Friday, June 9, 2023

रात में बिजली, महिला किसानों के लिए परेशानी का सबब





 रात में बिजली, महिला किसानों के लिए परेशानी का सबब

रूबी सरकार
यूं तो महिलाओं के साथ कई तरह से भेदभाव किया जाता हैपरंतु सिंचाई के लिए रात में बिजली की उपलब्धता यह महिला किसानों के साथ अमानवीय है।  महिलाएं सुरक्षा कारणों से रात में खेत नहीं जातीं।

 कृषि एक ऐसा क्षेत्र हैजहां  80 फीसदी काम महिलाएं करती हैं। बावजूद इसके सरकार महिला किसानों को केंद्र में रखकर सरकार कोई निर्णय नहीं लेती। यहां तक कि उन्हें महिला किसान का दर्जा भी नहीं दिया जाता। किसान के नाम पर सिर्फ पुरुष चेहरे ही उभर कर आते है। मीडिया भी महिला किसानों की बात को ठीक से सामने नहीं लाती। सरकार के साथ-साथ समाज भी उनके साथ भेदभाव करता है। बीते साल खेती से जुड़ी हजारों महिलाओं ने अपनी मांगों के समर्थन में दिल्ली में दस्तक दी थी. उनकी मांग थी कि जो महिलाएं खेती करती हैंसरकार उन्हें किसान का दर्जा दे. महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन महिला किसान अधिकार मंच ने भी कहा था कि मौजूदा दौर में देश की कृषि व्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भूमिका आंकड़ों में भी उभर कर सामने आनी चाहिए।
किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष लीलाधर सिंह राजपूत बताते हैं कि मध्यप्रदेश में खेतों में काम करने वाले लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी 33 फीसदी से अधिक है। वहीं ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार खेती की जमीन पर  महिलाओं का नियंत्रण 13 फीसदी से कम है। इसका मतलब उनके पास जमीन का हक नहीं है। छानबीन करने पर यह भी सामने आया कि मध्यप्रदेश में कई महिला किसान ऐसी हैजिनके पतियों ने कर्ज के चलते आत्महत्या कर लीऐसे में महिलाओं को जमीन का स्वामित्व नहीं मिला। उनके लिए विधवा पेंशन मात्र 600 रुपए छोड़ देतो कोई  आर्थिक सुरक्षा नहीं है।  जबकि इन महिलाओं को खेतों के अलावा परिवार की भी जिम्मेदारी उठानी पड़ती है.। खेती की जमीन न होने के कारण उन्हें न तो सरकारी लाभ मिलते हैं और न ही सामाजिक सुरक्षा. अक्सर उन्हें बैंक से ऋण नहीं मिल पाते. सब्सिडी पर उर्वरक और फसल खराब होने पर सरकारी बीमा भी नहीं मिल पाता. सरकारी कागजों में वे किसान नहीं होतीं. इससे कृषि क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं की सही संख्या को आंकना मुश्किल होता है।
 
महिलाओं की सेल्फ एंप्लॉयड किसानों में हिस्सेदारी 48 फीसदी है।  खेती में शारीरिक श्रम भी बहुत ज्यादा है- जमीन तैयार करनाबीज चुननारोपाई करनाखाद डालनाफिर कटाईमढ़ाई वगैरह में बहुत मेहनत होती है। इसके बाद अगर एकल महिला हैंतो उन्हें खाद-बीज के लिए लाइन में खड़ा होना। समर्थन मूल्य पर फसल बेचने के लिए पंजीयन करानामंडी में जाकर लाइन में लगना। बैंक खातों की तफ्तीशजनधन खाता है तो 10 हजार से अधिक ट्रांजेक्शन नहीं हो सकता। तीन फसल वालों को अलग-अलग पंजीयनहर बार पोर्टल में कुछ न कुछ परिवर्तन होना। इस तरह की सैंकड़ों परेषानियां का उन्हें सामना करना पड़ता है। सरकार को महिला किसानों के लिए कुछ खास सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। ताकि उनकी परेशानी कुछ कम हो। लेकिन उनका निर्णय हमेशा महिलाओं के खिलाफ चला जाता है। अब सर्दी के दिनों में रात में खेतों में पानी देनामहिलाओं के लिए लगभग असंभव है।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले से 60 किलोमीटर दूर शोभापुर गांव की 60 वर्षीय महिला किसान मंजू पालीवाल बताती हैं कि जब पुरुष दूसरे रोजगारों की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन करते हैंग्रामीण इलाकों में खेती संभालने का काम महिलाएं ही करती हैं। मंजू एकल महिला हैंजब वह विधवा हुई थी उस वक्त उनकी उम्र 35 थी,। दो छोटे-छोटे बच्चे थे। चार एकड़ कृषि भूमि से उनका गुजारा चलता था। एकल महिला के लिए रात में सिंचाई के लिए खेत में जाना उनके लिए नामुमकिन है। महिलाओं के लिए बैंक की औपचारिकताएं पूरी करना भी कठिन काम है। रोज नियम बदल दिए जाते है।अब बैंक खातों का आधार से लिंक करवानायह सब महिलाओं के लिए आसान नहीं है। ग्रामीण महिलाएं इतनी पढ़ी-लिखी नहीं होती।  छोटी खेत वाली एकल महिलाओं के लिए यह मुश्किल भरा काम है। जो  बागवानी करती हैंउनके लिए अलसुबह सब्जी लेकर मंडी जाने में दिक्कत हैऐसे में वह बिचौलियों का सहारा लेती है। इससे उनका बहुत नुकसान होता है। इसके अलावा उन्हें छेड़छाड़छींटाकशी,  अनहोनी का डर हमेशा सताता रहता है। क्योंकि अक्सर इस तरह घटनाएं होती है। परंतु  महिलाएं लोकलाज के कारण चुप रह जाती है। जब शहर की महिलाओं के साथ यह सब होता है तो फिर ग्रामीण महिलाएं कैसे सुरक्षित रह सकती है। उपर से सरकार का यह फरमान कि रात में सिंचाई के लिए बिजली।  
