Saturday, June 24, 2023
क्या मालवा-निमाड़ से भी चलेगी कैंसर एक्सप्रेस?
Madanlal, Kasrawat
Ishwar Patidar, Kasrawat
16 Oct 2018
क्या मालवा-निमाड़ से भी चलेगी कैंसर एक्सप्रेस?
रूबी सरकार
पंजाब के बटिंडा से राजस्थान के बीकानेर तक चलने वाली अबोहर जोधपुर एक्सप्रेस यूं तो किसी भी सामान्य ट्रेन की तरह हो सकती थी, लेकिन पंजाब के हरे-भरे खेतों वाले इलाकों से जिस तादाद में लोग आचार्य तुलसी कैंसर संस्थान , बीकानेर में अपनी जांच और इलाज करवाने के लिए इस ट्रेन से सफर करते हैं, उससे इस ट्रेन का नाम ही कैंसर एक्सप्रेस हो गया है। जी हां , मध्यप्रदेश का मालवा-निमाड़ क्षेत्र जो अपनी उपजाऊ ज़मीनों के लिए जाना जाता था, अब कैंसर का घर बन चुका है। यहां से गुजरात के कैंसर अस्पतालों को जाने वाली बसें इसकी गवाह है।
इस सेवा के संचालकबताते हैं, कि पहले बस सीधे अहमदाबाद के लिए जाती थी, लेकिन सारे यात्री बड़ोदरा के बाघेडिया धीरज अस्पताल तक ही सफर करते थे और वहां पहुंचते ही पूरी बस खाली हो जाती थी, इसलिए पहली बार 2013 में एक विशेष बस खरगोन से सिर्फ धीरज कैंसर अस्पताल तक के लिए शुरू की गई, लेकिन मरीजों की संख्या धीरे-धीरे इतनी बढ़ गई, कि दूसरी विशेष बस चलानी पड़ी। यात्रियों की सुविधा के लिए बस पर ही खरगोन से धीरज अस्पताल लिखवा दिया गया है।
ऐसी ही एक बस में सफर कर रहे कुछ मरीजों से इस संवाददाता ने बातचीत की। भील गांव की राधा बहन ने बताया, कि वह खेतों में अपने पति के साथ काम करती है, लेकिन अब उसका शरीर साथ नहीं देता। 10 साल पहले उसकी आंखों और शरीर में जलन शुरू हुई, जिसका इलाज उसने पहले महेश्वर और फिर बड़वानी के डॉक्टरों से करवाया । जब आराम नहीं मिला, तो किसी की सलाह पर वह धीरज कैंसर अस्पताल पहुंची । वहां के डॉक्टरों ने तमाम जांच के बाद बच्चेदानी में गठान बताया। कुछ समय तक लगातार राधा खरगोन से बड़ौदा फॉलोअप के लिए जाती रही। थोड़ा आराम भी मिला, लेकिन पैसे खत्म हो गये, तो उसने इलाज के लिए जाना बंद कर दिया। अब जब दोबारा तकलीफ बढ़ी, तो इलाज के लिए उसे जाना पड़ रहा है। इसी तरह ढाबा गांव के जगदीश मीणा को कीमो थैरेपी के लिए धीरज अस्पताल हर 21 दिन के बाद जाना पड़ता है। कसरावद के महेन्द्र वर्मा का तो दो महीने पहले मुंह के कैंसर का ऑपरेशन हुआ है। इसी तरह 62 वर्षीय रमेश सिंह राठौर का 2011 में धीरज अस्पताल में ही पेट के कैंसर का ऑपरेशन हुआ है। अधिकतर समय खेत में बिताने वाले भगवान सिंह राठौर तो अब लगभग बिस्तर पर ही हैं। उनका मर्ज तो ठीक-ठीक पकड़ में भी नहीं आ रहा है।
बस में यात्रियों को बैठाने वाला सोनू जायसवाल बताता है, कि वर्ष 2013 से वह यह काम कर रहा है। उसने कहा, गनीमत यह है, कि मेरी मां धीरज अस्पताल से इलाज के बाद ठीक हो गई, जबकि कई मरीजों की तो इलाज के दौरान ही मौत हो गई। सोनू ने बताया, पिछले 5-6 सालों से वह यही काम कर रहा है। उसने कहा, धीरे-धीरे मरीजों की बढ़ती संख्या को देखकर ऐसा लगता है, कि पंजाब की तरह यहां भी कहीं ट्रेन न चलानी पड़े । उसने कहा, कि उसे दुख तो बहुत होता है, लेकिन उसे यह नहीं मालूम , कि आखिरी कैंसर होता क्यों है। डॉक्टर इलाज तो करते है, पर यह नहीं बताते, कि आखिर मरीज बढ़ क्यों रहे हैं।
