Friday, June 9, 2023

गुजारे के लिए संघर्ष करती खेतिहर मजदूर महिलाएं






 गुजारे के लिए संघर्ष करती खेतिहर मजदूर महिलाएं


रूबी सरकार

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 70 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के बाड़ी विकासखंड के मुख्यालय में हजारों की संख्या में महिला खेतिहर मजदूर सिर्फ इसलिए इकट्ठा हुई, कि उन्हें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना  के अंतर्गत काम नहीं मिलता। ऐसे में उन्हें हर रोज बड़े किसानों के यहां काम मांगने जाना पड़ता है। जहां रोजगार मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। कभी-कभी उन्हें खाली हाथ वापस आना पड़ता है। उनके आजीविका का संकट आज का नहीं है, बल्कि रायसेन जिले में सदियों से असंगठित मजदूरों को रोजगार के लिए यही करना पड़ता है। इस जिले विकास भी उस तरह से नहीं हुआ, जैसे अन्य जिलों का हुआ है। जबकि यहां से पूर्व राष्ट्रपति स्व शंकर दयाल शर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी,पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व सुषमा स्वराज, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान , पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा जैसे दिग्गज राजनेताओं ने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उसके बाद पलट के नहीं देखा।
लिहाजा सबसे ज्यादा मजदूर इस जिले से आते हैं। ओमवती सिसोदिया सुबह 70 किलोमीटर दूर से इस आयोजन में भाग लेने आई थी। उन्होंने कहा  वह मनागढ़ ग्राम पंचायत से बच्चों को घर पर अकेला छोड़कर यहां आई हैं। उन्हें पता चला कि यहां वर्तमान विधायक सुरेंद्र पटवा आने वाले हैं, जो उनकी बातें सुनेंगे। आने के बाद पता चला  कि वह तो कहीं और विकास यात्रा के लिए निकल गए। अब जहां विकास हुआ ही नहीं , वहां विकास की क्या बात करते, इसलिए शायद नहीं आए। ओमवती ने बताया कि ग्राम पंचायत के सचिव ग्रामीणों का जॉब कार्ड रख लेते हैं, परंतु कभी काम नहीं देते। रोज सुबह हम सबको काम की तलाश में निकलना पड़ता है। साल भर तो खेत में काम नहीं मिलता । हमलोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या बनी रहती है। हमें न तो प्रधानमंत्री आवास मिला और न शौचालय का पैसा। ग्राम पंचायत गाजखेड़ी की 5त्र वर्षीय अभिलाषा के पति का देहांत हो चुका है। उसके चार छोटे-छोटे बच्चे हैं, जिसके पालन पोषण की जिम्मेदारी उस पर है। बड़ा बेटा 8वीं तक पढ़ाई करने के बाद मां के साथ मजदूरी करने जाता है। उसने विधवा पेंशन के लिए पंचायत में आवेदन दिया था, लेकिन अभी तक उसे पेंशन नहीं मिला है। जिला परिषद सदस्य लता चौहान बताती हैं कि छिंदवाड़ा जिले के बाद मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा जिला रायसेन है। यह जिला हमेशा  उपेक्षा का शिकार रहा है। यहां आय का कोई जरिया नहीं है। अधिकतर खेतिहर मजदूर है। इसे बंधुआ मजदूर भी कह सकते हैं, क्योंकि यह असंगठित मजदूर अपने जरूरतों के लिए बड़े किसानों से पैसे उधार लेते हैं और बदले में उनके खेतों में मजदूरी करते हैं। कन्वार पंचायत से 10 किलोमीटर चलकर बाड़ी विकासखंड पहुंची 55 वर्षीय सतीबाई का जॉब कार्ड ही नहीं बना। सतीबाई के तीन बेटे हैं और तीनों अलग-अलग रहते हैं। सतीबाई इस उम्र में अपने आजीविका के लिए संघर्ष कर रही हैं। कलिया बाई, मुन्नी बाई, कला बाई सबकी एक जैसी कहानी यहां सुनने को मिली। जो बड़ी उम्मीद से यहां आई थीं कि विधायक उनकी बात सुनकर समस्या का हल करेंगे। उन्हें क्या मालूम था कि विधायक की नजर में उनके वोट की कोई कीमत नहीं। असंगठित खेतिहर मजदूर सिर्फ रायसेन जिले में ही नहीं है, बल्कि 2011 की जनगणना केे अनुसार पूरे देष में खेती में लगे हुए कुल  26 करोड़ से ज्यादा लोगों में से  45 फीसदी यानी करीब 12 करोड़ किसान  और ष्षेष करीब 55 फीसदी  यानी साढ़े 14 करोड़ खेतिहर मजदूर है।  पिछले दशकों में खेती योग्य जमीन तेजी से घट रही है। फलस्वरूप भूमिहीनों की  संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इसलिए हम कह सकते हैं कि  खेत मजदूरों  की संख्या तेजी से बढ़ी होगी। गांवों में खेती योग्य अच्छी भूमि का करीब 80 फीसद धनी और खाते-पीते और मझोले किसानों के पास है, जबकि उनकी आबादी कुल ग्रामीण आबादी में महज 19 से 15 फीसदी के बीच  है। 2011 की जनगणना के अनुसार खुद किसानी करने  करने वाले किसानों का हिस्सा 39 फीसद से भी कम है। इनमें से करीब 66 फीसद ऐसे हैं जो सीमांत या बेहद छोटे किसान  हैं। जो अपने  जीविकोपार्जन के लिए मुख्य रूप से अपनी भूमि पर निर्भर नहीं है। वे दूसरे के खेतों पर काम करके अपना  गुजारा करते हैं।  मगर ग्रामीण क्षेत्र की सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद खेतिहर  मजदूरों की बदहाली और काम व जीवन के खराब हालात की बहुत कम चर्चा होती है।