रीवा जिले से 65 किलोमीटर दूर हर्जनपुर गांव की कोल आदिवासी शोभा बताती हैं कि उनके पति रामलोचन शहद निकालने का काम करते थे। अचानक उनसे क्या अन्याय हुआ कि वह देवी के प्रकोप का शिकार हो गए और पैर दर्द को लेकर ही चल बसे। त ब उसकी उम्र मात्र तीस साल थी । उसे एक एकड़ में खेती कर  तीन बच्चों का भरण-पोषण करना था। पति के रहते वह कभी बाहर काम करने नहीं गई। लेकिन अब उसके सामने मुसीबतों का पहाड़ था। वह खेती के साथ-साथ मजदूरी भी करने लगी।  सुधा कहती है कि पुरुषों के मुकाबले उसे कम मजदूरी दी जाती है और ठेकेदार की गलत निगाह भी उसे परेशान करती है। परंतु उसके सामने परेशानी यह है कि उसे बच्चों की परवरिश करनी है। वह काम छोड़ भी नहीं सकती।  वह कहती है कि सरकार परेशानी कम करने के बजाय और बढ़ जाती है। खाद-बीज के लाइन लगाए कि मजदूरी करेमंडी में फसल बेचना है तो पोर्टल में पंजीयन करवाए। बार-बार इन कामों में पैसा खर्च होता है। समय पर खाद-बीज मिलता नही ंतो खेती चौपट हो जाती है। सुधा ने कहा कि खाद-बीज के लिए लड़की को लाइन में लगाते हैं। इससे उसकी पढ़ाई छूट जाती है। लड़के अवारा निकल गए। वह किसी काम के न रहे। एक विधवा कित्तो को पालंेगे! डपर से जवान विधवा हो तो सबकी गिद्द दृष्टि लगी रहती है। अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते उसकी आंखें भर आईबोली क्या-क्या खुलकर बताएं। जैसे-तैसे जिंदगी की गाड़ी चल रही है। उसने कहा कि पति के निधन के बाद जमीन भी उसके नाम नहीं हो पायी । इसके लिए पटवारी पैसे मांगते हैं।  इसी गांव की 40 साल की  विमला देवी ने महीने पहले अपने पति को खो दिया । वह बताती है कि हमारा तो सब िदन संघर्ष करते हुए निकल गया। बड़े संघर्ष के बाद जमीन का विभाजन हुआ । एक टुकड़ा मिला । अभाव में बच्चों को पढ़ा नहीं पाए। सबको मजदूरी में लगा दिए।  
पढ़ी-लिखी महिला किसान बृंदा तलाकशुदा है। वह बताती है कि खेती से जुड़े फैसले लेने में कभी भी महिलाओं को बराबरी से शामिल नहीं किया जाता. खेती में भी अक्सर वे सहायक कामों में लगाई जाती हैं और अक्सर वहां भी पुरुषों के मुकाबले कम कमाती हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि उन्हें पुरुषों के मुकाबले कमजोर समझा जाता है। जेंडर को लेकर जो पूर्वाग्रह कायम हैंउसका सीधा असर पड़ता है। इसके अलावा दलित और आदिवासी महिला किसानों की स्थिति और बदतर है। दूसरी महिलाओं के मुकाबले वे सामाजिक और आर्थिक स्तर पर ज्यादा अलग-थलग पड़ जाती हैं। दलित महिलाओं के पास तो खेती की जमीन भी नहीं हैवह अधिकतर खेत मजदूर हैं।  इसके अलावा जाति के आधार पर उन्हें अलग से भेदभाव झेलना पड़ता है. इस भेदभाव की वजह से अपनी जमीन पर उन्हें अधिकार नहीं मिलता. उनकी उपज को खरीदार नहीं मिलते। उनकी जीविका पर असर होता है। हां इतना जरूर है कि इन संघर्षों से कई मायनों में महिलाएं  मजबूत हुई हैं. उनकी कुशलता और आत्मविश्वास बढ़ा है।
फेमिनिस्ट इकोनॉमिक्स की एक टर्म हैफेमिनाइजेशन ऑफ एग्रीकल्चर. यानी कृषि क्षेत्र का स्त्री पक्ष. जब नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद कृषि गतिविधियां कम हुईं और पुरुषों ने ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में पलायन शुरू किया तो खेती का भार गांव में छूट जाने वाली महिलाओं पर पड़ा। 2013 में एक अंग्रेजी दैनिक में छपी खबर में बताया गया था कि 2001 से 2011 के बीच 77 लाख किसानों ने खेती करना छोड़ दिया था. इसके बाद 2015 में प्रवास पर एक वर्किंग ग्रुप बनाया गया जिसने 2017 में एक रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि गांवों से शहरों में करीब 10 से 20 करोड़ लोगों ने पलायन किया है। इनमें ज्यादा संख्या पुरुषों की है। इसी से कृषि का फेमिनाइजेशन हुआ। 2011 की जनगणना कहती है कि 2001 से 2011 के बीच महिला खेतिहर मजदूरों की संख्या में 24 फीसदी का इजाफा हुआ। यह करोड़ 95 लाख से बढ़कर करोड़ 16 लाख हो गई। अगर लगभग करोड़ 80 लाख महिलाएं खेती से जुड़े रोजगार करती हैं तो उनमें से 63 प्रतिशत खेतिहर मजदूर हैं यानी दूसरे के खेतों में काम करती हैं। फिर भी उनकी आवाज सरकार के सामने कमजोर पड़ जाती है।