द रिसर्च ट्रायल इन्टीट्यूट ऑफ ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर (एफआईबीएल)के कृषि विशेषज्ञ ईश्वर पाटीदार ने बताया, कि दरअसल खेतों में लगी फसलों को इल्लियों, कीड़ों-मकोड़ों या तना-छेदक और चूसक कीटों या नींदा से बचाने के लिए किसान द्वारा कीटनाशक या नींदानाशक और यूरिया का जो इस्तेमाल हो
रहा हैं, वह न केवल वातावरण को प्रदूषित कर रहा है, वरन् सांसों के जरिये इंसान के शरीर में जाकर उसे कैंसर की ओर धकेल रहा है। खेतों में रसायन का प्रयोग पूरे मालवा-निमाड़ में इतना बढ़ गया है, कि अब इससे बच पाना लोगों के लिए मुश्किल होता जा रहा है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कसरावद के डॉ. राकेश पाटीदार इस क्षेत्र में कैंसर के प्रभाव अधिक होने के बारे में बताते हैं, कि किसान अधिक उपज के लिए खेती में बेतहाशा विषैले रसायनों का प्रयोग करते हैं। दूसरी तरफ बीटी कपास क ी वजह से भी लोग आंखों और चर्म रोगों से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। चर्म रोग तो अब दवा से भी ठीक नहीं हो रहा है। ऊपर से स्थानीय लोगों के पुरज़ोर विरोध के बावजूद एक निजी खाद कंपनी को यहां कारखाना लगाने की अनुमति देकर सरकार ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। फर्टीलाइजऱ कंपनी की वजह से ज़मीन का पानी पूरी तरह दूषित हो चुका है।
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. चंद्रेश बताते हैं, कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में आने वाले 99 फीसदी मरीज फंगल इन्फेक्शन से पीडि़त होते हैं, जिन पर अब दवा भी असर नहीं करती। डॉ चंद्रेश कैंसर जैसी बीमारियों के पीछे रासायनिक खादों, कीटनाशक,नींदानाशक,अंकुरण-नाशक और फफूंद-नाशक दवाओं को ही जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने कहा, कि पहले कैंसर जैसी बीमारी गांवों की तुलना में शहरों में अधिक पाई जाती थी, क्योंकि शहर का हवा,पानी, भोजन, रहन-सहन को इसके लिए जिम्मेदार माना जाता था, लेकिन अब शहर और गांव में कोई विशेष अंतर नहीं रह गया है। शहरों में पहले से आई बीमारियां अब गांवों में भी उतनी ही मात्रा में व तेजी से फैल रही हैं।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 5 कृषि रसायनों को कैंसर का कारण माना
मेंरे पास 600 हेक्टेयर जमीन हैं , जिसपर मैं जैविक खेती करता हूं। टीकरी विकास खण्ड (बड़वानी) के आस-पास के लगभग गांव पूरी तरह से बायो डायनेमिक और जैविक खेती करते हैं। लोगों को कैंसर से बचाने के लिए सरकार को जैविक खेती पर ध्यान देना चाहिए और रासायनिक खेती को पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विभीषिका की तरह फ़ैल रहे कैंसर रोग का दोषी कुल 5 कृषि रसायनों को माना है। ये सब रसायन सारे पश्चिमी देशों में प्रतिबंधित हो चुके हैं, लेकिन भारत में अभी भी धड़ल्ले से बिक रहे हैं। किसान अधिक उपज की लालच में इसके चपेट में आ रहे हैं । जिसका दुष्परिणाम कैंसर के रूप में देखने को मिल रहा है। यहां तक कि वही रसायन पीकर किसान आत्महत्या तक कर रहे हैं।
दूसरी तरफ मिश्रित खेती के बंद होने से जो विविधता की हानि हुई है, उसकी पूर्ति नहीं हो सकती। कपास में पैसा आ गया, पर दालें ख़त्म हो गईं। गरज यह , कि प्रोटीन के अभाव में हमारी खाद्य सुरक्षा तो खतरे में आ गई। खरगोन ही नहीं बड़वानी के राजापुर से भी बस भरकर लोग कैंसर के इलाज के लिए बड़ौदा- अहमदाबाद जा रहे हैं।
मदनलाल
अध्यक्ष
बायो रि एसोसिएशन
अजन्दी गांव
टीकरी विकास खण्ड
बड़वानी