घटती आमदनी के कारण हजारों खेतिहर मजदूर कर्ज के जाल में फंसे हुए हैं और आर्थिक बदहाली, कर्ज का बोझ और निराशा बड़े पैमाने पर उन्हें अपनी जान लेने जैसा  कदम उठाने पर मजबूर कर रहे हैं। किसानों की आत्महत्या के सवाल पर संसद से लेकर सड़क तक चर्चा हुई है, फिर भी खेतिहर मजदूरों  की दुर्दशा को लगातार नजरअंदाज  किया जाता है। इस तबके के आत्महत्या के आंकड़े ही 2013 तक प्रकाशित और उपलब्ध नहीं थे। जबसे इसके अलग से आंकड़े  उपलब्ध है, तब से देखें तो  2014 में 6750 खेतिहर मजदूरों ने  आत्महत्या की, 2015 में 4505, 2016 में  5019 और 2019 में 4324 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की है। देष में किसानों की आत्महत्याओं पर काफी चर्चा हुई है लेकिन खेतिहर मजदूरों की आत्महत्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया  बल्कि उन्हें मामूली और सामान्य घटनाएं बताने की भी कोशिश होती रही है।
 देश के 94 फीसद असंगठित मजदूरों में खेतिहर मजदूर सबसे अधिक बिखरा, असंगठित, शोषित, उत्पीड़ित और  अशिक्षित हिस्सा है। इन सबके बावजूद खेतिहर मजदूरों के आर्थिक हितों की हिफाजत के लिए देश की कानून व्यवस्था और संविधान कोई व्यवस्थित ढांचा मुहैया  नहीं कराता है। देश भर में ग्रामीण मजदूरों के लिए कोई एक रूप सार्वभौमिक कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है। सरकार ने गांवों से उजड़ने वाले मजदूरों के ष्षहरों में प्रवास को रोकने और कम करने के  लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना  शुरू की थी। लेकिन यह  योजना खुद ही सरकार द्वारा बनाए गए अन्य कानूनों का उल्लंघन करती है। इस योजना के  तहत मिलने वाले काम  के बदले मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी तक नहीं दी जाती। ऊपर  से यह योजना वर्ष में मात्र 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देती है। इसलिए वास्तव में यह रोजगार गारंटी है ही नहीं क्योंकि रोजगार का  अर्थ ही यह है कि साल भर, नियमित तौर  पर रोज मिलने वाला काम। मनरेगा से होने वाली आय ग्रामीण मजदूरों के केवल भुखमरी  के स्तर पर जिंदा  रख सकती है और यह भी तब  होगा। जब यह योजना भ्रष्टाचार  से मुक्त होकर  लागू हो। हालत यह है  कि इस योजना के लिए आवंटित राशि का अच्छा खासा हिस्सा इस्तेमाल ही नहीं होता और जो होता है, उसका भी बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार भेंट चढ़ जाता है।
गांव के गरीब मजदूरों के लिए सरकार के पास श्रम कानूनों का कोई ढांचा मौजूद नहीं है। राष्ट्रीय ग्रामीण श्रम आयोग ने सरकार से ऐसे कानूनी ढांचे की सिफारिश की थी जो ग्रामीण मजदूरों के लिए चाहे वे खेतिहर मजदूर हो  या फिर गैर खेतिहर मजदूर, इस बात की गारंटी करें कि  उनके कार्य दिवस आई घंटे के हो उन्हें साप्ताहिक अवकाश मिले उनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए पीएफ और ईएसआई कार्ड योजना शुरू की जाए और उनके आवास आदि के लिए भी  सरकार जिम्मेदारी लेकर योजना बनाए। लेकिन  आज तक इन सिफारिशों पर अमल नहीं हुआ। ग्रामीण मजदूरों से के कसम करने की परिस्थितियों भी घातक होती है। एक  आकलन के अनुसार औद्योगिक दुर्घटनाओं  में जितने शहरी मजदूर की जान गंवाते हैं या अपंग होते हैं, ग्रामीण मजदूर भी  काम के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में लगभग उतनी ही तादाद में जान गंवाते या अपंग होते हैं। हालांकि शहरी मजदूरी के लिए सामाजिक सुरक्षा के कुछ कानून तो है लेकिन ग्रामीण मजदूरों के के लिए अब तक ऐसे कानून ही नहीं है इसलिए वे  केाई कानूनी लड़ाई लड़ ही नहीं सकते। यहां तक कि खेतिहर मजदूरी का अभी तक कोई सरकारी मानक या पैमाना निर्धारित नहीं है। ऐसे में खेतिहर मजदूर पूरी तरह से बाजार की ताकतों तथा धनी और मझोले किसानों के रहम पर निर्भर रहते हैं।
बाजार में तेजी होने पर कई बार उसे संतोषजनक मजदूरी  मिलती है लेकिन 12-12 घंटे कमरतोड़ मेहनत के बाद। लेकिन ज्यादातर  की किस्मत इतनी अच्छी नहीं होती। देश में  खेती का सेक्टर लंबे समय से संकटग्रस्त है और इसका  सबसे बुरा प्रभाव देश के गरीब खेतिहर मजदूरों पर पड़ता है, जिसकी मजदूरी लगातार गुजारे के स्तर से भी नीचे जा रही है। कोरोना काल के बाद यह संकट और अधिक गहरा गया है कानूनों के जरिए कोई भी सरकारी विनियमन न होने के  कारण ये खेतिहर मजदूर पूरी तरह से बाजार की दया पर निर्भर है। 
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 5 march 2023 Amril Sandesh , Raipur