 

नल में पानी टपकते देख खुशी से झूम उठा 157 गांव

















नल में पानी टपकते देख खुशी से झूम उठा 157 गांव

रूबी सरकार 

भोपाल से करीब 140 किलोमीटर दूर राजगढ़ जिले में बना गोरखपुरा डेम लबालब है। डेम से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर बना है पानी शोधन करने की पूरी प्रक्रिया। यही से राजगढ़ और खिलचीपुर विकासखंड के 157 गांवों में पेयजल की सप्लाई की जा रही है। पहली बार नल से जल टपकते देख ग्रामीणों के खुशी का ठिकाना नहीं था। जब पिछले चार सालों से नल से जल देने की पूरी प्रक्रिया चल रही थी, तब उन्हें विश्वास ही नहीं था कि कभी ऐसा संभव हो पाएगा।

दरअसल केंद्र सरकार हर घर नल योजना का काम किसी भी सूरत में 2024 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है। वहीं राजगढ़ जिले के लिए  काम पूरा करने का  लक्ष्य 2023 है। लेकिन निर्धारित समय से पहले ही गोरखपुरा ग्रामीण जल प्रदाय योजना के तहत करीब 157 गांवों में नल जल योजना का काम पूरा कर लिया गया। इनमें राजगढ़ ब्लाक के 125 तथा खिलचीपुर 25 गांव शामिल है।
राजगढ़ जनपद पंचायत का कुंडी बे गांव की सबसे वृद्ध  85 वर्षीय महिला रतन बाई ने कहा कि 80 साल  तक उन्होंने अपने सर पर मटका और मटके के ऊपर गगरा रखकर एक बार में 40 लीटर पानी हैंडपंप या कुआं से लेकर तेज कदमों से चलकर एक किलोमीटर  का सफर तय करती थीं। रतनबाई कहती हैं कि गर्मी के दिनों में जब गांव के आस-पास कहीं पानी नहीं मिलता था, तब परिवार के लड़के मोटर साइकिल पर कई-कई किलोमीटर दूर से पानी लाते थे। हम लोगों ने पशुओं के लिए गंदे पानी को इकट्ठा कर उसे फिटकरी डालकर साफ करते थें । घरों में नल से जल तो हमारे लिए एक सपना था। इससे पहले आखिर में दो साल तक गांव के कुछ परिवारों ने पैसे जोड़कर एक पंप खरीदा और उसी पंप को कुंए डालकर उससे पानी खींचने लगे। लेकिन उसमें पहले आओ, पहले पाओ जैसी स्थिति बन गई। जिसकी सुबह सबसे पहले नींद खुली, वह पानी खींच लेते थे। जिसके लिए रोज लड़ाई होने लगी। यह लड़ाई इतनी बढ़ गई कि अंत तक पंप को उखाड़ फेक दिया गया। लोग सुबह के इंतजार में रात-रात भर जागने लगे थे। हैंडपंप पर पानी के बर्तनों की लंबी लाइन लगी रहती थी। यानी पूरा दिन और रात भी पानी को लेकर ग्रामीण तनाव रहते थे। अब जब एक साल से नल से पानी मिलने लगा, तो मानो गांव में खुशहाली आ गई। औरतें शैम्पू से बाल धोने लगी है। जिन्हें कभी सिर धोने के लिए पानी नसीब नहीं था। अभी सुबह आठ से साढ़े नौ  तक भरपूर पानी मिलता है।  
कुंडी बे गांव की सरपंच हुकम बाई बताती है कि हमारे गांव में 135 नल कनेक्शन है, इनमें दो स्कूल और आंगनबाड़ी को छोड़कर हर घर से पेयजल के लिए 100 रुपए का अंशदान लिया जाता है। इसे देने में किसी को कोई परहेज नहीं है। समय पर प्रत्येक घर से अंशदान मिल जाता है। इसके लिए अलग से कहना नहीं पड़ता।
कुन्डीबे पंचायत के चौकीदार बताते हैं कि गर्मी के दिनों में जब आस-पास कहीं पानी नसीब होता था, तब हमें चंदा करके 500 रुपए में टैंकर मंगवाना पड़ता था । गर्मी के दिनों में टैंकर मालिक गांवों में पानी सप्लाई कर लाखों रुपए कमा लेते थे। कुंतला पंवार और रामकला बाई चौकीदार की बातें में हामी भरती हैं और कहती है कि पहले पानी के चक्कर में कभी हम लोग इस तरह सखियों संग झुंड में बैठकर गप्पे नहीं मार सकते थे। हमें अपनी सुख दुख बांटने का समय ही नहीं मिलता था। सभी पानी को लेकर तनाव में रहते थे और पहले पानी लेने की होड़ लगी रहती थी। इससे आपस में संबंध भी खराब हो जाते थे।  
एमपी जल निगम  के जीएम प्रमोद उपाध्याय बताते हैं कि राजगढ़ आकांक्षी जिला है और यह जिला देश के सूखाग्रस्त जिलों में से एक है। यहां के ग्रामीणों को ष्षुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना एक चुनौतीपूर्ण काम था। जल जीवन मिशन के तहत हम लोगों ने युद्धस्तर पर काम शुरू किया। हालांकि कोविड 19 पेंडेमिक के दौरान थोड़े समय के लिए काम प्रभावित हुआ था, लेकिन उसके बाद काम ने रफ्तार पकड़ ली थी। काकेन नदी से  गोरखपुरा डैम से लिंक किया गया। 2018 में यह काम शुरू हुआ, जो 31 मार्च, 2022 को पूरा हो गया । इसका डीपीआर 2,4854 करोड़ रुपए था। नल जल योजना में पानी की गुणवत्ता का बहुत ध्यान रखा जाता है। जिसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ा और वे कम बीमार रहने लगे।  उन्होंने कहा कि राजगढ़ में कुल 5 स्कीम है, गोरखपुरा के अलावा बागपुर-कुशलपुरा, जहां 125 गांवों में से 120 गांवों में पानी की आपूर्ति की जा रही है। यहां पेयजल के लिए घोड़ा पछाड़ नदी से पानी को लिंक किया गया है। इसी तरह पहाड़गढ़ जहां 79 गांवों में से 74 गांवों में नल कनेक्शन का काम पूरा हो चुका है। यहां पार्वती नदी से लिंक किया गया है। इसी तरह मोहनपुरा में 215 गांवों में से कुछ गांवों के पानी का टेस्टिंग चालू है, शेष में सप्लाई हो रहा है, यहां नेवच नदी से लिंक किया गया है। वहीं कुंडालिया परियोजना के लिए कालीसिंधी नदी से पानी लाया जा रहा है, यहां 7 गांवों में नल कनेक्शन का काम जारी है।
समाधान के प्रधानमंत्री के 5पी मंत्र में से एक का किया इस्तेमाल
समुदाय भागीदारी प्रबंधक प्रियंका जैन गुप्ता बताती है कि पहले ग्रामीणों को एक्टिविटी के जरिए इस योजना से जोड़ा गया। इसके लिए प्रधानमंत्री के ‘5पी’ का मंत्र में से एक मंत्र काम आया, जिसमें साझेदारी व जन भागीदारी की बात कही गई है। ग्रामीणों से  100 रुपए का अंशदान लिया, जिससे इस योजना से उनका जुड़ाव हो । ग्रामीण महिलाएं हमेशा घर के कामों में व्यस्त रहती हैं, उनके लिए समय निकाल पाना कठिन होता है। फिर भी हमने प्रयास किया और समिति बनवाई, जो हर घर से पानी का नियमित शुल्क लेकर जमा करने का काम करती है। पानी बर्बाद न हो इसकी निगरानी करती है और छोटे-मोटे मरम्मत का काम भी स्वयं कर लेती हैं।  उन्होंने कहा कि कोई योजना तभी कामयाब हो सकती है, जब उसमें समुदाय का जुड़ाव हो।
कलेक्टर भी गांव-गांव जाकर करते हैं निगरानी
अच्छी बात यह है कि राजगढ़ कलेक्टर हर्ष दीक्षित भी नल-जल योजना की गांव-गांव जाकर निगरानी करते हैं। लोगों से पानी को लेकर बातचीत करते है और उन्हें नियमित पानी का शुल्क अदा करने की  हिदायत भी हैं। उन्होंने चाटूखेड़ा व मुरारिया गांव का दौरा कर ग्रामीणों को पानी की बर्बादी को लेकर  जागरूक किया। इस बीच किसी ने नल में पानी न आने की शिकायत भी की, तो उस समस्या का हल भी निकाला। उन्होंने गांवों में बड़ों के साथ-साथ बच्चों से भी पानी की शुद्धता और स्वाद को लेकर बात की। कलेक्टर को अपने बीच पाकर ग्रामीण बहुत उत्साहित दिखे।  





 january 15, 2023
 


 
 

माफी की आस में नहीं चुकाया कर्ज, अब मिल रही नोटिस

 