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आखिर हम किस दौर में जा रहे
जैविक कपास के उत्पादन में पूरी दुनिया में मध्यप्रदेश पहले नम्बर पर है। हालांकि इसका रकबा सरकार की उदासीनता के चलते लगातार कम होता जा रहा है। किसान क्वालिटी के बजाय क्वान्टिटी पर ज़ोर दे रहे हैं। वे ज्यादा से ज्यादा उत्पादन लेना चाहते हैं। इस होड़ में हर किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करने लगे हैं। नतीजतन इस इलाके में लगभग 70 फीसदी से ज्यादा किसान कैंसर से पीडि़त हो गये हैं। बहुत दुखद और शर्म की बात है, कि खरगोन से धीरज अस्पताल के लिए दो-दो विशेष बस चलाई जा रही हैं।
विवेक रावल
सीईओ और निदेशक
बायो रि इण्डिया लिमिटेड
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झूठ फैलाया जा रहा है
रासायनिक और बीटी की खेती से किसान प्रभावित हो रहे हैं। यह सिर्फ कोरी कल्पना है, कि रासायनिक खाद और कीटनाशक से किसान बीमार नहीं हो रहे हैं, बल्कि बीमार होने के कई अन्य कारण है। इसके बारे में अध्ययन होने चाहिए। रासायनिक और कीटनाशक से बीमार होने का भी कोई अध्ययन आज तक नहीं हुआ है और न ही इस तरह के कोई आंकड़े उपलब्ध हैं।
डॉ. राजेश राजौरा
प्रमुख सचिव
किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग
भेडिय़ों से बचकर आई बेटी अग्रि परीक्षा देने को मजबूर
भेडिय़ों से बचकर आई बेटी अग्रि परीक्षा देने को मजबूर
रूबी सरकार
बैतूल से लगभग 35 किलोमीटर दूर माकड़ा गांव के कोरकू समुदाय की 10वीं पास 17 वर्षीय किशोरी देविका दो माह पहले तक दिहाड़ी मजदूरी पर कटाई के लिए सुबह ट्रेन से होशंगाबाद जाती और देर रात वापस लौटती थी। एक दिन अचानक वापसी में उसका मोबाइल फोन गुम गया। उसने घर पर किसी को नहीं बताया और अगले दिन अपने नम्बर पर फोन लगाया। उधर से किसी पुरुष की आवाज़ आई, जिसने उससे कहा, फोन उसके पास है, जब वह मिलेगी, तो वह फोन वापस कर देगा। अगले दिन दो लड़के देविका को उसका फोन वापस देने की बात कहकर उसी ट्रेन में मिले, लेकिन फोन वापस करने के बजाय उससे इधर-उधर की बातें करने लगे। धीरे-धीरे उन लड़कों ने उसे झांसे में ले लिया और दीपावली के दिन देविका के गांव आकर उससे कहा, कि मेरी मां तुमसे मिलना चाहती है, चलो तुम्हे उनसे मिलवाकर वापस छोड़ देंगे। देविका उनकी बातों में आ गई और किसी को बिना बताये उन लड़कों के साथ चल दी। जब लड़कों ने उसे ट्रेन में बिठाया, तब वह डर गई और घर वापस लौटने की जि़द करने लगी। उस वक्त लड़कों ने न जाने उसे क्या खिला दिया , कि वह बेहोश हो गई। जब उसे होश आया, तो वह कूनी (राजस्थान)पहुंच चुकी थी। उसके बाद तो उसे एक घर में बंद कर दिया गया, जहां से भागने का कोई रास्ता ही नहीं था। देविका समझ गई, कि वह अगवा हो चुकी है। उसे पता चला, कि दोनों आपस में मामा -भांजा हैं और घर पर एक औरत भी है। दोनों लड़कों में से एक का नाम पवन था, जो लगातार 22 दिनों तक देविका से दुष्कर्म करता रहा। एक दिन उसे पता चला, कि उसे 2 लाख रुपये में नागौर जिले के लाडपुर में मुन्नूराम को बेच दिया गया है। अब मुन्नूराम ने उसे यह कहकर बंधक रख लिया, कि तुम्हारी शादी अपने बेटे से करायेंगे। लगभग एक माह बीत चुका था, लेकिन न तो वह देविका की शादी करवा रहा था और न ही उसे आज़ाद कर रहा था। इस बीच एक दिन मुन्नूराम उसे एक शादी समारोह में ले गया, जहां उसने सूझ-बूझ दिखाते हुए एक औरत से अपने पिता शांताराम से बात