Sunday, July 2, 2023

प्रोत्साहन व योजनाओं के बावजूद, हर दूसरा किसान गरीब

 


प्रोत्साहन व योजनाओं के बावजूद, हर दूसरा किसान गरीब

रूबी सरकार

भारत में पच्चीस फीसदी लोग गरीब हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में 37 रुपए और शहरी क्षेत्रों में 47 रुपए प्रतिदिन कमाते हैं। इनमें से अधिकांश बिगड़े पर्यावरण वाले प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्रों में रहते हैं। सन 2019 तक भारत में गरीबों की संख्या में हो रही कमी सबसे तेज थी, लेकिन कोविड महामारी ने इस तेजी को कम कर दिया है। भारत में गरीबी के कारण मुख्य रूप से पारिस्थितिक इकोलॉजिकल हैं और इस प्रकार गरीबी को कम करने की चाबी पर्यावरणीय क्षरण को रोकने और प्राकृतिक संसाधनों के उचित प्रबंधन में निहित है।
 विख्यात पर्यावरणविद् और पत्रिका डाउन टू अर्थ के प्रबंध संपादक रिचर्ड महापात्रा पिछले दिनों  “21 वीं सदी में पारिस्थितिक विपन्नता भारत के कुछ क्षेत्रों में हमेशा क्यों?”  विषय पर भोपाल में महेश बुच स्मरण व्याख्यान देने भोपाल आए। उन्होंने कहा कि भारत में नब्बे करोड़ लोग पर्यावरण क्षरण का दंश झेल रहे हैं। ज्यादातर गरीब, बिगड़े पर्यावरणीय क्षेत्रों में रहते हैं  जिसमे 30 फीसदी मरुस्थलीकरण जैसे क्षेत्रों में फैले हैं और देश के एक तिहाई जिले सूखा प्रवृत हैं । सूखा पर अध्ययन का हवाला देते हुए रिचर्ड कहते हैं कि हर दो साल में  एक बार देश को सूखा आता है। जिससे 20 करोड़ लोग गरीब हो जाते हैं। इसलिए देश में खेत मजदूरों की संख्या बढ़ी है। यहां लगभग 68 फीसदी भूमि वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर है, इस प्रकार खेती पूरी तरह प्राकृतिक अनियमितता के अधीन हैं। यही वजह है कि दुनिया से तुलना की जाए तो भारत के किसान सबसे गरीब हैं। इसके अलावा सबसे गरीब जिलों में वन क्षरण भी  सबसे अधिक है, यही कारण है कि गरीब जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। महापात्र ने चेतावनी दी कि अगर हम अभी भी न चेते तो 2030 तक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण भारत को प्रति वर्ष 700 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। रिचर्ड यह भी बताते हैं कि इन सबके बीच रालेगांव सिद्धि जैसे ग्रामीणों का उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां सामूहिक प्रयास से ग्रामीणों ने अपनी आय में वृद्धि की। यहां तक वहां भारतीय स्टेट बैंक की शाखा खोलनी पड़ी। वहां के किसान आयकर दाता हैं।