माफी की आस में नहीं चुकाया कर्ज, अब मिल रही नोटिस


रूबी सरकार

राष्ट्रीयकृत और सहकारी बैंकों के अनुसार मध्यप्रदेश में करीब 34 लाख से अधिक किसान ऐसे हैं, जिन्होंने बैंकों का ़ऋण नहीं चुकाया है। डिफाल्टर किसानों की संख्या लगातार बढ़ने से नॉन परफॉर्मिंग एसेट एनपीए पर असर पड़ रहा है। जबकि किसानों का कहना है कि खाद-बीज की जो सुविधा पहले सोसाइटी से मिल जाती थी, उसे बंद करने और नकद राशि से खाद-बीज, पानी आदि खरीदने से उन पर बहुत आर्थिक बोझ बढ़ गया है। दूसरी तरफ बेमौसम बारिश , सूखा जैसी प्राकृतिक कारणों से फसल नष्ट हो जाए, तो बीमा की रकम समय पर नहीं मिल पाता। इससे भी किसान  आर्थिक रूप से परेशान रहते हैं और अगली फसल के लिए फिर से उन्हें कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है । इस तरह किसानों के जीवन में कर्ज और ब्याज का चक्र चलता रहता है।
होशंगाबाद मुख्यालय से करीब 22 किलोमीटर दूर डोलरिया गांव का किसान आशीष भदौरिया के पास 5 एकड़ कृषि भूमि है। वे बताते हैं कि उन्होंने खेती के लिए बैंक से 50 हजार का ऋण लिया था। ऋण लेने के बाद अगले फसल तक उस पर ब्याज नहीं लगाया जाता। इसके बाद 14 फीसदी ब्याज देना पड़ता है। मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार ने जब 2018 में दो लाख रुपए तक की कर्ज माफी की घोषणा की, तो किसानों को  उम्मीद थी कि अधिकतर किसानों का  कर्ज पट जाएगा। प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के बाद घोषणा के मुताबिक तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 10 दिन के भीतर किसानों का कर्ज माफ करने की प्रक्रिया शुरू की। पहली कैबिनेट की बैठक में ही इस प्रस्ताव को पास कराया और फाइल पर दस्तखत किए। किसानों के 50 हजार तक के कर्ज करीब-करीब माफ भी हो गए। लगभग 27 लाख किसानों के 50 हजार तक के कर्ज माफ हुए। इस बीच कांग्रेस की सरकार गिर गई। जिसके चलते कर्ज माफी की प्रक्रिया स्थगित कर दी गई। उन पर आरोप भी लगे कि उन्होंने 2 लाख रुपए तक के कर्ज माफी की बात की थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, जबकि कमलनाथ का कहना है कि उन्होंने 50 हजार से शुरू की थी और धीरे-धीरे इस दिशा में आगे बढ़ रहे थे, लेकिन भाजपा ने मंत्री व एमएलए की खरीद-फरोख्त कर उनकी सरकार गिरा दी और भाजपा की सरकार बना ली। वे किसानों की कर्ज माफी का ब्यौरा पेन ड्राइव में प्रमाण के तौर पर लेकर चलते हैं।
भदौरिया बताते हैं कि किसानों की कर्ज माफी का आदेश तो मध्यप्रदेश शासन का था, न कि तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ का । दूसरी बात जब भाजपा कमलनाथ सरकार पर आरोप लगाती रही कि उन्होंने कर्ज माफी का वादा पूरा नहीं किया, तो फिर भाजपा सरकार को किसानों का कर्ज माफ कर देना चाहिए । लेकिन ऐसा नहीं हुआ और कर्ज माफी के इंतजार में किसानों का ब्याज बढ़ता गया। अब किसानों के पास ऋण अदायगी के लिए तहसीलदार के नोटिस आने लगे हैं। किसान परेशान है। कमलनाथ ने फिर से एक बार आश्वासन दिया है कि कांग्रेस की सरकार आएगी, तो फिर से कर्ज माफी की प्रक्रिया शुरू होगी।



 चुनावी साल होने की वजह से कर्जमाफी के इंतजार में प्रदेश के ज्यादातर किसानों ने अपना बकाया कर्ज अदा करना बंद कर दिया है। इससे डिफाल्टर किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है और प्रदेश में डिफाल्टर किसानों की संख्या 34 लाख से अधिक हो गई है।
इससे  सहकारी सहित राष्ट्रीयकृत बैंकों का एनपीए बढ़ रहा है। सूत्र बताते हैं कि बैंकों का किसानों पर एनपीए 21 हजार करोड़ रुपए हो गया है। गुजरात में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार ने किसानों के कर्ज माफी की घोषणा की। इससे भी किसानों को  भरोसा हो गया है कि विधानसभा चुनाव से पहले कर्जमाफी की घोषणा हो सकती है।
दो चरणों में शुरू हुई थी कर्ज माफी
प्रदेश में कर्ज माफी की शुरुआत  दो चरणों में हुई थी। पहले चरण में प्रदेश के 21 लाख किसानों का 6 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफ हुआ था। दूसरे चरण की शुरुआत 1 मार्च 2020 को हुई थी। दूसरे चरण में प्रदेश के 7 लाख किसानों के 4500 करोड़ रुपए का कर्ज माफ होना था । कर्ज माफी वाले किसानों की कुल संख्या को 55 लाख बताया गया है, जिनका कर्ज माफ होना था। इसमें लघु और सीमांत 35 लाख किसानों को प्राथमिकता से ऋण माफी का लाभ मिलना था। गौरतलब है कि केवल खेती के लिए उठाए कर्ज माफ करने का प्रावधान था यानी जिन्होंने फसल के नाम पर कर्ज लिया था उन्हीं का कर्ज माफ करने का निर्णय लिया गया था।
किसानों का दो लाख रुपए तक का कर्ज माफ करने के वादे के साथ आई कमलनाथ सरकार ने कर्जमाफी की ष्षुरुआत रतलाम के नामली से की थी। सीएम  कमलनाथ 20 फरवरी 2019 को रतलाम पहुंचे थे और यहां  समारोह में किसानों की कर्जमाफी के प्रमाण पत्र बांट कर इसकी शुरुआत की थी।
क्रांतिकारी किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष  लीलाधर सिंह राजपूत बताते हैं कि किसानों के  सिर्फ कर्ज माफ कर देने भर से समस्या का हल नहीं होगा। बल्कि किसानों पर सरकार की ओर से कई तरह से  आर्थिक बोझ बढ़ाया जा रहा है। कम से कम शिवराज सरकार को किसानों के ब्याज अदायगी माफ कर देना चाहिए, वरना किसान 14 फीसदी बैंकों को ब्याज नहीं दे पाएंगे। राजपूत बताते हैं कि सरकारी समर्थन मूल्य खरीदी प्रक्रिया इतनी जटिल कर दी गई है। किसान बैंक खाते की ई केवाईसी  नहीं होने के कारण अपनी उपज बेचने  वंचित रह जाते हैं। जबकि ई केवाईसी के बगैर किसी भी बैंकों में खाता नहीं खुलती। फिर भी ई केवाईसी के नाम पर पोर्टल पर स्लॉट बुक नहीं हो पाता और किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। सरकार का रासायनिक खाद वितरण प्रक्रिया भी दोषपूर्ण है। इससे किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। सरकार किसानों को नैनो यूरिया लेने को बाध्य कर रही है। जबकि नैनो यूरिया की गुणवत्ता दानेदार यूरिया के समान नहीं है।इससे किसानों की लागत बढ़ रही है। सरकार को इस बाध्यता को खत्म कर देना चाहिए। राजपूत ने बताया कि उन्होंने इन सब बातों को लेकर होशंगाबाद कलेक्टर को एक ज्ञापन भी सौंपा है।