Thursday, June 8, 2023

Down to Earth March 2023-जल जीवन मिशन - आगे बढ़ाने में चैंपियन बन रहीं महिलाएं

 





जल जीवन मिशन - आगे बढ़ाने में चैंपियन बन रहीं महिलाएं

रूबी सरकार

ग्रामीण जल जीवन मिशन  के अंतर्गत घरों में नल से जल उपलब्ध होने से महिलाओं और किशोरी बालिकाओं को सबसे अधिक लाभ मिलने लगा है। किशोरियां स्कूल जाने लगी हैतो महिलाओं ने रोजगार के नए.नए साधन ढूंढ़कर अपनी आजीविका में सुधार ला रही हैं। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। पानी के लिए दशकों तक ग्रामीण महिलाओं ने संघर्ष किया है। कलेक्टरों को आवेदनज्ञापनआंदोलनघेराव तक करना पड़ा है। तब जाकर जल जीवन मिशन के तहत उनके घरों में पेयजल की आपूर्ति संभव हो पाया है। वहीं जल निगम की ओर से ग्रामीण महिलाओं को शुद्ध पेयजल की जांचजल की बर्बादी रोकनाजलकर वसूली कर निर्धारित समय पर सरकार के खाते में पैसे जमा करने के साथ ही जल से संबंधित किसी भी शिकायत हो तो तुरंत स्मार्ट फोन से अधिकारियों को सूचित करना और जल जनित बीमारियों की जानकारी आदि के लिए प्रशिक्षित किया गया है। यहाँ तक कि पेयजल परीक्षण के लिए उन्हें किट भी उपलब्ध करवाया गया है।  यानी पेयजल के मामले में ग्रामीण महिलाएं अब पूरी तरह चैंपियन बन चुकी हैं। हर गांव में महिला समूहों ने मिलकर जल समिति का गठन किया हैजो ग्रामीणों के जलप्रदाय की देखरेख कर रही हैं।