वे बताते हैं कि 13 करोड़ गरीबों में से 60 फीसदी मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, यूपी, ओडिशा और छत्तीसगढ़ राज्यों में रहते हैं । मध्य प्रदेश का अलीराजपुर देश का सबसे गरीब जिला है, जहां 76 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं। देश में वन आवरण और गरीबी का सीधा रिश्ता है, जितना अधिक वन आवरण उतना अधिक गरीबी। इसका कारण वन क्षेत्रों का क्रमिक रूप से बिगड़ते जाना है । 2019 तक भारत सबसे तेजी से गरीबी कम करने वाला देश था और एसडीजी लक्ष्य से बहुत पहले 2022 तक गरीबी समाप्त होने की उम्मीद थी। लेकिन कोविड महामारी के कारण ऐसा नहीं हुआ जिसने भारत को पीछे की ओर धकेल दिया। कोविड महामारी से पहले सन 2019 में  देश में गरीबों की संख्या 6 करोड़ थी लेकिन कोविड महामारी के दौरान अकेले एक वर्ष में 7.4 करोड़ गरीब और बढ़ गए।
रिचर्ड बताते हैं कि विभिन्न प्रोत्साहनों और योजनाओं के बावजूद, भारत में हर दूसरा किसान गरीब है। आश्चर्य की बात है कि विकास योजनाओं में वृद्धि के बावजूद देश के सबसे गरीब जिले गरीब ही रहे। पहले इन जिलों को गरीबी रेखा के नीचे वाले जिलों में शुमार किया जाता था, अब केंद्र सरकार ने इन जिलों को अति पिछड़ा कहकर इन्हें प्रगति के पथ पर अग्रसर करने के उद्देश्य से महत्वाकांक्षी आकांक्षी जिला कहना प्रारंभ किया, इसके तहत विकास के मापदंड में पिछड़ चुके इन जिलों को कृषि , स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्तीय समावेशन और बुनियादी सुविधाओं के स्तर पर ऊंचा करने के लिए कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
  रिचर्ड अपने शोध अध्ययनों का हवाला देते हुए कहते हैं कि, भारत में गरीबी चिरकालिक है, यह पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती रहती है। उन्होंने काला हांडी का पनस पूंजी का उदाहरण देते हुए बताया कि देश की गरीबी का सिंबल है । आज से 30 साल पहले जिसने भूख मिटाने के लिए अपनी ननद को 40 रुपए में बेचा था। आज भी उनका छह लोगों का परिवार 100 रुपए में प्रतिदिन गुजारा करते है।   जबकि इनमें से  अधिकांश गरीब प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्रों में रहते हैं। देश के 22 करोड़ लोग सिर्फ जंगल पर निर्भर है और देष का हर दूसरा रुपया प्राकृतिक संसाधन से आता है। यह भी आश्चर्य की बात है कि भारत में गरीबी न केवल अर्थव्यवस्था का विषय है बल्कि पारिस्थितिकी से भी जुड़ी हुई है।
राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान मध्यप्रदेश के संस्थापक निदेशक प्रो धीरज कुमार उनकी बातों का समर्थन करते हुए कहते हैं कि यह हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी है कि जो समस्याएं हमारे सामने हैं उनके समाधान सभी के प्रयासों से निकाले जाए। इसके लिए शैक्षणिक संस्थानों में इस विषय पर गंभीरता से विचार-विमर्श होना चाहिए ताकि विद्यार्थी इससे संबंधित समस्याओं को समझकर भविष्य में इस विषयों के  प्रोजेक्ट्स पर काम कर सकें। उन्होंने कहा कि रालेगांव सिद्धि के ग्रामीण जब आयकर दे सकते हैं तो हमें इस तरह के मॉडल्स का विस्तार देना चाहिए और यह सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।

                                                                        11 June,2023 Amrit Sandesh



क्राई ने शुरू किया बाल श्रम रोकने हस्ताक्षर अभियान

 

