Thursday, June 8, 2023

22 हजार किसानों ने फूंका ऑर्गेनिक फूड का मंत्र

 




22 हजार किसानों ने फूंका ऑर्गेनिक फूड का मंत्र

रूबी सरकार

निरंतर वैश्विक अनिश्चितताओं और खाद्य प्रणाली के लिए बढ़े खतरे को देखते हुए जी-20 की तरफ से सामूहिक प्रयास की ओर ध्यान दिया जा रहा है। भारत अपने कृषि अनुभव के आधार पर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत के पास गंभीर खाद्य सुरक्षा से निकलने का अनुभव है।भारत को जी-20 की अध्यक्षता ऐसे समय मिली जब विश्व मानव इतिहास के सबसे  अनिश्चित   दौर से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली देशों की अध्यक्षता ग्रहण करने के साथ प्राथमिकताएं भी बताई। उन्होंने कहा कि भारत का एजेंडा भोजनउर्वरक और चिकित्सा उत्पादों की वैश्विक आपूर्ति का अराजनीतिकरण करके जी-20 देशों के बीच सहयोग और समन्वय को मजबूत किया जाना है।

विकासशील देशों में भूख और खाद्य असुरक्षा की समस्या कोई नई नहीं है। इसके समाधान के लिए जी-20 देशों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कदम उठाए। टिकाऊ खेती और खाद्य आपूर्ति प्रणाली की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। हालांकि भारत के किसानों को जैविक खेती के बारे में पहले से मालूम थालेकिन वे बाजार के प्रभाव में आकर रासायनिक खेती करने लगे थे। जिससे उनकी जमीन की उर्वरा शक्ति कम होने लगी। अब जब जी-20 के कॉन्क्लेव के जरिए इसका प्रचार-प्रसार होने लगातो देश के कोने- कोने में किसानों को यह समझ आने लगा कि जैविक विधि से खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है साथ ही किसानों की आय भी बढ़ती है । अंतरराष्ट्रीय बाजार की  स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं तथा सामान्य उत्पादन की अपेक्षा किसानों को अधिक लाभ प्राप्त हो रहा है। लेकिन इसके लिए उन्हें श्रम अधिक करना पड़ेगा। उन्हें स्वयं प्राकृतिक दवाइयां तैयार करनी होगी।

मध्यप्रदेश के कटनी जिले के मानव जीवन विकास समिति ने यह बीड़ा उठाया और कटनी के साथ-साथ दमोह जिले के किसानों को प्राकृतिक दवाइयों का प्रशिक्षण देना शुरू किया। इस समिति से जुड़ी मिलन धुर्वे ने बताती है कि किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करने और उनकी लागत कम करने के उद्देष्य से उन्होंने प्राकृतिक दवाइयां तैयार करने का प्रशिक्षण देने महिला समूहों को अपने साथ जोड़ा और उन्हें 25 तरह की प्राकृतिक दवाइयां बनाने की ट्रेनिंग निशुल्क देना प्रारंभ की । धीरे-धीरे महिला समूह की संख्या बढ़ने लगी। वह कटनी के साथ-साथ दमोह जिले में भी दवाइयों का प्रशिक्षण देने जाने लगीं । इस तरह वह मास्टर ट्रेनर बन गईं। मिलन बताती हैं कि वह दमोह जिले के ग्राम पंचायत धनेटामॉलमगदूपुरा और सहरी के महिला समूह को प्राकृतिक दवाइयां तैयार करने का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद की है। जब महिला समूह ने प्राकृतिक दवाइयां बनाना सीख लियातो वे इसे किसानों को बेचने लगीजिससे उन्हें एक सीजन में 10 से 15 हजार रुपए तक की आय होने लगी। प्रशिक्षित महिलाएं इतनी जागरूक हो गई  िक वे अपने खेत के एक हिस्से में परिवार  के लिए जैविक का उत्पादन करने लगी। बाजार के लिए तो वे धान, मूंग, उड़द बो रही हैं, लेकिन अपनी थाली के लिए जैविक को ही प्राथमिकता देने लगी हैं। समिति ने अब तक इन दो जिलें के करीब 200 गांवों में 22 हजार किसानों को  गैर कीटनाशक प्रबंधन आधारित खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया है।   समिति की ओर से  किसानों व समितियों  को नाडेप, भू-नाडेप, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि बताई जा रही है। इसके अलावा सुपर कंपोस्ट खाद, मटका खाद, खरपतवार नियंत्रण, जैविक कीट एवं रोग प्रबंधन, आग्नेयास्त्र तैयार करने की विधिमठास्त्र, नीमास्त्र, हींगास्त्र, लमित रस, चूसक, पीली पट्टी, दशपर्णी पोषक तत्व प्रबंधन, पंचगव्य, फसल एवं फल वर्धक टॉनिक, बीजामृत, बीज शोधक के बारे में भी बताया जा रहा है।