आम तौर पर समाज में घरेलू पानी की व्यवस्था करना महिलाओं का काम माना जाता है और इसके लिए वह दिन.रात जूझती हैं। इससे उनके सेहत के साथ.साथ अन्य घरेलू काम प्रभावित होता है। न जाने कितने घरों में जल को लेकर झगड़े होते थेपरिवारों में दरार पड़ने यहां तक कि गर्भवती महिलाओं का गर्भपात तक की नौबत आ जाती है। इसी तरह किशोरियों की पढ़ाई तक छूट जाती थी।  बच्चे उपेक्षित रहते थे। मां के कई किलोमीटर दूर से पानी लाने के कारण  अक्सर घरों में सबसे बड़ा भाई या बहन अन्य छोटे भाई.बहनों की देखभाल करते हैं। जबकि वह स्वयं उम्र में बहुत छोटे होते हैं। ऐसी अनेक दुख भरी कहानियां छिंदवाड़ा जिले के मऊ ग्राम पंचायत की महिलाओं ने साझा किया। 

ग्राम पंचायत गडमऊ की अनिता चौधरी जल समिति की अध्यक्ष हैं।  उन्होंने बताया कि मोहखेड़ ग्रामीण जल प्रदाय योजना में सिर्फ डेम में बरसात का पानी स्टोर कर इसे शोधन के बाद मऊ ग्राम पंचायत सहित 30 गांवों की प्यास बुझाई जा रही है। दशकों तक संघर्ष करने के बाद उन्हें यह दिन नसीब हुआ है। ग्रामीण महिलाओं को पानी की अहमियत मालूम है। फिलहाल गडमऊ ग्राम पंचायत में करीब 623 नल कनेक्शन हैं।

सरपंच ममता सुदामा डोबले बताती हैं कि पेयजल के लिए मारामारी को देखकर वर्ष 2012 में सरपंच के लिए चुनाव लड़ीलेकिन दुर्भाग्य से हार गई। इस बार चुनकर सरपंच बनीलेकिन पहले ही सरकार ने नल.जल योजना के तहत गांव में पेयजल का समाधान कर दिया। सरकार की इच्छाशक्ति और अधिकारियों की संवेदनशीलता से सब कुछ आसान हो जाता है। उन्होंने कहा कि जब गर्मी के दिनों में कहीं से पानी नहीं मिलता थातो पंचायत की तरफ से टैंक मंगाए जाते थे। उस टैंकर के पीछे महिलाएं बदहवाश भागती हैं। एक किस्सा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि गांव की एक महिला इसी तरह पानी के पीछे भागते हुए पत्थर से टकरा गई और उनका पैर ही टूट गया । वह हमेशा हमेशा के लिए दिव्यांग हो गईं।

 

वहीं अनिता बताती हैं कि उनकी सास ने उन्हें बताया था कि पानी की तलाश में भटकने के दौरान छोटे बच्चों को बड़े बच्चों के हवाले कर घर से निकलना पड़ता था।  एक बार उनकी सास के 3 माह के देवर को बड़े बेटे के हवाले कर जो अभी मात्र 3 साल का ही थापानी के लिए निकल गई थी । छोटा भाई रोने लगातो बड़े ने उसे झूले पर झुलाना शुरू किया । ऐसे में छोटे के गले में रस्सी फंस गई। पड़ोसी ने देखा और तुरंत उसे रस्सी से आजाद कर अस्पताल ले गयाजहां किसी तरह उसकी जान बच पाई। देवर अब 29 साल का हो गया हैपरंतु सास को वह डरावनी कहानी अब भी अच्छी तरह याद हैँ।  अनिता ने कहा कि जितना समय पहले पानी के पीछे चला जाता थाउसे अब महिलाएं रोजगार में लगाकर अपनी आय बढ़ा रही हैं । अनिता की एक दुकान हैजहां से  उन्हें प्रतिमाह 4000 रुपए की आय हो रही है। इस आय से वह परिवार की  मदद करती है और उनका जीवन स्तर भी पहले की अपेक्षा काफी बेहतर हुआ है। इन सब कारणों से वह जलकर वसूली में ज्यादा रुचि लेती हैंताकि यह सिलसिला थमे नहीं। 

 

 इसी तरह ग्राम मऊ से प्रेरणा स्व सहायता समूह की सचिव सविता ढोबले बताती है कि पानी के लिए दो किलोमीटर तक का सफर तीन गुंडी घड़ा सिर पर रखकर तेज कदमों चलकर जाना पड़ता था। वहां कुएँ में रस्सी डालकर पानी खींचने से हाथों में छाले पड़ जाते थेलेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आता थाउसी तकलीफ में 25 लीटर पानी सर पर रखकर लाना पड़ता था। इसके अलावा पानी के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ती थीइससे समय अधिक लग जाता था। कुएं  से चार.पांच महिलाएं इकट्ठे पानी खींचने लगती थीयह सोचकर कि कहीं पानी खत्म न हो जाए। ऐसा भी होता थाजिनका कुआं हैवह पानी भरने से मना करते थेअगर महिलाएं नहीं मानीतब वे कुएं में गोबर डाल देते थेमहिलाओं को अपमानित करते थे।  ऐसे में  आए दिन खाली गुंडी वापस घर लाना पड़ता था। कभी.कभी तो गुंडी को ही फोड़ देते थे। वह दर्द कभी भूलाया नहीं जा सकता। यहां लोगों के पास बहुत छोटे.छोटे खेत हैजिसके चलते पुरुषों को काम के लिए पलायन करना पड़ता है और महिलाएं दिन भर पानी के पीछे भाग दौड़ करती थी। इससे बच्चों का जीवन प्रभावित होता था।