गुजारे के लिए संघर्ष करती खेतिहर मजदूर महिलाएं






 गुजारे के लिए संघर्ष करती खेतिहर मजदूर महिलाएं


रूबी सरकार

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 70 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के बाड़ी विकासखंड के मुख्यालय में हजारों की संख्या में महिला खेतिहर मजदूर सिर्फ इसलिए इकट्ठा हुई, कि उन्हें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना  के अंतर्गत काम नहीं मिलता। ऐसे में उन्हें हर रोज बड़े किसानों के यहां काम मांगने जाना पड़ता है। जहां रोजगार मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। कभी-कभी उन्हें खाली हाथ वापस आना पड़ता है। उनके आजीविका का संकट आज का नहीं है, बल्कि रायसेन जिले में सदियों से असंगठित मजदूरों को रोजगार के लिए यही करना पड़ता है। इस जिले विकास भी उस तरह से नहीं हुआ, जैसे अन्य जिलों का हुआ है। जबकि यहां से पूर्व राष्ट्रपति स्व शंकर दयाल शर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी,पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व सुषमा स्वराज, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान , पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा जैसे दिग्गज राजनेताओं ने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उसके बाद पलट के नहीं देखा।
लिहाजा सबसे ज्यादा मजदूर इस जिले से आते हैं। ओमवती सिसोदिया सुबह 70 किलोमीटर दूर से इस आयोजन में भाग लेने आई थी। उन्होंने कहा  वह मनागढ़ ग्राम पंचायत से बच्चों को घर पर अकेला छोड़कर यहां आई हैं। उन्हें पता चला कि यहां वर्तमान विधायक सुरेंद्र पटवा आने वाले हैं, जो उनकी बातें सुनेंगे। आने के बाद पता चला  कि वह तो कहीं और विकास यात्रा के लिए निकल गए। अब जहां विकास हुआ ही नहीं , वहां विकास की क्या बात करते, इसलिए शायद नहीं आए। ओमवती ने बताया कि ग्राम पंचायत के सचिव ग्रामीणों का जॉब कार्ड रख लेते हैं, परंतु कभी काम नहीं देते। रोज सुबह हम सबको काम की तलाश में निकलना पड़ता है। साल भर तो खेत में काम नहीं मिलता । हमलोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या बनी रहती है। हमें न तो प्रधानमंत्री आवास मिला और न शौचालय का पैसा। ग्राम पंचायत गाजखेड़ी की 5त्र वर्षीय अभिलाषा के पति का देहांत हो चुका है। उसके चार छोटे-छोटे बच्चे हैं, जिसके पालन पोषण की जिम्मेदारी उस पर है। बड़ा बेटा 8वीं तक पढ़ाई करने के बाद मां के साथ मजदूरी करने जाता है। उसने विधवा पेंशन के लिए पंचायत में आवेदन दिया था, लेकिन अभी तक उसे पेंशन नहीं मिला है। जिला परिषद सदस्य लता चौहान बताती हैं कि छिंदवाड़ा जिले के बाद मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा जिला रायसेन है। यह जिला हमेशा  उपेक्षा का शिकार रहा है। यहां आय का कोई जरिया नहीं है। अधिकतर खेतिहर मजदूर है। इसे बंधुआ मजदूर भी कह सकते हैं, क्योंकि यह असंगठित मजदूर अपने जरूरतों के लिए बड़े किसानों से पैसे उधार लेते हैं और बदले में उनके खेतों में मजदूरी करते हैं। कन्वार पंचायत से 10 किलोमीटर चलकर बाड़ी विकासखंड पहुंची 55 वर्षीय सतीबाई का जॉब कार्ड ही नहीं बना। सतीबाई के तीन बेटे हैं और तीनों अलग-अलग रहते हैं। सतीबाई इस उम्र में अपने आजीविका के लिए संघर्ष कर रही हैं। कलिया बाई, मुन्नी बाई, कला बाई सबकी एक जैसी कहानी यहां सुनने को मिली। जो बड़ी उम्मीद से यहां आई थीं कि विधायक उनकी बात सुनकर समस्या का हल करेंगे। उन्हें क्या मालूम था कि विधायक की नजर में उनके वोट की कोई कीमत नहीं। असंगठित खेतिहर मजदूर सिर्फ रायसेन जिले में ही नहीं है, बल्कि 2011 की जनगणना केे अनुसार पूरे देष में खेती में लगे हुए कुल  26 करोड़ से ज्यादा लोगों में से  45 फीसदी यानी करीब 12 करोड़ किसान  और ष्षेष करीब 55 फीसदी  यानी साढ़े 14 करोड़ खेतिहर मजदूर है।  पिछले दशकों में खेती योग्य जमीन तेजी से घट रही है। फलस्वरूप भूमिहीनों की  संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इसलिए हम कह सकते हैं कि  खेत मजदूरों  की संख्या तेजी से बढ़ी होगी। गांवों में खेती योग्य अच्छी भूमि का करीब 80 फीसद धनी और खाते-पीते और मझोले किसानों के पास है, जबकि उनकी आबादी कुल ग्रामीण आबादी में महज 19 से 15 फीसदी के बीच  है। 2011 की जनगणना के अनुसार खुद किसानी करने  करने वाले किसानों का हिस्सा 39 फीसद से भी कम है। इनमें से करीब 66 फीसद ऐसे हैं जो सीमांत या बेहद छोटे किसान  हैं। जो अपने  जीविकोपार्जन के लिए मुख्य रूप से अपनी भूमि पर निर्भर नहीं है। वे दूसरे के खेतों पर काम करके अपना  गुजारा करते हैं।  मगर ग्रामीण क्षेत्र की सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद खेतिहर  मजदूरों की बदहाली और काम व जीवन के खराब हालात की बहुत कम चर्चा होती है।
घटती आमदनी के कारण हजारों खेतिहर मजदूर कर्ज के जाल में फंसे हुए हैं और आर्थिक बदहाली, कर्ज का बोझ और निराशा बड़े पैमाने पर उन्हें अपनी जान लेने जैसा  कदम उठाने पर मजबूर कर रहे हैं। किसानों की आत्महत्या के सवाल पर संसद से लेकर सड़क तक चर्चा हुई है, फिर भी खेतिहर मजदूरों  की दुर्दशा को लगातार नजरअंदाज  किया जाता है। इस तबके के आत्महत्या के आंकड़े ही 2013 तक प्रकाशित और उपलब्ध नहीं थे। जबसे इसके अलग से आंकड़े  उपलब्ध है, तब से देखें तो  2014 में 6750 खेतिहर मजदूरों ने  आत्महत्या की, 2015 में 4505, 2016 में  5019 और 2019 में 4324 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की है। देष में किसानों की आत्महत्याओं पर काफी चर्चा हुई है लेकिन खेतिहर मजदूरों की आत्महत्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया  बल्कि उन्हें मामूली और सामान्य घटनाएं बताने की भी कोशिश होती रही है।
 देश के 94 फीसद असंगठित मजदूरों में खेतिहर मजदूर सबसे अधिक बिखरा, असंगठित, शोषित, उत्पीड़ित और  अशिक्षित हिस्सा है। इन सबके बावजूद खेतिहर मजदूरों के आर्थिक हितों की हिफाजत के लिए देश की कानून व्यवस्था और संविधान कोई व्यवस्थित ढांचा मुहैया  नहीं कराता है। देश भर में ग्रामीण मजदूरों के लिए कोई एक रूप सार्वभौमिक कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है। सरकार ने गांवों से उजड़ने वाले मजदूरों के ष्षहरों में प्रवास को रोकने और कम करने के  लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना  शुरू की थी। लेकिन यह  योजना खुद ही सरकार द्वारा बनाए गए अन्य कानूनों का उल्लंघन करती है। इस योजना के  तहत मिलने वाले काम  के बदले मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी तक नहीं दी जाती। ऊपर  से यह योजना वर्ष में मात्र 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देती है। इसलिए वास्तव में यह रोजगार गारंटी है ही नहीं क्योंकि रोजगार का  अर्थ ही यह है कि साल भर, नियमित तौर  पर रोज मिलने वाला काम। मनरेगा से होने वाली आय ग्रामीण मजदूरों के केवल भुखमरी  के स्तर पर जिंदा  रख सकती है और यह भी तब  होगा। जब यह योजना भ्रष्टाचार  से मुक्त होकर  लागू हो। हालत यह है  कि इस योजना के लिए आवंटित राशि का अच्छा खासा हिस्सा इस्तेमाल ही नहीं होता और जो होता है, उसका भी बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार भेंट चढ़ जाता है।
गांव के गरीब मजदूरों के लिए सरकार के पास श्रम कानूनों का कोई ढांचा मौजूद नहीं है। राष्ट्रीय ग्रामीण श्रम आयोग ने सरकार से ऐसे कानूनी ढांचे की सिफारिश की थी जो ग्रामीण मजदूरों के लिए चाहे वे खेतिहर मजदूर हो  या फिर गैर खेतिहर मजदूर, इस बात की गारंटी करें कि  उनके कार्य दिवस आई घंटे के हो उन्हें साप्ताहिक अवकाश मिले उनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए पीएफ और ईएसआई कार्ड योजना शुरू की जाए और उनके आवास आदि के लिए भी  सरकार जिम्मेदारी लेकर योजना बनाए। लेकिन  आज तक इन सिफारिशों पर अमल नहीं हुआ। ग्रामीण मजदूरों से के कसम करने की परिस्थितियों भी घातक होती है। एक  आकलन के अनुसार औद्योगिक दुर्घटनाओं  में जितने शहरी मजदूर की जान गंवाते हैं या अपंग होते हैं, ग्रामीण मजदूर भी  काम के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में लगभग उतनी ही तादाद में जान गंवाते या अपंग होते हैं। हालांकि शहरी मजदूरी के लिए सामाजिक सुरक्षा के कुछ कानून तो है लेकिन ग्रामीण मजदूरों के के लिए अब तक ऐसे कानून ही नहीं है इसलिए वे  केाई कानूनी लड़ाई लड़ ही नहीं सकते। यहां तक कि खेतिहर मजदूरी का अभी तक कोई सरकारी मानक या पैमाना निर्धारित नहीं है। ऐसे में खेतिहर मजदूर पूरी तरह से बाजार की ताकतों तथा धनी और मझोले किसानों के रहम पर निर्भर रहते हैं।
बाजार में तेजी होने पर कई बार उसे संतोषजनक मजदूरी  मिलती है लेकिन 12-12 घंटे कमरतोड़ मेहनत के बाद। लेकिन ज्यादातर  की किस्मत इतनी अच्छी नहीं होती। देश में  खेती का सेक्टर लंबे समय से संकटग्रस्त है और इसका  सबसे बुरा प्रभाव देश के गरीब खेतिहर मजदूरों पर पड़ता है, जिसकी मजदूरी लगातार गुजारे के स्तर से भी नीचे जा रही है। कोरोना काल के बाद यह संकट और अधिक गहरा गया है कानूनों के जरिए कोई भी सरकारी विनियमन न होने के  कारण ये खेतिहर मजदूर पूरी तरह से बाजार की दया पर निर्भर है। 
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 5 march 2023 Amril Sandesh , Raipur