जैविक खेती के साथ ही समिति बिजौली विकासखंड में पानी, पर्यावरण और आजीविका के सिद्धांत को भी आगे बढ़ा रही है। यहां किसानों को बीजामृत से बीज शोधन, गुड़ से बीज शोधन, जीवामृत, अजोला, जैव उर्वरक, धान सघनीकरण के बारे में प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें खेत का चयनतैयारी, बीज चयनबीजोपचार, नर्सरी की तैयारीपौधे की रोपाई, खरपतवार नियंत्रण, रोग व कीट नियंत्रण , श्रीविधि से धान की खेती जैसी जानकारी देकर  कई एकड़ में जैविक  का उत्पादन किया जा रहा है और औषधियां तैयार की जा रही है। समिति के सचिव निर्भय सिंह  बताते हैं कि गांव में यह एक बेहतर स्टार्टअप होता जा रहा है।

जल संरक्षण पर विशेष जोर

वर्षा जल को सहेजने के लिए किसानों को प्रेरित किया जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में पौधा रोपण पर जोर दिया जा रहा है। सचिव निर्भय सिंह का कहना है कि लोगों को समझना होगा कि खेती में रासायनिक खाद का उपयोग जिंदगी में जहर घोलने जैसा है। जैविक खेती को बढ़ावा देने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए पौधरोपण, जल संचय बहुत आवश्यक है। हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।  मोटे अनाज मक्काज्वारबाजराकोदो-कुटकी के उत्पादन और उपयोग पर जोर देने के लिए समिति किसानों को लगातार जोड़ रही है।



80 साल तक कोदो धान नहीं होता पुराना

 