 

              

 

प्रीति प्रेरणा स्व सहायता समूह से जुड़ी हैं । वह बताती है कि घर पर पानी मिलने से वह सिलाई का काम करने लगी। अब परिवारों में पहले जैसा तनाव नहीं है। गांव में अब पानी को लेकर चर्चा कम होने लगी। प्रीति भी अन्य महिलाओं के साथ जल कर वसूलने में साथ देती है। वह कहती हैं कि महिलाएं अपनी कमाई से ही जलकर अदा कर देती हैं।

 

 

 

 संत रविदास स्व सहायता समूह की सचिव संध्या बघेल अब अपना समय गांव में लैंगिक समानता के लिए जागरूक करने में लगाती हैं। उन्होंने कहा कि दूषित पानी से होने वाली डायरियाउल्टी दस्त जैसी बीमारियां भी अब गांव में नहीं देखी जाती।  बच्चे भी पहले की अपेक्षा कम कुपोषित हैं। घरेलू हिंसा में भी कमी आई है।  कुल मिलाकर महिलाएं जागरूक हुई हैं ।

 

मोहखेड़ समूह जल प्रदाय योजना के प्रबंधक बसंत कुमार बेलवंशी बताते हैं दरअसल वर्ष 2012 में मोहखेड ब्लॉक में पानी की समस्या को देखते हुए पीएचई ने वर्ष 2012 में काम करना शुरू कर दिया था। पीएचई ने वर्ष 2013 में यह जिम्मेदारी जल निगम को दे दी। प्रारंभ में इस परियोजना में 18 गांव को जोड़ा गया था। जल निगम को जुलाई 2013 में इस योजना के लिए तकनीकी स्वीकृति और 2015 में प्रशासकीय स्वीकृति के बाद कार्य  प्रारंभ किया गया । इसे पूरा होने में 2 साल का समय लगा। मार्च 2018 में यह योजना पूरी तरह तैयार हुई और मार्च 2018 में ही पानी की सप्लाई शुरू कर दी गई। जल संसाधन की ओर से पानी के आवंटन के बाद पानी की उपलब्धता को देखते हुए इस परियोजना में 29 राजस्व गांवों को शामिल कर लिया गया। इसके अलावा गांव में नए बने घरों में पानी का कनेक्शन देने के लिए रेट्रोफिटिंग का काम चल रहा है।  इस योजना के तहत तगभग 8500 कनेक्शन है और सीधे तौर पर लगळाग 50 हजार आबादी इससे लाभान्वित हो रही है । मुझे बताते हुए गर्व हो रहा है कि जलकर में एक भी समिति डिफाल्टर नहीं है। उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास है कि माचागोरा समूह जल प्रदाय योजना का काम पूरा होने के बाद छिंदवाड़ा जिले के और 711 ग्रामों में भी पानी की समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। 

 

जल निगम के इंजीनियर युवराज वर्मा और यश दोदानी ने बताया कि जल निगम प्रति व्यक्ति न्यूनतम 55 लीटर पानी उपलब्ध कराती है लेकिन जल कर और जल से संबंधी कोई भी निर्णय जल समिति को लेने का पूरा अधिकार है।




 