करने के लिए फोन की मांग की और जैसे ही उसे फोन मिला , उसने तुरंत अपने पिता को फोन लगाकर अपने साथ हुई ज्यादतियों के बारे में बताया। तुरंत स्थानीय थाने पहुंचा, लेकिन उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई। निराश होकर वह बैतूल पुलिस अधीक्षक के पास पहुंचा और पूरी कहानी बताई। पुलिस अधीक्षक ने आरोपियों को पकडऩे और देविका को बरामद करने पुलिस की एक टीम को तुरंत राजस्थान में दबिश दी और देविका को बरामद कर वापस बैतूल ले आये। लेकिन आरोपी फरार हो गये।
बैतूल पहुंचकर देविका को पता चला, कि इन लड़कों का यही धंधा है। ये लड़कियों को अपनी जाल में फंसाकर उसे राजस्थान और हरियाणा में बेचने का काम करते हैं। उसने कहा, उसका फोन तो मिला नहीं, उल्टे पायल और बिछिया भी पवन ने उतार लिये।
बहरहाल, अब गांव में शांताराम का परिवार अलग-थलग है। जब जात पंचायत नहीं बैठेगा, तब तक इस परिवार का हुक्का-पानी बंद रहेगा। न ही उसके यहां कोई चाय-पानी पीने आयेगा और न ही वह गांव के हैण्डपम्प या कुंए से पानी ले पायेंगे। शांताराम बताते हैं, कि जात पंचायत में कम से कम 50 हजार का खर्च आयेगा। इसके लिए उसे कर्ज लेना पड़ेगा।
महिला सशक्तीकरण के लिए इस कुप्रथा को रोकना ही होगा
इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए लगातार 7-8 सालों से जात पंचायत के बुजुर्ग, ग्राम सभा और महिलाओं के बीच बातचीत चल रही है। खासकर उन लोगों से जो निर्णायक की भूमिका में होते हैं। इस तरह की प्रथा आदिवासी रीति-रिवाजों में भी नहीं हैं। हम लोगों ने यह भी कहा है, कि इस तरह के मामले ग्राम सभा में जाना चाहिए।
अगर महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में बात करें, तो इस तरह की पंचायत में महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता। जबकि समाज के भीतर व बाहर आदिवासी महिलाएं ज्यादा सशक्त मानी जाती हैं। यहां महिलाएं आज़ाद है और इस तरह की व्यवस्थाएं उन्हें पितृसत्तात्मक व्यवस्था की ओर धकेलने का प्रयास करती है तथा महिलाओं को आगे बढऩे से रोकती है। लगातार बातचीत का नतीजा है, कि बैतूल जिले के कुछ आदिवासी महिलाएं इस कुप्रथा का विरोध भी करने लगी है। इनमें शशिकलाबाई का नाम उभर कर सामने आया है, जिन्होंने पंचायत में सवाल उठाये थे। इस तरह की प्रक्रिया किसी भी महिला के अधिकार और उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती है।
जहां तक लड़कियों की खरीद-$फरोक्त का सवाल है, तो इसके लिए ग्राम सभा और प्रदेश सरकार से पैरवी की जा रही है, कि लड़कियों को पढ़ाई और रोजगार गांव में ही मिले। वह स्वयं तय करें, कि वे क्या करना चाहती हैं। तभी महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल सकता है।
इस कुप्रथा को आने में लम्बा समय लगा और इसे दूर करने में भी लम्बा समय लगेगा। लेकिन उम्मीद है, कि धीरे-धीरे यह समाप्त होगा। इसके लिए समुदाय के भीतर और बाहर दोनेां स्तरों पर बात चल रही है।
रेखा गुजरे
प्रदीपन संस्था
बैतूल
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क्या है जात पंचायत