Thursday, June 8, 2023

Down to Earth March 2023-जल जीवन मिशन - आगे बढ़ाने में चैंपियन बन रहीं महिलाएं

 





जल जीवन मिशन - आगे बढ़ाने में चैंपियन बन रहीं महिलाएं

रूबी सरकार

ग्रामीण जल जीवन मिशन  के अंतर्गत घरों में नल से जल उपलब्ध होने से महिलाओं और किशोरी बालिकाओं को सबसे अधिक लाभ मिलने लगा है। किशोरियां स्कूल जाने लगी हैतो महिलाओं ने रोजगार के नए.नए साधन ढूंढ़कर अपनी आजीविका में सुधार ला रही हैं। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। पानी के लिए दशकों तक ग्रामीण महिलाओं ने संघर्ष किया है। कलेक्टरों को आवेदनज्ञापनआंदोलनघेराव तक करना पड़ा है। तब जाकर जल जीवन मिशन के तहत उनके घरों में पेयजल की आपूर्ति संभव हो पाया है। वहीं जल निगम की ओर से ग्रामीण महिलाओं को शुद्ध पेयजल की जांचजल की बर्बादी रोकनाजलकर वसूली कर निर्धारित समय पर सरकार के खाते में पैसे जमा करने के साथ ही जल से संबंधित किसी भी शिकायत हो तो तुरंत स्मार्ट फोन से अधिकारियों को सूचित करना और जल जनित बीमारियों की जानकारी आदि के लिए प्रशिक्षित किया गया है। यहाँ तक कि पेयजल परीक्षण के लिए उन्हें किट भी उपलब्ध करवाया गया है।  यानी पेयजल के मामले में ग्रामीण महिलाएं अब पूरी तरह चैंपियन बन चुकी हैं। हर गांव में महिला समूहों ने मिलकर जल समिति का गठन किया हैजो ग्रामीणों के जलप्रदाय की देखरेख कर रही हैं।

आम तौर पर समाज में घरेलू पानी की व्यवस्था करना महिलाओं का काम माना जाता है और इसके लिए वह दिन.रात जूझती हैं। इससे उनके सेहत के साथ.साथ अन्य घरेलू काम प्रभावित होता है। न जाने कितने घरों में जल को लेकर झगड़े होते थेपरिवारों में दरार पड़ने यहां तक कि गर्भवती महिलाओं का गर्भपात तक की नौबत आ जाती है। इसी तरह किशोरियों की पढ़ाई तक छूट जाती थी।  बच्चे उपेक्षित रहते थे। मां के कई किलोमीटर दूर से पानी लाने के कारण  अक्सर घरों में सबसे बड़ा भाई या बहन अन्य छोटे भाई.बहनों की देखभाल करते हैं। जबकि वह स्वयं उम्र में बहुत छोटे होते हैं। ऐसी अनेक दुख भरी कहानियां छिंदवाड़ा जिले के मऊ ग्राम पंचायत की महिलाओं ने साझा किया। 

ग्राम पंचायत गडमऊ की अनिता चौधरी जल समिति की अध्यक्ष हैं।  उन्होंने बताया कि मोहखेड़ ग्रामीण जल प्रदाय योजना में सिर्फ डेम में बरसात का पानी स्टोर कर इसे शोधन के बाद मऊ ग्राम पंचायत सहित 30 गांवों की प्यास बुझाई जा रही है। दशकों तक संघर्ष करने के बाद उन्हें यह दिन नसीब हुआ है। ग्रामीण महिलाओं को पानी की अहमियत मालूम है। फिलहाल गडमऊ ग्राम पंचायत में करीब 623 नल कनेक्शन हैं।

सरपंच ममता सुदामा डोबले बताती हैं कि पेयजल के लिए मारामारी को देखकर वर्ष 2012 में सरपंच के लिए चुनाव लड़ीलेकिन दुर्भाग्य से हार गई। इस बार चुनकर सरपंच बनीलेकिन पहले ही सरकार ने नल.जल योजना के तहत गांव में पेयजल का समाधान कर दिया। सरकार की इच्छाशक्ति और अधिकारियों की संवेदनशीलता से सब कुछ आसान हो जाता है। उन्होंने कहा कि जब गर्मी के दिनों में कहीं से पानी नहीं मिलता थातो पंचायत की तरफ से टैंक मंगाए जाते थे। उस टैंकर के पीछे महिलाएं बदहवाश भागती हैं। एक किस्सा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि गांव की एक महिला इसी तरह पानी के पीछे भागते हुए पत्थर से टकरा गई और उनका पैर ही टूट गया । वह हमेशा हमेशा के लिए दिव्यांग हो गईं।