पीएमईजीपी   लोन से ग्रामीण उद्यमियों ने संवारा जीवन

रूबी सरकार
मध्य प्रदेश का बड़वानी जिला 1948 से पहले राज्य की राजधानी हुआ करता था। यह छोटा सा राज्य अपनी चट्टानी इलाकों और कम उत्पादक भूमि के चलते अंग्रेज, मुगल और मराठों के शासन से बचा रहा। यहां जैन तीर्थ यात्रा का केंद्र चूलगिरि और बावनगजा के लिए मशहूर है। मध्य प्रदेश के दक्षिण पश्चिम में स्थित बड़वानी के दक्षिण में सतपुड़ा एवं उत्तर में विन्ध्याचल पर्वत शृंखला है। करीब 13 लाख आबादी वाले बड़वानी को 25 मई 1998 को मध्यप्रदेश में जिले का दर्जा मिला। आदिवासी बाहुल्य इस जिले  की साक्षरता दर करीब 50 फीसदी से कम है। अति पिछड़ा होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में जिन 112 आकांक्षी जिलों का चुनाव किया था, उनमें बड़वानी भी शामिल हैं। लेकिन वर्ष 2014 से 2021 के बीच इस जिले ने इतनी तरक्की की कि यह प्रदेश के टॉप 10 जिला में शुमार हो गया। राज्य नीति आयोग की ग्रेडिंग के अनुसार यह जिला वर्ष 2021 में प्रदेश के टॉप 10 जिले में शामिल हो गया। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि यहां कृषि के साथ-साथ सूक्ष्म उद्योगों की ओर युवाओं ने हाथ आजमाना शुरू किया।
दरअसल खुद का कारोबार शुरू करने के लिए प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत मिलने वाली राषि युवाओं के लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ। इसी जिले की तीन आदिवासी संतोष वसुनिया, पवन और लक्ष्मी वाणी से उनके स्वरोजगार के संबंध में बात की, तो पता चला कि तीनों ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत लोन लेकर अपना कारोबार शुरू किया है।
पेटलावद की 44 वर्षीय संतोष वसुनिया बताती है कि जब कोरोना महामारी के दौरान शहर से गांव की ओर लोग पलायन कर रहे थे, तब उसके मन में एक बात कौंधी कि आखिर इतने लोगों की आजीविका कैसे चलेगी। क्योंकि उस वक्त तक गांव में कोई रोजगार के साधन नहीं थे। कृषि और कृषि मजदूरी के अलावा ग्रामीण पलायन पर ही जाते थे। असंख्य प्रवासियों को इस तरह बदहवास अपने-अपने गांव की ओर लौटते देखकर संतोष विचलित हो गई। उसी वक्त उसने ठान लिया कि निर्वाह के लिए कम वेतन वाले काम करने से बेहतर है कि सरकार से लोन लेकर छोटा व्यवसाय शुरू कर जीवन को सुरक्षित किया जा सकता है। संतोष दरअसल झाबुआ की है और शादी के बाद वह पेटलावद आई। उसने कहा कि  मैंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे, बहुत सारी चुनौतियों का सामना किया है, पिता कृषि मजदूर थे। वह बताती हैं, ज वह सिर्फ  4 साल की थी, तब उसके पिताजी गुजर गए। मां को छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर मजदूरी करने जाना पड़ता था। होनहार होते हुए भी वह 10वीं तक ही पढ़ पाई थी कि उसकी शादी कर दी गई और वह पति के साथ पेटलावद चली आई। उसने दो संतान को जन्म दिया। संतोष बताती है  कि लेकिन मेरी जिजीविषा मुझे कहीं रुकने नहीं दिया। कभी नाउम्मीद नहीं हुई। आत्मनिर्भर होने की  इच्छा ने कभी उसका पीछा नहीं छोड़ा। जबकि उसके परिवार में किसी का व्यवसाय से कोई नाता नहीं था। लॉकडाउन खत्म होते ही उसने सौंदर्य प्रसाधन की  दुकान खोलने का निर्णय लिया । इस बीच उनका संपर्क  ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया (टीआरआई) एंटरप्रेन्योरशिप फैसिलिटेशन हब टीम से हुआ और वह उनकी मदद से  व्यवसाय की दिशा में काम करने लगी ।
उसने अपनी बचत से  एक लाख रुपए का निवेश किया और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना (पीएमईजीपी) के तहत वित्तीय सहायता के रूप में 3.75 लाख रुपए प्राप्त कर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया। अब  संतोष   का सौंदर्य प्रसाधन के साथ-साथ जलपाल इत्यादि से संबंधित एक सफल दुकान है । जिससे वह अपने परिवार को आर्थिक मदद कर रही है।
संतोष की तरह पवन जमरे और लक्ष्मी वानी भी बताती हैं कि ग्रामीण भारत में कितनी मानवीय क्षमताएं मौजूद हैं। ऐसे समय में जब बेरोजगारी चरम पर है, बड़वानी के राजपुर ब्लॉक के चितावल गांव के 20 साल के पवन ने एक उद्यमी के रूप में कदम आगे बढ़ाया है। वह एक छोटे किसान परिवार से आते हैं और महज 8वीं तक पढाई की है। वह बताते हैं,  कि मैंने अपने गांव के पास के एक इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान पर एक दैनिक मजदूर के रूप में काम करना शुरू किया था और प्रतिदिन लगभग 150 से 200 रुपए कमा लेता था। टीआरआई की  सुमन सोलंकी ने इलेक्ट्रॉनिक्स में मेरी दिलचस्पी को देखते हुए मुझे ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान से मोबाइल रिपेयरिंग ट्रेनिंग प्रोग्राम में भाग लेने सुझाव दिया और इसमें नामांकन कराने में मेरी मदद की।