अन्य समाज के साथ शारीरिक संबंध होने पर कोरकू समाज लड़की और उसके परिवार को अशुद्ध मानता हैं। जब लड़की स्वयं अपनी गलती स्वीकार करती है और कहती है, कि वह अपने सामाजिक रीति-रिवाज से पंचायत की बात से सहमत है, तब गांव के बुजुर्ग कोई तिथि निश्चित करती है। उस दिन लड़की को नदी के पास ले जाया जाता है, जहां एक गड्ढा खोदकर उसमें लड़की को खड़ा कर दिया जाता है। फिर उसके ऊपर घास-फूस की एक झोपड़ी बनाई जाती है और उसमें आग लगा दी जाती है। जब थोड़ी बहुत आग लड़की के बालों को छूने लगती है, तो उसे वापस निकालकर नदी में स्नान करवाया जाता है और लड़की पानी में खड़े होकर अपनी गलती मानकर माफी मांगती है । उसके बाद वह अपने सारे गीले वस्त्र वहीं नदी किनारे छोड़कर शुद्ध कपड़े पहनती है। यह सारी प्रक्रिया भूमका (पंडित) की उपस्थिति में होता है। इसके बाद पूरे गांव वालों को उनकी मांग के अनुसार सामूहिक भोज करवाया जाता है। तब जाकर कहीं लड़की पुन: अपने जात में शामिल हो पाती है।
खुद समाज से तिरस्कृत होने के बावजूद अनाथ बेटियों को अपनाया
22 JANUARY 2019
खुद समाज से तिरस्कृत होने के बावजूद अनाथ बेटियों को अपनाया
्ररूबी सरकार
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किन्नरों को 'थर्ड जेण्डरÓ की मान्यता दिये जाने के बावज़ूद समाज उनकी उपेक्षा और तिरस्कार करता है। लेकिन इसके विपरीत किन्नर समुदाय, समाज के प्रति कृतज्ञता भाव रखता है । वह सभ्य समाज द्वारा बदनामी के डर से छोड़ दी गई या सड़क किनारे फेंक दी गई बेटियों को भी अपना लेता है।
ऐसी ही एक किन्नर गुरू सुरैया हैं, जिन्होंने 4 बेसहारा बच्चियों को गोद लेकर न केवल उसकी भलीभांति परवरिश की, बल्कि उनमें से दो की धूम-धाम से शादी भी करवाई।
सुरैया भोपाल स्थित मंगलवारा किन्नर समुदाय की गुरू हैं। उनका सौ लोगों का बड़ा परिवार है, जिनका पूरा खर्चा दान से चलता है। बावजूद इसके उन्होंने 4 अनाथ बच्चियों को गोद लिया। जिनमें से दो बच्चियों की शादी करा चुकी हैं और बच्चियों के भी अपने परिवार बन गये हैं। बा$की दोनों बच्चियां अभी छोटी हैं। एक नर्सरी में तथा दूसरी 6वीं में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई कर रही हैं। सुरैया बताती हैं, पूरी कानूनी कार्रवाई के बाद उन्होंने बच्चियों को गोद लिया है। एक वाकया सुनाते हुए उन्होंने कहा, कि एक बार किन्नर सम्मेलन में भाग लेने वह दिल्ली गई थी, लौटते वक्त ट्रेन में एक पुलिस वाले ने गोद में बच्ची देखकर उसे पकड़ लिया और पूछा- किसका बच्चा चुराकर भाग रही हो। ट्रेन के सारे यात्री इकट्ठा हो गये थे। अफरा-तफरी का माहौल बन गया था। काफी बहस के बाद जब उन्होंने पुलिस को गोद लेने के सारे कागज़ात दिखाये, तब जाकर उन्हें छोड़ा।
सुरैया कहती हैं, कि बिना सरकारी मदद के अपने दान में मिले पैसे से बच्चियां जितना पढऩा चाहे, उन्हें पढ़ायेंगी। सुरैया एक बेटी को डॉक्टर और दूसरी को न्यायाधीश बनाना चाहती हैं। बेटी अल्फिया और आलिया ने भी मां की बात पर सहमति व्यक्त करती हैं। हंसते हुए सुरैया कहती हैं, कि हमारे समाज में खुद को आकर्षक दिखाने की होड़ में कपड़े और ज़ेवरों के लिए बहुत पैसे खर्च करने पड़ते है। फिर भी समाज से मिले हुए दान का कुछ हिस्सा हमलोग कमजोर और उपेक्षित वर्ग के लिए भी खर्च करते हैं। उन्होंने कहा, यूं तो दान देकर कहा नहीं जाता,लेकिन आपको जानना है, इसलिए बता रही हूं। मैंने दो बेटियों की शादी में अन्य सामग्रियों के साथ दोनों को दो मकान भी खरीद कर दिये हैं, जिससे वे अपने छत के नीचे सुख से रह सके। सुरैया कभी-कभार अनाथ आश्रमों ,अस्पताल, स्कूलों में जाकर जरूरतमंदों की मदद करती हैं। जबकि आय पहले से बहुत घटी है। पहले लोग खुशी-खुशी दान देते थे, अब ऐसा नहीं है। महंगाई की मार हम पर भी पड़ी है। लोग हमें देखकर दरवाजा बंद कर देते हैं।
