेस- हमेशा परदेस ही होता है, वह कभी अपनी भूमि, अपनी माटी का सुकून नहीं दे सकता । इसलिए जब मध्यप्रदेश सरकार ने इस कार्यक्रम की घोषण की, तो  हमलोग आगे आये। सरकार ने बतौर पायलट प्रोजेक्ट  छतरपुर जिले के  रगोली, रतनपुर, विजयपुर, डारगुंआ, अमरपुर और नारायणपुरा गांव को चुना  और सभी समूहों को लगभग एक हेक्टेअर भूमि उपलब्ध कराया।  रामकुंवर कहती हैं, कि पहले इन गांवों में कुपोषित बच्चों की संख्या अधिक था।  हरी और ताजी सब्जी के सेवन से इनकी संख्या घटी है। साथ ही गर्भवती और धात्री महिलाओं को हरी सब्जी उनके आहार के लिए कारगर सिद्ध हुई। समूह की महिलाएं अब जैविक का महत्व समझ चुकी हैं। सरोज साहू बताती हैं, कि अपने घर के लोगों को स्वस्थ रखने के लिए पोषण वाटिका की जैविक सब्जी खिला रही हैं।
पुष्पा मिश्रा कहती हैं, कि इससे हमें आमदनी भी हो जाती है, साथ ही एक हफ्ते में तीन से चार सौ रुपए घर में सब्जियों में खर्च हो जाते थे, वो भी बचत हो जाती है। हम जैविक तरीके से ही खेती करते हैं, जिससे बीमारियां भी नहीं होती हैं। पोषण वाटिका से प्रत्येक परिवार को एक हजार से डेढ़ हजार रूपए की मासिक बचत हो रही है। महिलाओं के आहार में सभी प्रकार के विटामिन मिल रहा है और उनके हीमोग्लोबिन में भी अपेक्षाकृत बढ़ोत्तरी हुई है।


इस वक्त इनका जिक्र इसलिए हो रहा है, क्योंकि कोविड-19 संक्रमण में इन महिला समूहों ने उल्लेखनीय कार्य कर अपनी नई पहचान बनाई है। इन महिलाओं को पहली बार एहसास हुआ, कि वे आत्मनिर्भर हैं।  अचानक लॉकडाउन हो जाने से लाखों की संख्या में मजदूर शहर से गांव वापस आये । गाइडलाइन के अनुसार उन्हें सीधे गांव में प्रवेष न देते हुए गांव की सीमा पर ही स्थित एक स्कूल में कोरंटाइन किया गया। तब समूह की महिलाएं अपना मुनाफा त्याग करआगे आईं और अपने परिवार की चिंता किये बगैर उनके लिए भोजन का प्रबंध करने लगी। पार्वती बताती हैं, कि संकट काल में परिवार पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पायी । स्कूल में कोरंटाइन में रखे गये सौ मजदूरों की देखभाल ज्यादा जरूरी समझकर उनकी सेवा की। ये सब हमारे अपने ही तो हैं।  समूह ने उनके लिए अपने खेत की सब्जी -फलों के साथ-साथ उनके लिए 15 दिनों तक सामुदायिक रसोई का इंतजाम किया। इसके साथ ही लॉकडाउन के दौरान जब सारा देष सब्जी-फलों के लिए तरसते रहे, तब समूह की महिलाओं ने गांव के वृद्ध, विकलांग,अस्वस्थ्य और जरूरतमंदों  के घरों तक ताजी सब्जी-फल पहुंचाने का काम किया। ग्राम पंचायत के सचिव जाहर सिंह ने बताया, कि खेत के चारों ओर कटीले तार लगवाने , पानी के लिए बोर जैसे काम मनरेगा के फण्ड से किया जाता है।
वर्तमान में समूह की महिलाएं गांव में जनहित की आवश्यकताओं की पहचान कर उनकी पूर्ति के लिए शासन के जिम्मेदार विभागों एवं उनसे संबंधित हेल्प लाइन नम्बरों पर बात करती हैं। रबी की कटाई के पष्चात जन सहभागिता सुनिश्चित करते हुये जल संरचनाओं की मरम्मत एवं बरसात के बाद नालों के बह रहे पानी केा बोरी बंधान कर संरक्षित करती हैं।  



Saturday, November 23, 2019

Gender based Reporting PCI National Award for Excellence in Journalism


राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर उपराष्ट्रपति ने रूबी सरकार को सम्मानित किया