 

वहीं अनिता बताती हैं कि उनकी सास ने उन्हें बताया था कि पानी की तलाश में भटकने के दौरान छोटे बच्चों को बड़े बच्चों के हवाले कर घर से निकलना पड़ता था।  एक बार उनकी सास के 3 माह के देवर को बड़े बेटे के हवाले कर जो अभी मात्र 3 साल का ही थापानी के लिए निकल गई थी । छोटा भाई रोने लगातो बड़े ने उसे झूले पर झुलाना शुरू किया । ऐसे में छोटे के गले में रस्सी फंस गई। पड़ोसी ने देखा और तुरंत उसे रस्सी से आजाद कर अस्पताल ले गयाजहां किसी तरह उसकी जान बच पाई। देवर अब 29 साल का हो गया हैपरंतु सास को वह डरावनी कहानी अब भी अच्छी तरह याद हैँ।  अनिता ने कहा कि जितना समय पहले पानी के पीछे चला जाता थाउसे अब महिलाएं रोजगार में लगाकर अपनी आय बढ़ा रही हैं । अनिता की एक दुकान हैजहां से  उन्हें प्रतिमाह 4000 रुपए की आय हो रही है। इस आय से वह परिवार की  मदद करती है और उनका जीवन स्तर भी पहले की अपेक्षा काफी बेहतर हुआ है। इन सब कारणों से वह जलकर वसूली में ज्यादा रुचि लेती हैंताकि यह सिलसिला थमे नहीं। 

 

 इसी तरह ग्राम मऊ से प्रेरणा स्व सहायता समूह की सचिव सविता ढोबले बताती है कि पानी के लिए दो किलोमीटर तक का सफर तीन गुंडी घड़ा सिर पर रखकर तेज कदमों चलकर जाना पड़ता था। वहां कुएँ में रस्सी डालकर पानी खींचने से हाथों में छाले पड़ जाते थेलेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आता थाउसी तकलीफ में 25 लीटर पानी सर पर रखकर लाना पड़ता था। इसके अलावा पानी के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ती थीइससे समय अधिक लग जाता था। कुएं  से चार.पांच महिलाएं इकट्ठे पानी खींचने लगती थीयह सोचकर कि कहीं पानी खत्म न हो जाए। ऐसा भी होता थाजिनका कुआं हैवह पानी भरने से मना करते थेअगर महिलाएं नहीं मानीतब वे कुएं में गोबर डाल देते थेमहिलाओं को अपमानित करते थे।  ऐसे में  आए दिन खाली गुंडी वापस घर लाना पड़ता था। कभी.कभी तो गुंडी को ही फोड़ देते थे। वह दर्द कभी भूलाया नहीं जा सकता। यहां लोगों के पास बहुत छोटे.छोटे खेत हैजिसके चलते पुरुषों को काम के लिए पलायन करना पड़ता है और महिलाएं दिन भर पानी के पीछे भाग दौड़ करती थी। इससे बच्चों का जीवन प्रभावित होता था।

 

              

 

प्रीति प्रेरणा स्व सहायता समूह से जुड़ी हैं । वह बताती है कि घर पर पानी मिलने से वह सिलाई का काम करने लगी। अब परिवारों में पहले जैसा तनाव नहीं है। गांव में अब पानी को लेकर चर्चा कम होने लगी। प्रीति भी अन्य महिलाओं के साथ जल कर वसूलने में साथ देती है। वह कहती हैं कि महिलाएं अपनी कमाई से ही जलकर अदा कर देती हैं।

 

 

 

 संत रविदास स्व सहायता समूह की सचिव संध्या बघेल अब अपना समय गांव में लैंगिक समानता के लिए जागरूक करने में लगाती हैं। उन्होंने कहा कि दूषित पानी से होने वाली डायरियाउल्टी दस्त जैसी बीमारियां भी अब गांव में नहीं देखी जाती।  बच्चे भी पहले की अपेक्षा कम कुपोषित हैं। घरेलू हिंसा में भी कमी आई है।  कुल मिलाकर महिलाएं जागरूक हुई हैं ।

 

मोहखेड़ समूह जल प्रदाय योजना के प्रबंधक बसंत कुमार बेलवंशी बताते हैं दरअसल वर्ष 2012 में मोहखेड ब्लॉक में पानी की समस्या को देखते हुए पीएचई ने वर्ष 2012 में काम करना शुरू कर दिया था। पीएचई ने वर्ष 2013 में यह जिम्मेदारी जल निगम को दे दी। प्रारंभ में इस परियोजना में 18 गांव को जोड़ा गया था। जल निगम को जुलाई 2013 में इस योजना के लिए तकनीकी स्वीकृति और 2015 में प्रशासकीय स्वीकृति के बाद कार्य  प्रारंभ किया गया । इसे पूरा होने में 2 साल का समय लगा। मार्च 2018 में यह योजना पूरी तरह तैयार हुई और मार्च 2018 में ही पानी की सप्लाई शुरू कर दी गई। जल संसाधन की ओर से पानी के आवंटन के बाद पानी की उपलब्धता को देखते हुए इस परियोजना में 29 राजस्व गांवों को शामिल कर लिया गया। इसके अलावा गांव में नए बने घरों में पानी का कनेक्शन देने के लिए रेट्रोफिटिंग का काम चल रहा है।  इस योजना के तहत तगभग 8500 कनेक्शन है और सीधे तौर पर लगळाग 50 हजार आबादी इससे लाभान्वित हो रही है । मुझे बताते हुए गर्व हो रहा है कि जलकर में एक भी समिति डिफाल्टर नहीं है। उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास है कि माचागोरा समूह जल प्रदाय योजना का काम पूरा होने के बाद छिंदवाड़ा जिले के और 711 ग्रामों में भी पानी की समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। 

 

जल निगम के इंजीनियर युवराज वर्मा और यश दोदानी ने बताया कि जल निगम प्रति व्यक्ति न्यूनतम 55 लीटर पानी उपलब्ध कराती है लेकिन जल कर और जल से संबंधी कोई भी निर्णय जल समिति को लेने का पूरा अधिकार है।




 