क्राई ने शुरू किया बाल श्रम रोकने हस्ताक्षर अभियान

रूबी सरकार

मध्य प्रदेश के सबसे बड़े और साफ-सुथरे मिनी मुंबई कहे जाने वाले इंदौर शहर में जब पता चलता है कि एक चॉकलेट फैक्ट्री में बड़ी संख्या में बाल मजदूर है, तब लोगों का चौकना लाजमी है, क्योंकि यह पढ़े-लिखे लोगों का शहर माना जाता है और यहां सभी को बाल मजदूरी कानून के बारे में मालूम है। फिर भी कोई बाल श्रम के खिलाफ आवाज नहीं उठाता। यह जिम्मेदारी सिर्फ स्वयंसेवी संस्थाओं की है।
दरअसल 30 मई को चाइल्ड राइट्स एंड यू की साथी संस्थान आस रिसोर्स सेंटर के बच्चों के मार्फत क्राई को यह जानकारी मिली कि लसूड़िया इलाके मे स्थित एक चॉकलेट फैक्ट्री में काफी बच्चे मजदूरी कर रहे हैं। क्राई के कार्यकर्ताओं ने दो दिनों तक निगरानी की । तब जाकर इस बात की पुष्टि हुईं।
1 जून को आस चाइल्डलाइन ने क्राई टीम के साथ मिलकर इंदौर में बाल श्रम में लिप्त बच्चों को छुड़ाने की पहल की। क्राई की टीम ने चाइल्ड लाइन और पुलिस प्रशासन के साथ मिलकर चॉकलेट फैक्ट्री से 4 लड़के और 6 लड़कियों को काम करते हुए पाया। इनकी उम्र 10 से लेकर 17 वर्ष तक थी।
अगले दिन काउंसलिंग के दौरान बच्चों ने बताया कि वे शाम  7 से 11 बजे तक चॉकलेट बनाने व पैकिंग संबंधी काम करते है। इस काम के लिए उन्हें प्रतिदिन 100 रुपये मजदूरी मिलती है। रेस्क्यू किए गए बच्चों के माता-पिता को बाल कल्याण समिति के समक्ष बाल श्रम में बच्चों की संलिप्तता के बारे में जानने  तथा बच्चों एवं चॉकलेट फैक्ट्री के मालिकों के साथ  समिति ने चर्चा की । इसके बाद विभागीय टास्क फोर्स की ओर से गहन जांच के बाद, नियोक्ता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई। 4 जून 2023 को खाद्य विभाग के अधिकारियों ने चॉकलेट फैक्ट्री को सील कर दिया. बाल कल्याण समिति ने श्रम विभाग को पत्र के माध्यम से फैक्ट्री के नियोजक के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
यह कोई प्रदेश का एक अकेला मामला नहीं है। हर शहर में बाल मजदूर दिखाई देेते हैं, परंतु नियोक्ता को कोई रोकता नहीं। इसलिए उन्हें डर भी नहीं। इसी तरह का एक और मामला सामने आया। जहां 12 साल के किशोर को पिता की मृत्यु के बाद काम करना पडा। हालांकि अब वह 16 साल का हो चुका है। उसने बताया कि पिता की मृत्यु के बाद माँ ने दूसरी शादी कर ली। सौतेले पिता की कमाई ज्यादा नहीं थी और न ही वह बालक के पीछे खर्च करना चाहते थे। घर में खाने पीने का अभाव हमेशा बना रहता था। इस अभाव के चलते उसने एक होटल में काम करना शुरू किया । जब उसने काम शुरू किया , उस वक्त उसकी उम्र मात्र 13 साल थी। उसने चौथी तक की पढ़ाई भी की । उसके बाद होटल में काम करने के लिए पढ़ाई  छोड़ दी। मां ने दूसरी शादी कर तो ली, लेकिन वह अपने बड़े बेटे की कमाई से घर और छोटे भाई का भरण-पोषण करने लगी । परिस्थिति तब और बिगड़ गई, जब सौतेले पिता ने बेटे की कमाई पर हाथ मारना शुरू किया।  नशे के लिए उसके साथ मारपीट कर उसका पैसा छीनने लगा। सौतेले पिता के इस दुर्व्यवहार से तंग आकर उसने घर छोड़कर भोपाल रेलवे स्टेशन के पास एक फैक्ट्री में बोतल में पानी भरने का काम करने लगा। इस बीच उसे काम करते समाज ने देखा, लेकिन किसी ने इसका विरोध नहीं किया। फिर वही स्वयं सेवी संस्था और श्रम विभाग ने छापेमारी कर उसे पकड़ा। उसके साथ और और नाबालिग भी काम करते हुए पाए गए।