देश को आज़ादी दिलाने में स्वतंत्र प्रेस की अहम भूमिका : उपराष्ट्रपति
राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित एक भव्य समारोह में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने देशबन्धु की विशेष संवाददाता रूबी सरकार को लैंगिक समानता श्रेणी के पुरस्कार से सम्मानित किया। सुश्री सरकार को इससे पहले वर्ष 2018 में भी ग्रामीण पत्रकारिता के लिए भारतीय प्रेस परिषद की ओर से तत्कालीन वित्त मंत्री अरूण जेटली ने सम्मानित किया था।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने प्रेस की आजादी की वकालत करते हुए कहा, कि इससे जनता के हितों की रक्षा होती है। श्री नायडू ने कहा, कि देश को आज़ादी दिलाने में स्वतंत्र प्रेस की अहम भूमिका रही है। आज़ादी के बाद आपातकाल में प्रेस की आवाज़ जरूर दबाई गई थी, लेकिन रामनाथ गोयनका जैसे पत्रकारों ने इसका खुलकर विरोध किया। उन्होंने कहा, कि प्रेस की आज़ादी से सरकार की गलत नीतियों व कार्यों की आलोचना की जा सकती है। स्वतंत्र प्रेस अच्छा काम कर रहे लोगों को आगे लाने का काम करती है। लेकिन पत्रकारों को लिखते समय यह ध्यान रखना चाहिए, कि सबसे ऊपर देश है।

मुर्खतापूर्ण है सनसनीखेज $खबर
पत्रकारिता के बदलाव पर श्री नायडू ने कहा, कि पहले इसे राष्ट्र के लिए मिशन माना जाता था, लेकिन अब यह कुछ के लिए कमीशन का खेल हो गया है? कार्यक्रम के विषय 'रिपोर्टिंग- व्याख्या- एक यात्राÓ पर कहा, कि अब समाचार और विचार दोनों को मिला दिया गया। यह सबसे बड़ी समस्या बन गई है।
श्री नायडू ने कहा, कि पहले लोगों को समाचार देना चाहिए, फिर कोई भी इस पर विचार दे सकता है। उन्होंने कहा, सूचनाएं सत्य और पुष्ट होनी चाहिए। आज ऐसा नहीं हो रहा है। सनसनीखेज खबरें बनाई जा रही हैं, जो मूर्खतापूर्ण हैं।  उन्होंने कहा, कि मीडिया का काम सच बाहर निकालने का है। उन्होंने कहा, कि सरकार ने कई कानून बना रखे हैं, लेकिन मीडिया संस्थानों को खुद ही आचार संहिता बनानी चाहिए। नायडू ने कहा, कि आजकल राजनीतिक दल और नेता भी अखबार निकाल रहे हैं। इससे वह खुद को प्रोजेक्ट करने के साथ प्रोटेक्ट करते हैं। राजनीतिक दल भले ही अखबार निकाले, लेकिन लोगों को यह बताये, कि यह उनकी पार्टी का अखबार है। इसी तरह कई उद्यमी खुद के बिजनेस को प्रोटेक्ट और प्रमोट करने के लिए चैनल चला रहे हैं। उन्होंने कहा, कि लोग सब समझते हैं और कहते हैं, कि अमुक चैनल या अखबार इसका है, इसलिए ऐसा लिखा होगा।
आज़ादी के बाद आपातकाल में प्रेस की अज़ादी पर संकट आया
विशेष अतिथि सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने फेक न्यूज़ और पेड न्यूज़ से खतरे की ओर इशारा करते हुए कहा, कि इसे कुछ हद तक रोकने में भारतीय प्रेस परिषद ने अहम भूमिका अदा की है। उन्होंने कहा, कि आज़ादी के बाद सिर्फ आपातकाल में प्रेस की आज़ादी पर संकट आया। इसके खिलाफ हम सबने मिलकर लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि मेरे पिता पत्रकार थे, उन्होंने भी इसका विरोध किया था। प्रेस की आज़ादी का उल्ल्ेख करते हुए उन्होंने कहा, कि आज़ादी मुफ्त में नहीं मिलती है, बल्कि जिम्मेदारी भी साथ लेकर आती है। 'रिपोर्टिंग- व्याख्या- एक यात्राÓ विषय पर उन्होंने कहा, कि व्याख्या में ही गड़बड़ी की आशंका है। फेक न्यूज़ पर उन्होंने कहा, चिंता जताई और कहा कि इससे मीडिया की टीआरपी भी गड़बड़ा गई है। श्री जावडेकर ने कहा, बच्चों के अगवा करने वाले गिरोह के सक्रिय होने की फर्जी खबर से 20 लोगों की जान चली गई। इसी तरह अयोध्या फैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उच्च्तम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को धन्यवाद पत्र लिखने की फेक न्यूज़ सोशल मीडिया पर चला दी गई, इसलिए अब पेड न्यूज के मुकाबले फेक न्यूज का खतरा भी बढ़ रहा है।
गौरतलब है, कि इसी समारोह में पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी को राजा राममोहन राय प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही संजय सैनी व राज चेनगप्पा को ग्रामीण पत्रकारिता, शिवा स्वरूप अवस्थी और अनु अब्राहिम को डेवलपमेंट रिपोर्टिंग, पीजी उन्नीकृष्णन व अकील इएस को फोटो पत्रकारिता, शिप्रा दास को फोटो फीचर, सौरभ दुग्गज को खेल पत्रकारिता, कृषणन कौशिक व संदीप सिंह को फाइनेंनशियल रिपोर्टिंग तथा अनुराधा को जेंडर आधारित रिपोर्टिंग के लिए सम्मानित किया गया।