पीएमईजीपी   लोन से ग्रामीण उद्यमियों ने संवारा जीवन

रूबी सरकार
मध्य प्रदेश का बड़वानी जिला 1948 से पहले राज्य की राजधानी हुआ करता था। यह छोटा सा राज्य अपनी चट्टानी इलाकों और कम उत्पादक भूमि के चलते अंग्रेज, मुगल और मराठों के शासन से बचा रहा। यहां जैन तीर्थ यात्रा का केंद्र चूलगिरि और बावनगजा के लिए मशहूर है। मध्य प्रदेश के दक्षिण पश्चिम में स्थित बड़वानी के दक्षिण में सतपुड़ा एवं उत्तर में विन्ध्याचल पर्वत शृंखला है। करीब 13 लाख आबादी वाले बड़वानी को 25 मई 1998 को मध्यप्रदेश में जिले का दर्जा मिला। आदिवासी बाहुल्य इस जिले  की साक्षरता दर करीब 50 फीसदी से कम है। अति पिछड़ा होने के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में जिन 112 आकांक्षी जिलों का चुनाव किया था, उनमें बड़वानी भी शामिल हैं। लेकिन वर्ष 2014 से 2021 के बीच इस जिले ने इतनी तरक्की की कि यह प्रदेश के टॉप 10 जिला में शुमार हो गया। राज्य नीति आयोग की ग्रेडिंग के अनुसार यह जिला वर्ष 2021 में प्रदेश के टॉप 10 जिले में शामिल हो गया। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि यहां कृषि के साथ-साथ सूक्ष्म उद्योगों की ओर युवाओं ने हाथ आजमाना शुरू किया।
दरअसल खुद का कारोबार शुरू करने के लिए प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत मिलने वाली राषि युवाओं के लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ। इसी जिले की तीन आदिवासी संतोष वसुनिया, पवन और लक्ष्मी वाणी से उनके स्वरोजगार के संबंध में बात की, तो पता चला कि तीनों ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत लोन लेकर अपना कारोबार शुरू किया है।
पेटलावद की 44 वर्षीय संतोष वसुनिया बताती है कि जब कोरोना महामारी के दौरान शहर से गांव की ओर लोग पलायन कर रहे थे, तब उसके मन में एक बात कौंधी कि आखिर इतने लोगों की आजीविका कैसे चलेगी। क्योंकि उस वक्त तक गांव में कोई रोजगार के साधन नहीं थे। कृषि और कृषि मजदूरी के अलावा ग्रामीण पलायन पर ही जाते थे। असंख्य प्रवासियों को इस तरह बदहवास अपने-अपने गांव की ओर लौटते देखकर संतोष विचलित हो गई। उसी वक्त उसने ठान लिया कि निर्वाह के लिए कम वेतन वाले काम करने से बेहतर है कि सरकार से लोन लेकर छोटा व्यवसाय शुरू कर जीवन को सुरक्षित किया जा सकता है। संतोष दरअसल झाबुआ की है और शादी के बाद वह पेटलावद आई। उसने कहा कि  मैंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे, बहुत सारी चुनौतियों का सामना किया है, पिता कृषि मजदूर थे। वह बताती हैं, ज वह सिर्फ  4 साल की थी, तब उसके पिताजी गुजर गए। मां को छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर मजदूरी करने जाना पड़ता था। होनहार होते हुए भी वह 10वीं तक ही पढ़ पाई थी कि उसकी शादी कर दी गई और वह पति के साथ पेटलावद चली आई। उसने दो संतान को जन्म दिया। संतोष बताती है  कि लेकिन मेरी जिजीविषा मुझे कहीं रुकने नहीं दिया। कभी नाउम्मीद नहीं हुई। आत्मनिर्भर होने की  इच्छा ने कभी उसका पीछा नहीं छोड़ा। जबकि उसके परिवार में किसी का व्यवसाय से कोई नाता नहीं था। लॉकडाउन खत्म होते ही उसने सौंदर्य प्रसाधन की  दुकान खोलने का निर्णय लिया । इस बीच उनका संपर्क  ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया (टीआरआई) एंटरप्रेन्योरशिप फैसिलिटेशन हब टीम से हुआ और वह उनकी मदद से  व्यवसाय की दिशा में काम करने लगी ।
उसने अपनी बचत से  एक लाख रुपए का निवेश किया और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना (पीएमईजीपी) के तहत वित्तीय सहायता के रूप में 3.75 लाख रुपए प्राप्त कर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया। अब  संतोष   का सौंदर्य प्रसाधन के साथ-साथ जलपाल इत्यादि से संबंधित एक सफल दुकान है । जिससे वह अपने परिवार को आर्थिक मदद कर रही है।
संतोष की तरह पवन जमरे और लक्ष्मी वानी भी बताती हैं कि ग्रामीण भारत में कितनी मानवीय क्षमताएं मौजूद हैं। ऐसे समय में जब बेरोजगारी चरम पर है, बड़वानी के राजपुर ब्लॉक के चितावल गांव के 20 साल के पवन ने एक उद्यमी के रूप में कदम आगे बढ़ाया है। वह एक छोटे किसान परिवार से आते हैं और महज 8वीं तक पढाई की है। वह बताते हैं,  कि मैंने अपने गांव के पास के एक इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान पर एक दैनिक मजदूर के रूप में काम करना शुरू किया था और प्रतिदिन लगभग 150 से 200 रुपए कमा लेता था। टीआरआई की  सुमन सोलंकी ने इलेक्ट्रॉनिक्स में मेरी दिलचस्पी को देखते हुए मुझे ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान से मोबाइल रिपेयरिंग ट्रेनिंग प्रोग्राम में भाग लेने सुझाव दिया और इसमें नामांकन कराने में मेरी मदद की।

अब पवन के पास अपना खुद का मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान है। जुलवानिया, बड़वानी में एंटरप्राइज फैसिलिटेशन हब ने उन्हें उनके व्यवसाय को सशक्त बनाने के लिए एक्सीलरेटेड एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम (एईडीपी) में भाग लेने में मदद की। प्रशिक्षण के दौरान, पवन ने अगले 3 वर्षों के लिए अपना खुद का बिजनेस प्लान तैयार किया और लोन भी प्राप्त किया।

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वर्षीय लक्ष्मी वानी की भी कुछ इसी तरह की कहानी है। वह बड़वानी के नेवाली विकासखंड के नेवाली गांव की रहने वाली हैं और ओबीसी समुदाय से संबंध रखती हैं। जैसा कि कम आय वाले ग्रामीण परिवारों में आम है, लक्ष्मी ने सिर्फ 11वीं कक्षा तक पढ़ाई की और कम उम्र में ही उनकी शादी कर दी गई। एक दिहाड़ी मजदूर की पत्नी और तीन बच्चों की मां के रूप में, वह आय के दूसरे साधन तलाशने लगीं.

वह बताती हैं, मैं नेवाली गांव में टीआरआई इंडिया की यूथ हब टीम द्वारा आयोजित एक अभियान में शामिल हुई, और उद्यमिता के प्रति मेरी रुचि बढ़ी । मैं कंप्यूटर की बुनियादी बातें जानती थी और एक कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) चलाने का सपना मैं पहले से ही देखती आ रही थी। यूथ हब टीम ने बड़वानी में ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान  के साथ मिलकर लक्ष्मी को छह दिन के आवासीय सीएससी आईडी ट्रेनिंग एंड सर्टिफिकेशन कोर्स में नामांकन करा दिया। अब वह अपना खुद का सीएससी बिजनेस चला रही हैं । इस तरह लक्ष्मी अपने गांव की दूसरी महिलाओं की प्रेरणास्रोत बन गई हैं।
यूथ इनिशिएटिव ऑफ ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया में प्रैक्टिशनर, रानू कुमार सिंह कहती हैं, सफलता की ये कहानियां जमीनी स्तर के उन स्वयंसेवी संस्थाओं के महत्व पर जोर देती हैं, जो ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को उनका खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए  वित्तीय साक्षरता प्रदान करते हैं और साथ ही प्रशिक्षण, मार्केट रिसर्च, प्रॉडक्ट डेवलपमेंट और अन्य जरूरी कौशल उपलब्ध कराते हैं।