मंगलवारा किन्नर समाज की बसाहट पर वह बताती हैं, कि हमें गोण्ड राजाओं ने यहां बसाया था। कई पीढिय़ों से हम यहां रह रहे हैं। 50 वर्षीय सुरैया कहती हैं, उनका पूरा परिवार इसी शहर में रहता हैं, लेकिन किन्नर समुदाय में शामिल होने के बाद वे अपने परिवार से कभी नहीं मिलीं।
दया और ममता से भरी हुई सुरैया अपने समाज को पढ़ा-लिखा और आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं। उन्होंने कहा, किसी की इच्छा है, तो वह खूब पढ़े, आत्मनिर्भर बनें, लेकिन ऊॅचे पद पर पहुंचकर सिर्फ अपने परिवार की नहीं, बल्कि पूरे किन्नर समाज का भला करे, उन्हें आत्मनिर्भर बनाये । (सुरैया नायक से हुई बाातचीत के आधार पर)
घटते शिशु लिंगानुपात ने बढ़ाई चिंता
9 Feb 2019
घटते शिशु लिंगानुपात ने बढ़ाई चिंता
सामाजिक संगठनों ने की संसदीय फोरम बनाने की मांग
रूबी सरकार
जनगणना 2011 के बाद जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे और सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम दोनेां सरकारी स्रोतों ने राज्यों में जन्म के समय लड़कियों की संख्या में महत्वपूर्ण गिरावट दिखाई है। वर्ष 2012 से 16 के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के आंकड़ों के अनुसार जिन राज्यों में जन्म के समय लिंग अनुपात में गिरावट देखी गई है, उनमें मध्यप्रदेश के अलावा आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल भी शामिल हैं।
सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) ने पिछले 10 सालों में मध्यप्रदेश में 0 से 6 वर्ष आयु वाले बालकों के मुकाबले बालिकाओं की संख्या में वर्ष 2009 में कुछ सुधार आया था। इस वर्ष एक हजार बालकों के मुकाबले 938 बालिकाएं दर्ज की गई थी, लेकिन वर्ष 2010 में यह संख्या घटकर 922 हो गई। वहीं वर्ष 2011 में यह चिंताजनक स्थिति में पहुंच गई। एक हजार बालकों के मुकाबले मात्र 897 बालिकाएं ही दर्ज की गई। वर्ष 2012 में कुछ सुधार के साथ 912 और फिर वर्ष 2013 में बालिकाओं की संख्या घटकर 904 रह गई। इसी तरह वर्ष 2014 में लिंगानुपात 908, वर्ष 2015 में 904 और वर्ष 2016 में कुछ सुधार के साथ 909 दर्ज की गई है। इससे साफ ज़ाहिर है, कि शिशु लिंगानुपात 2021 की जनगणना में बालिकाओं के पक्ष में नहीं होगा, अगर आने वाले वर्षों में भी यही प्रवृत्ति बनी रही, तो 0-6 आयु वर्ग में प्रति हजार बालकों के मुकाबले 909 बालिकाओं से भी अनुपात नीचे चला जाएगा। बेटियों के पक्ष में कानून और कई सरकारी योजनाओं के बावजूद बेटियों के मुकाबले बेटों की चाह समाज के लगभग सभी वर्गों और जातियों में बढ़ रहा हैं। इसके अलावा दहेज निषेध अधिनियम, महिलाओं के लिए सम्पत्ति का अधिकार (हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम), घरेलू हिंसा अधिनियम के खराब क्रियान्वयन, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के साथ-साथ 2 बच्चों की मानक शर्त ने बालिकाओं की स्थिति में गिरावट में अहम योगदान दिया है। साथ ही इस तरह की सोच से पितृसत्तात्मक मानसिकता को बढ़ावा मिलता है।