अब पवन के पास अपना खुद का मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान है। जुलवानिया, बड़वानी में एंटरप्राइज फैसिलिटेशन हब ने उन्हें उनके व्यवसाय को सशक्त बनाने के लिए एक्सीलरेटेड एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम (एईडीपी) में भाग लेने में मदद की। प्रशिक्षण के दौरान, पवन ने अगले 3 वर्षों के लिए अपना खुद का बिजनेस प्लान तैयार किया और लोन भी प्राप्त किया।

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वर्षीय लक्ष्मी वानी की भी कुछ इसी तरह की कहानी है। वह बड़वानी के नेवाली विकासखंड के नेवाली गांव की रहने वाली हैं और ओबीसी समुदाय से संबंध रखती हैं। जैसा कि कम आय वाले ग्रामीण परिवारों में आम है, लक्ष्मी ने सिर्फ 11वीं कक्षा तक पढ़ाई की और कम उम्र में ही उनकी शादी कर दी गई। एक दिहाड़ी मजदूर की पत्नी और तीन बच्चों की मां के रूप में, वह आय के दूसरे साधन तलाशने लगीं.

वह बताती हैं, मैं नेवाली गांव में टीआरआई इंडिया की यूथ हब टीम द्वारा आयोजित एक अभियान में शामिल हुई, और उद्यमिता के प्रति मेरी रुचि बढ़ी । मैं कंप्यूटर की बुनियादी बातें जानती थी और एक कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) चलाने का सपना मैं पहले से ही देखती आ रही थी। यूथ हब टीम ने बड़वानी में ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान  के साथ मिलकर लक्ष्मी को छह दिन के आवासीय सीएससी आईडी ट्रेनिंग एंड सर्टिफिकेशन कोर्स में नामांकन करा दिया। अब वह अपना खुद का सीएससी बिजनेस चला रही हैं । इस तरह लक्ष्मी अपने गांव की दूसरी महिलाओं की प्रेरणास्रोत बन गई हैं।
यूथ इनिशिएटिव ऑफ ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया में प्रैक्टिशनर, रानू कुमार सिंह कहती हैं, सफलता की ये कहानियां जमीनी स्तर के उन स्वयंसेवी संस्थाओं के महत्व पर जोर देती हैं, जो ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को उनका खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए  वित्तीय साक्षरता प्रदान करते हैं और साथ ही प्रशिक्षण, मार्केट रिसर्च, प्रॉडक्ट डेवलपमेंट और अन्य जरूरी कौशल उपलब्ध कराते हैं।



22 हजार किसानों ने फूंका ऑर्गेनिक फूड का मंत्र

 




22 हजार किसानों ने फूंका ऑर्गेनिक फूड का मंत्र

रूबी सरकार

निरंतर वैश्विक अनिश्चितताओं और खाद्य प्रणाली के लिए बढ़े खतरे को देखते हुए जी-20 की तरफ से सामूहिक प्रयास की ओर ध्यान दिया जा रहा है। भारत अपने कृषि अनुभव के आधार पर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत के पास गंभीर खाद्य सुरक्षा से निकलने का अनुभव है।भारत को जी-20 की अध्यक्षता ऐसे समय मिली जब विश्व मानव इतिहास के सबसे  अनिश्चित   दौर से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली देशों की अध्यक्षता ग्रहण करने के साथ प्राथमिकताएं भी बताई। उन्होंने कहा कि भारत का एजेंडा भोजनउर्वरक और चिकित्सा उत्पादों की वैश्विक आपूर्ति का अराजनीतिकरण करके जी-20 देशों के बीच सहयोग और समन्वय को मजबूत किया जाना है।

विकासशील देशों में भूख और खाद्य असुरक्षा की समस्या कोई नई नहीं है। इसके समाधान के लिए जी-20 देशों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कदम उठाए। टिकाऊ खेती और खाद्य आपूर्ति प्रणाली की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। हालांकि भारत के किसानों को जैविक खेती के बारे में पहले से मालूम थालेकिन वे बाजार के प्रभाव में आकर रासायनिक खेती करने लगे थे। जिससे उनकी जमीन की उर्वरा शक्ति कम होने लगी। अब जब जी-20 के कॉन्क्लेव के जरिए इसका प्रचार-प्रसार होने लगातो देश के कोने- कोने में किसानों को यह समझ आने लगा कि जैविक विधि से खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है साथ ही किसानों की आय भी बढ़ती है । अंतरराष्ट्रीय बाजार की  स्पर्धा में जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं तथा सामान्य उत्पादन की अपेक्षा किसानों को अधिक लाभ प्राप्त हो रहा है। लेकिन इसके लिए उन्हें श्रम अधिक करना पड़ेगा। उन्हें स्वयं प्राकृतिक दवाइयां तैयार करनी होगी।