80 साल तक कोदो धान नहीं होता पुराना
रूबी सरकार


      कटनी जिले से करीब 12 किलोमीटर दूर शहडोल के रास्ते मझगवां में मिलेट प्रसंस्करण यूनिट के लोकार्पण के दौरान तहसील बहोरीबंद ग्राम पंचायत पहरुआ निवासी सदा सिंह 40 वर्ष पुरानी 20 किलो कोदो लेकर पहुंचे थे,जिसकी इसी प्रसंस्करण मशीन से दराई कर चावल निकाला गया। उन्होने कहावत सुनाकर बताया कि लकड़ी मंे सरई सागौन और अन्न में राना मतलब कोदो 80 साल तक पुराना नहीं होता। कोदो के फायदों के संबंध में बताया कि इसको खाने से शुगर की बीमारी नहीं होती, साथ ही शीत एवं जुकाम की समस्या भी नहीं रहती है।
सदा सिंह गोंड आदिवासी किसान है। उसके पास करीब 5 एकड़ कृषि भूमि है, जिसमें वह कोदो की खेती सदियों से करता रहा है। सदा सिंह के पास बीज भी भरपूर है। जिसे वह समय-समय पर किसानों को देता रहा है। अब चूंकि भारत सरकार मोटे अनाज की खेती को प्रोत्साहन देने लगा है, इसलिए सदा सिंह खुशी से फूले नहीं समा रहा है। प्रसंस्करण के लोकार्पण के लिए पहुंचे कलेक्टर अभि प्रसाद ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। मोटे अनाज वाली फसलों जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, सावा, कोदो, कुटकी आदि को मिलेट क्रॉप कहा जाता है। इनमें अधिक पोषक तत्व होने की वजह से इन्हे इन्हे सुपर फूड माना जाता है। वहीं मानव जीवन विकास समिति के  सचिव निर्भय सिंह ने कहा कि इस प्रसंस्करण यूनिट से क्षेत्रीय किसानों को अपने उत्पादों का प्रसंस्करण करने की सुविधा मिलेगी और वे अपने उत्पादों का बाजार में उचित मूल्य पर विक्रय भी कर सकेंगे इससे कटनी को एक नई पहचान मिलेगी।
दरअसल ढाई लाख रुपए की यह प्रसंस्करण मषीन कृषि से सम्बद्ध आत्मा विभाग ने मिलेट अभियान को बढ़ावा देने के लिए मुफ्त में उपलब्ध करवाया है, जिससे कोदो की दराई में किसानों को कोई परेशानी न हो। मानव जीवन विकास समिति के सचिव निर्भय सिंह ने बताया  कि इस साल करीब 100 किसानों को उत्पादन के लिए कोदो का बीज दिया गया था, जिसमें करीब 60 फीसदी से अधिक किसान कोदो की खेती में सफल रहे। निर्भय सिंह ने बताया कि ढाई किलो कोदो की दराई के बाद करीब एक किलो चावल निकलता है। इसलिए छोटे किसानों के लिए यह महंगा सौदा है। यह देख आत्मा विभाग ने मुफ्त में प्रसंस्करण मशीन उपलब्ध करवाया है , इतना ही नहीं,इसकी पैकेजिंग की व्यवस्था मानव जीवन विकास समिति और बाजार तक चावल पहुंचाने के लिए बेंगलुरु की एनएक्सथ्रीएफ कंपनी से मुफ्त में इलेक्ट्रिक ऑटो उपलब्ध करवाया है। यह कंपनी रसायन मुक्त खेती करने वाले किसानों को बढ़ावा देता है। इस तरह किसानों को कोदो का प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बाजार तक इसे पहुंचाने का वाहन सब कुछ मुफ्त में मिल रहा है, जिससे किसानों पर आर्थिक बोझ कम हो रहा है।
निर्भय सिंह बताते हैं कि इस साल मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए मानव जीवन विकास समिति ने कटनी जिले के भीमरखेड़ा, तेंदूखेड़ा, जबेरा और बड़वारा विकास खंडों के 1200 किसानों को मुफ्त कोदो बीज उपलब्ध करवा कर दो हजार एकड़ में  कोदो की खेती करने का लक्ष्य रखा है। इसमें कृषि विभाग व कृषि विज्ञान केंद्र का सहयोग रहेगा। कृषि विभाग 200 किसानों को तो कृषि विज्ञान केंद्र 5 किसानों को मुफ्त में बीज देने का आश्वासन दिया है। 700 किसानों के पास बीज पहले से ही उपलब्ध है, शेष बचे किसानों को मानव जीवन विकास समिति बीज देकर सहयोग करने का संकल्प लिया है। निर्भय ने बताया पहले बाजार में कोदो चावल की कीमत 20 से 25 रुपए प्रति किलो रहा, अब यह बढ़कर 30 से 35 रुपए प्रति किलो हो गया है। उन्होंने कहा कि मोटे अनाज के लिए हमारी समिति युद्धस्तर पर काम कर रही है और इसमें सभी का सहयोग भी मिल रहा है। क्योंकि किसानों के लिए अभी भी मोटे अनाज की खेती बहुत महंगा है, वे इसी तरफ तभी जाएंगे जब उन्हें बाजार में भाव मिलने लगेगा। समिति अब धीरे-धीरे मध्यमवर्गीय लोगों तक कोदो चावल आसानी से पहुंचाने दिशा में काम कर रहा है। जलवायु की परिस्थितियों में मोटे अनाज के पोषण और स्वास्थ्य लाभ एवं खेती के लिए उपयुक्तता के बारे में जागरूकता और बढ़ाना है।  
गौरतलब है कि कोदो एक प्राचीन औषधीय मोटा अनाज है, इसके औषधीय गुणों के कारण ही इसे सुपर फूड, शुगर फ्री चावल, ऋषि अन्न, अकाल भोजन नामों से पुकारा जाता है। करीब 3000 हजार  साल पहले से यह भारत के विभिन्न भागों में उगाया जाता रहा है। लेकिन धीरे-धीरे किसान रसायन युक्त खेती की तरफ बढ़ने लगे और यह औषधीय मोटा अनाज लोगों की थाली से बाहर होता चला गया