लैंगिक समानता के लिए काम करने वाला संगठन गल्र्स काउण्ट के समन्वयक रिज़वान बताते हैं, कि जन्म के समय लिंग अनुपात में गिरावट गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि यह अन्य कई कारकों के अलावा सीधे लिंग का पता लगाने में सक्षम तकनीक के दुरुपयोग से जुड़ा है। पहले लिंग परीक्षण और फिर लिंग आधारित समापन का पूरा संचालन गोपनीयता में किया जाता है। दम्पत्ति पहले यह पता लगाने के लिए भुगतान करते हैं, कि क्या एक्स-वाई या एक्स-एक्स है और फिर एक्स-एक्स को खत्म करने के लिए डॉक्टरों को और अधिक भुगतान करते हैं। लड़कियों के प्रति यह भेदभावपूर्ण व्यवहार पिछले दो दशकों में अनियमित तकनीक तक आसान पहुंच के कारण काफी बिगड़ गया है। इसलिए मध्यप्रदेश में जन्म के समय गिरते लिंग अनुपात को ठीक करने के लिए पीसीपीएनडीटी एक्ट को कड़ाई से लागू कराना होगा। पीसीपीएनडीटी अधिनियम के दायरे में लिंग निर्धारण की सभी तकनीक आती हैं, जिसमें नवीनतम क्रोमोसोम पृथक्ककरण तकनीक भी शामिल है और यह कानून लिंग के खुलासे पर रोक लगता है।
स्वी रोग विशेषज्ञ डॉ. नीलम सिंह ने अपनी चिंता को साझा करते हुए कहा, सरकार ने पिछले साल वर्षों में पीसीपीएनडीटी अधिनियम के कुछ नियमों में संशोधन कर बड़े पैमाने पर क्लिनिकल प्रैक्टिस में उभर रहे नए रूझानों का सामना किया है और क्लीनिकों को अनुशासित किया है जिन्होंने नियम से बचने के लिए नए तरीके खोज रखे थे। दूसरी ओर , चिकित्सा पेशेवरों ने देश में कानून की विभिन्न अदालतों में रिट याचिकाएं दायर करके पीसीपीएनडीटी अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है और कई बार गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व सेवाओं से वंचित करने की हद तक राज्य की कार्रवाई का भी विरोध किया है।
वन बिलियन राइजिंग भारत के समन्वयक आभा भैया ने कहा, कि समस्या की तात्कालिकता और विशालता को देखते हुए घटते शिशु लिंगानुपात पर एक संसदीय फोरम की तत्काल आवश्यकता है, जिसमें जेंडर क्रिटिकल जिलों के सांसदों और विधायकों को शामिल किया जाना चाहिए। सदस्यों का मुख्य कार्य अपने जिलों में पीसीपीएनडीटी अधिनियम, दहेज, घरेलू हिंसा अधिनियम जैसे विधानों के कार्यान्वयन की बारीकी से निगरानी के लिए एक तंत्र विकसित करना चाहिए। सांसदों और विधायकों को जन्म के समय गिरते लिंगानुपात और इससे सभी संबंधित महत्वपूर्ण कारकों, पहलुओं जैसे की महिलाओं और लड़कियों की आर्थिक सशक्तीकरण, कौशल विकास, सुरक्षा, गतिशीलनता, आजीविका, सम्पत्ति का अधिकार, माध्यमिक शिक्षा के आगे सतत शिक्षा और सरकारी योजनाओं के पुनर्गठन के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षित कर्मियों के साथ प्रभावी तंत्र स्थापित करना सुनिश्चित करना चाहिए। आदर्श रूप से फोरम में सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित कर एक पब्लिक-प्राइवेट दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
अधिवक्ता वर्षा देशपाण्डे ने कहा, कि संसदीय मंच को जल्द से जल्द स्थापित किया जाना चाहिए क्योंकि महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ भेदभाव का मुद्दा बहुत गहरा है और इसे सांसदों और विधायकों की प्रतिबद्धता के बिना संबोधित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, कि देश की लड़कियों के लिए सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने में सभी को एक साथ आने और एकमत होने की आवश्यकता है। यह बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं बयान से आगे बढऩे का समय है।
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