मध्यप्रदेश के कटनी जिले के मानव जीवन विकास समिति ने यह बीड़ा उठाया और कटनी के साथ-साथ दमोह जिले के किसानों को प्राकृतिक दवाइयों का प्रशिक्षण देना शुरू किया। इस समिति से जुड़ी मिलन धुर्वे ने बताती है कि किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करने और उनकी लागत कम करने के उद्देष्य से उन्होंने प्राकृतिक दवाइयां तैयार करने का प्रशिक्षण देने महिला समूहों को अपने साथ जोड़ा और उन्हें 25 तरह की प्राकृतिक दवाइयां बनाने की ट्रेनिंग निशुल्क देना प्रारंभ की । धीरे-धीरे महिला समूह की संख्या बढ़ने लगी। वह कटनी के साथ-साथ दमोह जिले में भी दवाइयों का प्रशिक्षण देने जाने लगीं । इस तरह वह मास्टर ट्रेनर बन गईं। मिलन बताती हैं कि वह दमोह जिले के ग्राम पंचायत धनेटामॉलमगदूपुरा और सहरी के महिला समूह को प्राकृतिक दवाइयां तैयार करने का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद की है। जब महिला समूह ने प्राकृतिक दवाइयां बनाना सीख लियातो वे इसे किसानों को बेचने लगीजिससे उन्हें एक सीजन में 10 से 15 हजार रुपए तक की आय होने लगी। प्रशिक्षित महिलाएं इतनी जागरूक हो गई  िक वे अपने खेत के एक हिस्से में परिवार  के लिए जैविक का उत्पादन करने लगी। बाजार के लिए तो वे धान, मूंग, उड़द बो रही हैं, लेकिन अपनी थाली के लिए जैविक को ही प्राथमिकता देने लगी हैं। समिति ने अब तक इन दो जिलें के करीब 200 गांवों में 22 हजार किसानों को  गैर कीटनाशक प्रबंधन आधारित खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया है।   समिति की ओर से  किसानों व समितियों  को नाडेप, भू-नाडेप, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि बताई जा रही है। इसके अलावा सुपर कंपोस्ट खाद, मटका खाद, खरपतवार नियंत्रण, जैविक कीट एवं रोग प्रबंधन, आग्नेयास्त्र तैयार करने की विधिमठास्त्र, नीमास्त्र, हींगास्त्र, लमित रस, चूसक, पीली पट्टी, दशपर्णी पोषक तत्व प्रबंधन, पंचगव्य, फसल एवं फल वर्धक टॉनिक, बीजामृत, बीज शोधक के बारे में भी बताया जा रहा है।

जैविक खेती के साथ ही समिति बिजौली विकासखंड में पानी, पर्यावरण और आजीविका के सिद्धांत को भी आगे बढ़ा रही है। यहां किसानों को बीजामृत से बीज शोधन, गुड़ से बीज शोधन, जीवामृत, अजोला, जैव उर्वरक, धान सघनीकरण के बारे में प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें खेत का चयनतैयारी, बीज चयनबीजोपचार, नर्सरी की तैयारीपौधे की रोपाई, खरपतवार नियंत्रण, रोग व कीट नियंत्रण , श्रीविधि से धान की खेती जैसी जानकारी देकर  कई एकड़ में जैविक  का उत्पादन किया जा रहा है और औषधियां तैयार की जा रही है। समिति के सचिव निर्भय सिंह  बताते हैं कि गांव में यह एक बेहतर स्टार्टअप होता जा रहा है।

जल संरक्षण पर विशेष जोर

वर्षा जल को सहेजने के लिए किसानों को प्रेरित किया जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में पौधा रोपण पर जोर दिया जा रहा है। सचिव निर्भय सिंह का कहना है कि लोगों को समझना होगा कि खेती में रासायनिक खाद का उपयोग जिंदगी में जहर घोलने जैसा है। जैविक खेती को बढ़ावा देने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए पौधरोपण, जल संचय बहुत आवश्यक है। हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।  मोटे अनाज मक्काज्वारबाजराकोदो-कुटकी के उत्पादन और उपयोग पर जोर देने के लिए समिति किसानों को लगातार जोड़ रही है।