तनाव मुक्त रखने युवाओं के प्रतिभा को बढ़ावा देना होगा

 





तनाव मुक्त रखने युवाओं के प्रतिभा को बढ़ावा देना होगा
रूबी सरकार

कोरोना संक्रमण के दौरान और उसके बाद का समय हर आयु वर्ग के लिए तनाव भरा है। युवाओं के सामने बेरोजगारी, पढ़ाई, विश्वविद्यालयों में दाखिला, मनपसंद विषय बहुत सारी समस्याएं हैं, जिसे वह किसी से साझा नहीं कर पाते।  वे अंदर ही अंदर घुटते रहते थे, जो उनके सेहत के लिए हानिकारक है। इससे अलग उन्हें खुद नहीं पता होता है कि उनमें कौन सी छिपी प्रतिभा है, जिसे वह भविष्य में अपना करियर बना सकते हैं। इसी छिपी प्रतिभा को उभारने के लिए विश्वविद्यालयों में प्रतिभा खोज प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है।माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की पत्रकारिता विभाग से मास्टर्स कर रही 22 वर्षीय रिसिका रघुवंशी ऐसी ही एक छात्रा है। जिन्हें विश्वविद्यालय ने प्रतिभा खोज प्रतियोगिता में मंच मिला और उसने अपने हुनर से लोगों को परिचित करवाया। शिक्षिका डॉ राखी तिवारी की भी इसमें अहम भूमिका रही। रिसिका स्वास्थ्य संसद में चित्रकला प्रतियोगिता में अव्वल रहीं। साथ ही प्रतिभा प्रतियोगिता में रंगोली और अन्य विधाओं में अपना हुनर दिखाया। रिसिका सिर्फ पढ़ाई में ही दूसरे विद्यार्थियों से बेहतर नहीं है, बल्कि पढ़ाई के अलावा वह अपने भविष्य के सपने भी बुनती है। रिसिका कहती है कि उसे खुद नहीं पता था  िक उसके भीतर एक कलाकार है। जिसे उसे दिशा देनी है।
दरअसल वह  कोरोना संक्रमण का दौर था यानी 2020 । पूरे देश में घरबंदी थी , दुनिया निराशा में जी रही थी । टीवी देखना या समाचार सुनने से लोगों का मन भारी हो जाता था। तनाव से उबरने को कोई रास्ता लोगों को समझ में नहीं आ रहा था। ऐसे में छिंदवाड़ा जिले की एक किसान की बेटी अपने परिवार को उदास देखकर उनके चेहरे में उम्मीद जगाने के लिए पूरे परिवार का कैनवास पर प्रतिकृति बनाने लगती है। जिसे देखकर माता-पिता उम्मीद से भर जाते हैं। उन्हें लगता है कि इसे तो फाइन आर्ट्स की पढ़ाई करनी थी। रिसिका ने इससे पहले कभी कोई प्रतिकृति नहीं बनाई थी। न ही कोई विधिवत इसकी षिक्षा ली थी। सिर्फ तनाव दूर करने के लिए उसने लोगों की तस्वीर देखकर उसे कैनवास पर उतारती और उसमें रंग भरने लगती। पहला कैनवास मां, मौसी के साथ रिसिका खड़ी हुई दिखती है। जिसे मां ने सोशल नेटवर्किंग साइट में आईकॉन बनाया। फिर क्या था , परिचित तारीफों की बरसात करने लगे। उसे प्रोत्साहन मिलने लगा और वह आगे बढ़ती गई।
