Thursday, December 7, 2017

BHEEM KUND Chhatarpur

आपदा से पहले संकेत देने वाला कुंड



बड़ा मलहरा विकास खण्ड ,सागर-छतरपुर (मध्य प्रदेश) राजमार्ग  पर  भीमकुण्ड सुरम्य पहाडिय़ों के बीच स्थित है। यह  कुण्ड बुंदेलखण्ड के प्रमुख तीर्थेंा में से एक है।  वैसे तो देखने में एक साधारण कुण्ड लगता है,लेकिन इसकी खासियत है कि जब भी एशियाई महाद्वीप में कोई प्राकृतिक आपदा घटने वाली होती है तो इस कुण्ड का जलस्तर पहले ही खुद.ब.खुद बढऩे लगता है । इस कुण्ड का पुराणों में नीलकुण्ड के नाम से उल्लेख मिलता है, जबकि  अब इसे भीमकुण्ड के नाम से जाना जाता हैं। ऐसा माना जाता है, कि यहां स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं। मकर संक्रांति पर यहां डुबकी लगाने का रविशेष महत्व माना जाता है। 18वीं शताब्दी के अंतिम दशक में विजावर रियासत के  राजा ने यहां मेले का आयोजन किया । तब से प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर यहां भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।

अब तक मापी नहीं जा सकी है कुण्ड की गहराई


भीमकुण्ड की गहराई अब तक नहीं मापी जा सकी है। कुण्ड के चमत्कारिक गुणों का पता चलते ही डिस्कवरी चैनल की एक टीम कुण्ड की गहराई मापने के लिए आई थी, लेकिन ये इतना गहरा है, कि वे जितना नीचे गए उतना ही अंदर और इसका पानी दिखाई दिया। बाद में टीम वापिस लौट गई।

रोचक इतिहास

कहते हैं अज्ञातवास के दौरान एक बार भीम को प्यास लगीए काफी तलाशने के बाद भी जब पानी नहीं मिला तो भीम ने जमीन में अपनी गदा पूरी शक्ति से मारीए जिससे इस कुण्ड से पानी निकल आयाण् इसलिए इसे भीमकुण्ड कहा जाता है।

भौगोलिक घटना से पहले देता है संकेत










जब भी कोई भौगोलिक घटना होने वाली होती है यहां का जलस्तर बढऩे लगता हैए जिससे क्षेत्रीय लोग प्राकृतिक आपदा का पहले ही अनुमान लगा लेते हैंण् नोएडा और गुजरात में आए भूकंप के दौरान भी यहां का जलस्तर बढ़ा थाण् सुनामी के दौरान तो कुण्ड का जल 15 फीट ऊपर तक आ गया था।

Khajuraho- Matangeshwar Mandeer


खजुराहो चंदेल साम्राज्य की सांस्कृतिक राजधानी था। पर्यटन, ज्ञानअर्जन तथा अध्यात्मिक दृष्टि से यह दुनियां के श्रेष्ठतम नगरों में से एक है। चंदेल राजाओं द्वारा बनवाये गये मंदिरों में मतंगेश्वर  पहला मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण हर्षवर्मन ने 920 ई. के लगभग करवाया था। खजुराहो के पुरातत्व मंदिरों में यह ही एक मात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें आज भी पूजा-पाठ होता है तथा लोकमत के अनुसार निर्माण काल से निरंतर होता आया है। यह खजुराहो का पवित्रतम मंदिर है । मंदिर के बारे में मान्यता है, कि इसमें सबसे पहले महाराजा हर्षवर्मन ने मरकतमणी नामक मणि  की स्थापना की थी, इस मणि को भगवान शिव ने खुद सुधिष्ठिर को दिया था और युधिष्ठिर से ही चलकर यह मणि हर्षवर्मन तक पहुंची थी इस मणि की स्थापना के बाद ही वृहत जंघा तथा लिंग की स्थापना की गई थी। जंघा का व्यास 7.2 है एवं इसमें स्थित लिंग 2.5 मीटर ऊंचा तथा 1.1 मीटर व्यास का लिंग है, जो अपने तरह का एक ही है।
बालू पत्थर का बना हुआ यह मंदिर शिल्पकारी की दृष्टि से बहुत ही साधारण है, रचना की दृष्टि से ब्रह्मा मंदिर का ही विशाल रूप है। ऊंची जगती के ऊपर सामने सीढिय़ों से सुसज्जित गर्भगृह का द्वार है। गर्भगृह में जंघा एवं शिवलिंग की स्थापना है। मंदिर की छत वर्गाकार सुंदर तथा विशाल है। गर्भगृह के तीन और अहातेदार झरोखे हैं, जिनमें से उत्तरी झरोखे से होकर नीचे की ओर सीढिय़ां बनी है। मंदिर का एक ही शिखर  सूच्याकार या पिरामिड शैली का है। प्रवेश द्वार के ऊपर शिखर पर गड़े हुए मुकुट से शिखर का सौन्दर्य द्विगुणित हो जाता है। मंदिर के चबूतरे के दक्षिण ओर 1880 में बना हुआ संग्रहालय दिखाई देता है, जो अब पुरातत्व विभाग का अवशेष भण्डार है।