उसे अकेले में बैठकर पेंटिंग बनाते देख उसका इकलौता भाई भी उसका साथ देने लगा। फिर तो पता ही नहीं चला कि कब कोरोना का खौफ निकल गया।  मात्र दो साल के भीतर वह इतनी मंझ गई कि अब बैठे-बैठे 5 मिनट में किसी की भी प्रतिकृति (पोर्ट्रेट) बना लेती है।  जिसमें नाक, कान, ऑख न होते हुए भी लोग उसे आसानी से पहचान लेते हैं।  अब तक वह सैकड़ों प्रतिकृति बना चुकी हैं।
रिसिका कहती है कि मुझे दरअसल कार्टूनिस्ट बनना था,मैं पत्रकारिता की पढ़ाई ही इसलिए कर रही हूं। मेरी दिषा बदल सकती है, क्योंकि मेरे पास फेब्रिक कलर से बैग, मैटेरियल और साड़ियों के लिए ऑफर आने लगे। संभवतः मैं आगे चलकर ग्राफिक्स डिजाइनर बनूं। मैं अब अपनी कला को प्रोफेशन का रूप देने के लिए इसी विधा में पढ़ाई करना चाहूंगी, ताकि मैं अपने साथ-साथ दूसरे युवाओं को भी जोड़ सकूं। उसने कहा, मेरी कला को पहचान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने दी। मैंने प्रतिभा प्रतियोगिता में भाग लिया। स्वास्थ्य संसद में पेंटिंग बनाई, जिसके लिए मुझे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । इससे मेरा मनोबल बढा। अब तक तो एक्रेलिक रंगों से पोट््रेट तैयार करती थी। अब मैं वॉटर, फेब्रिक आदि कलर्स का इस्तेमाल कर अन्य विधाओं में भी हाथ अजमाउंगी। यही मेरा स्वंय का स्कील्ड है, मैं इसे और विस्तार दूंगी।
ताज्जुब यह है कि रिसिका ने कभी सुव्यवस्थित कला शिक्षा नहीं लिया, न ही किसी गुरु से दीक्षा ली। स्वयं के प्रयास से इतने सधे हुए हाथों से प्रतिकृति  की लंबी श्रृंखला तैयार करना कोई मामूली बात नहीं है। वह अभी कला की उठा-पटक, विचार की दुनिया से अंजान है। उसके पोट््रेट में मासूमियत साफ झलकती है। उसमें ठहराव है। वह शोर से दूर रहना पसंद करती है । वह जितनी बेहतर कलाकार है उतनी अच्छी विद्यार्थी भी है। रिसिका को कला के प्रोफेशन में कदम रखने के लिए चित्रण का पाठ, अवधारणा, प्रक्रिया की सजावट, दृश्य व्याख्या सब सिखना होगा। रिसिका का मानना है कि हर बच्चों में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होता है। उसे आकार देना अभिभावक व शिक्षकों का काम है। इससे बच्चा हमेशा तनाव मुक्त रहेगा और  उसे गलत दिशा में जाने से भी बचाया जा सकता है।
कला में बहुत संभावना है । बैग और कपड़ों के अलावा भी पोस्टर, फलायर्स, पत्रिकाओं, पुस्तकों, ष्षक्षिण सामग्री, एनीमेशन, वीडियो गेम में एकीकरण, फिल्म, वेबसाइट और ऐप्स को अधिक उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाने के लिए भी इस तरह के डिजाइन किया जाता है । दरअसल चित्रण का अर्थ ही है उदाहरण प्रस्तुत करना या तो लिखित रूप में हो या फिर चित्र के रूप में। अब लोगों के पास समय कम है, इसलिए वे पढ़ने की अपेक्षा देखना अधिक पसंद करते हैं।  



मासिक धर्म- अनगिनत अंधविश्वास व पुरानी सोच से मुक्त होने की बारी

 


मासिक धर्म- अनगिनत अंधविश्वास व पुरानी सोच से मुक्त होने की बारी

रूबी सरकार


मासिक धर्म एक ऐसा विषय है, जिसके ग्रामीण इलाकों में अनगिनत अंधविश्वास और पुरानी सोच जुड़ी हुई है। सामाजिक प्रतिबंध के कारण यहां ऐसे विषयों पर बात करना भी पाप माना जाता है, जिस वजह से महिलाएं सही जानकारी के अभाव में बीमारियों का शिकार हो जाती हैं और उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

माहवारी के समय किशोरियों के साथ-साथ गरीब महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना काफी आवश्यक है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (2015-2016) की रिपोर्ट की मानें तो ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत महिलाएं सेनेटरी नैपकिन (पैड) का उपयोग करती हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में 77.5 प्रतिशत महिलाएं इसका इस्तेमाल करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सैनिटरी नैपकिन को लेकर उम्रदराज महिलाओं की सोच रूढ़ियों से भरी पड़ी है। वे अपने बीच भी माहवारी के संबंध में बात करने से सकुचाती हैं। अंदरूनी अंगों की स्वच्छता के प्रति शर्म महसूस करती हैं। नतीजतन घर की किशोरियां भी खुलकर बातें करने में गुरेज करती हैं।

अब इस संबंध में मध्यप्रदेश के सुदूर इलाकों के दस्तक किशोरियों निजी संस्थाओं के सहयोग से ग्रामीणों को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। ग्रामीण आदिवासी व पिछड़ी जाति की किशोरियों ने ग्रामीण किशोरियों को मेंस्ट्रुअल कप के इस्तेमाल के बारे में बता रही हैं, जो अन्य सेनेटरी पैड की अपेक्षा महंगा तो है, परंतु इसे साफ कर कई वर्षों तक इसके उपयोग किया जा सकता है। इस कप को भोपाल की एक संस्था विकास संवाद ग्रामीण किशोरियों को निशुल्क उपलब्ध करा रही है। इसे इस्तेमाल करने के बाद किशोरियों ने बताया कि यह बेहद आसान, सुरक्षित और हाईजिन है।
विकास संवाद से जुड़े राकेश मालवीय ने बताया कि दरअसल दस्तक परियोजना के तहत मध्यप्रदेश के छोटे शहर रीवा, सतना, उमरिया जैसे आदिवासी और अनुसूचित जाति की आबादी वाले क्षेत्रों में संस्था ने जब काम करना शुरू किया था। तभी माहवारी को लेकर बहुत सी भ्रांतियां देखा गया। यहां तक कि इसे ग्रामीण इलाकों में एक बीमारी की तरह देखा जाता है। किशोरियों को माहवारी होने पर उसे अलग-थलग छिपाकर अंधेरे कमरे में रखा जाता है, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इन क्षेत्रों में ज्यादातर किशोरियों की पढ़ाई मासिक धर्म के बाद छूट जाती है। इस विषय पर किशोरियां खुलकर बात नहीं कर पातीं। संस्था ने सबसे पहले किशोरियों को इस मुद्दे पर बात करना सिखाया। धीरे-धीरे संस्था की प्रेरणा से किशोरियां सहज होकर बात करने लगी, तभी उन्हें मेंस्ट्रुअल कप के इस्तेमाल के बारे में बताया गया । मासिक धर्म जैसे विषय पर सुदूर ग्रामीण इलाकों में जाकर  किशोरियों से बात करना एक चुनौती भरा काम है। लेकिन अंजलि के सहयोग से यह थोड़ा आसान हो गया।
मझगवां विकासखंड,  सतना की पूजा चौधरी बताती है कि यह कप महंगा जरूर है, पर सुरक्षित है। फिलहाल तो यह विकास संवाद की तरफ से उपलब्ध कराया गया है। इसे बार-बार धोकर 10 साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह देखा जाए तो बहुत महंगा नहीं है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसके उपयोग से दर्द में कमी आई है। ष्षुरू में अजीब जरूर लगा, परंतु अब सामान्य लगने लगा। माहवारी को लेकर ग्रामीण किशोरियां अब खुलकर बात करती है। आपस में एक-दूसरे से अपनी तकलीफ बताती है। इससे समाधान भी आसान हो गया। घर के बड़े बुजुर्ग भी अब इस विषय पर चर्चा करने लगे हैं।
सतना की ही तेलईचुआ विकास खंड की निशा और चौरेही की शालू की राय भी पूजा से मिलती-जुलती है। दोनों ने कहा कि पहले की अपेक्षा गांव में झिझक कम हुई है। पहले तो महिलाओं को पीरियड क्यों होता है और कैसे होता है? इस विषय से ही ग्रामीण महिलाएं और किशोरियां अनजान थी। गांव में तो इस विषय पर बात करना अच्छा नहीं माना जाता था। किसी भी किशोरी को इससे जुड़े सवाल पूछने की मनाही है। यहां तक कि वह घर की महिलाओं से भी यह प्रश्न नहीं पूछ सकती है।
मंदिरों में प्रवेश और यहां तक कि पूजन सामग्री को छूना भी पाप है। इस प्रथा को सही ठहराते हुए रीवा जिले की रागिनी कहती है्रं कि महिलाएं उस दौरान अशुद्ध होती हैं, जिन्हें हरेक चीजों से अलग रहना होता है। खाने की वस्तु भी नहीं छूनी चाहिए। जब उससे पैड्स के बारे में पूछा गया तो उसने कहा कि गांव में आज भी अधिकतर महिलाएं इसे नाली या को शौचालय की फ्लष में प्रवाहित कर देती है।

उमरिया जिले की नगीना कहती हैं कि पहले तो यहां तक कहा जाता था कि  मासिक धर्म के दौरान श्रृंगार की वस्तु छूने से भी वो खराब हो जाती है। यहां की कई महिलाओं की बीच ऐसी मान्यता है कि मासिक धर्म के दौरान नहाने से गर्भाशय में पानी चला जाता है और जान का खतरा हो जाता है, इसलिए इस दौरान गांव की कई महिलाएं और किशोरियां नहाती नहीं हैं।

उमरिया जिले की बाजाकुंड विकास खंड की सरस्वती बताती है कि  गांव में लड़कियों को माहवारी के बारे में कुछ नहीं बताया जाता है, क्योंकि यह बात करने का विषय नहीं है। बच्चों और पुरुषों के बीच तो यह बातें करना भी गुनाह है। माहवारी के दौरान कामकाजी महिलाओं को खेतों में काम करने जाने नहीं दिया जाता है और पैसों की तंगी के कारण कोई जाए तो उन्हें भगा दिया जाता है।
मध्य प्रदेश में आंगनबाड़ी की सेविकाओं को किशोरियों और महिलाओं बीच जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी दी जाती है। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि माहवारी महिलाओं के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। इसमें सृष्टि के निर्माण के बीज होते हैं, जिन्हें पीरियड नहीं आता है, वे ना जाने कितने डॉक्टर के पास इलाज के लिए भटकती रहती हैं। मंदिर और ओझा-गुणी के पास जाकर झाड़-फूंक करने में हजारों रुपए खर्च करती हैं।
दूसरी ओर इस दौरान स्वच्छता का ध्यान न रखने और सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल नहीं करने से महिलाओं और किशोरियों को कई तरह की बीमारियों का सामना भी करना पड़ता है। खासकर ग्रामीण महिलाएं और किशोरियां माहवारी के समय स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं होती हैं। मजदूरी करने वाली बहुत सी महिलाओं के पास इतने पैसे भी नहीं होते कि वह ऐसे समय में सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल कर सके।लेकिन इन जिलों में विकास संवाद की ओर से मेंस्ट्रुअल कप उपलब्ध कराए जाने से उन दिनों में किशोरियां हर काम आसानी से कर लेती है।