क्राई की क्षेत्रीय निदेशक सोहा मोइत्रा बताती हैं कि  लोगों की उदासीनता के कारण ही समाज में बाल श्रम कम नहीं हो रहा है। मोइत्रा ने बाल श्रम के खिलाफ ‘डॉन्ट हेल्प चिल्ड्रन - बाय एमपलोइंग देम’षुरू किया है। जिससे लोगों की मानसिकता बदले। इस अभियान में बच्चों के साथ-साथ  पुलिसकर्मी, आशा कार्यकर्ता एवं जनप्रतिनिधि भी भाग ले रहे हैं। भोपाल दक्षिण-पश्चिम से विधायक पी सी शर्मा एवं इंदौर के पलासिया स्थित महिला थाना के सभी पुलिस कर्मियों ने हस्ताक्षर अभियान में भाग लेकर बाल श्रम के खिलाफ खड़े होने का संकल्प लिया। सोमवार से शुरू हुए इस अभियान के अंतर्गत भोपाल सहित की अन्य जिलों में हस्ताक्षर अभियान एवं रैली निकाली गई एवं लोगों से इसके खिलाफ खड़े होने की अपील की है. यह कैंपेन एक महीने चलेगा।
मोइत्रा बताती है कि बच्चों का किसी भी प्रकार के कमर्शियल काम में शामिल होना उनका बचपन छीन लेता है. यह उन्हें वयस्कों की जिम्मेदारियां ढोने पर विवश करता है. जो उन्हें पढ़ाई के साथ खेलों से भी वंचित कर देता है.
उन्होंने अभियान के औचित्य स्पष्ठ करते हुए कहा कि ज्यादातर लोग यह सोचते है कि गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों का काम करना सही है. वे भुखमरी और गरीबी से लड़ने में अपने परिवार की मदद कर रहे हैं।  इस मानसिकता को बदलने के लिए ही यह अभियान शुरू किया गया है। लोगों से अपील है कि बच्चों को नौकरी देकर उनकी मदद न करें। इसकी बजाए उन्हें पढ़ने, खेलने और बचपन जीने में उनकी मदद करें।
उन्होंने कहा कि इससे पहले क्राई वालेंटियर्स द्वारा 2022 में एक रैपिड असेसमेंट सर्वे किया  , जिसमें यह निकलकर आया कि 45 फीसदी लोग मानते हैं कि  यदि स्कूली शिक्षा प्रभावित न हो तो बच्चों का परिवार को सहयोग करने के लिए काम करना सही है ।
क्राई का मकसद ही था कि बालश्रम पर लोगों की धारणाओं को समझना और जरूरत पड़े तो उसे बदलना। इस राष्ट्रीय सर्वे मे मध्य प्रदेश सहित 26 राज्यों के परिवार को शामिल किया गया था। लगभग 72 फीसदी का मानना है कि बाल श्रमिकों को बीमारियां होने का अधिक खतरा होता है जबकि 23 फीसदी अनिश्चित थे, और शायद इसमें शामिल विभिन्न जोखिमों से भी अनजान थे। सर्वे के अनुसार 31 फीसदी लोगों का कहना है कि उन्हें बाल श्रम पर रोक लगाने वाले किसी भी कानून की जानकारी नहीं है।
वहीं 79 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें कहीं बाल श्रम की जानकारी मिलती है तो वे अथॉरिटी या एनजीओ से संपर्क करते हैं। जबकि 17 फीसदी इस बात को लेकर अनिश्चित थे कि बाल श्रम का पता चलने पर क्या करना चाहिए। क्राई का उद्देश्य है कि अभियान के माध्यम से बाल श्रम की रिपोर्ट करने के लिए मौजूदा रिपोर्टिंग तंत्र के बारे में नागरिकों को संवेदनशील बनाना । रहवासी अपने आस-पास किसी भी बाल श्रम के मामलों की सूचना पीईएनसीआईएल या 1098 पर कॉल करके बाल श्रम के खिलाफ खड़े हों”।
अब क्राई ने  अभियान के तहत आवासीय सोसायटियों तक पहुंचकर नागरिकों को बाल श्रम न कराने के लिए जागरूक करने का काम करेगा और बाल श्रम के मामलों की रिपोर्ट करने वाले लोगों को प्रोत्साहित  करेगा। क्राई इसके लिए देष भर में जागरूकता पोस्टर लगाने एवं राष्ट्रव्यापी प्रतिज्ञा अभियान भी चलायगा। जिसमें लोगों से बाल श्रम के खिलाफ प्रतिज्ञा लेने और हस्ताक्षर अभियान मे सम्मिलित होकर फोटो या स्क्रीनशॉट लेकर सोशल मीडिया में इसे टैग करने का अनुरोध किया जाएगा।
बाल श्रम के प्रति संस्थान के दृष्टिकोण के बारे में बताते हुए मोइत्रा ने कहा, “क्राई  बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का पालन करता है, जो 0 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के प्रत्येक मनुष्य को एक बच्चे के रूप में परिभाषित करता है, जो शिक्षा, पोषण और संरक्षण के अधिकार का हकदार है। ये बच्चे न केवल गरीबी के कारण काम कर रहे हैं बल्कि इसलिए भी कि वे सस्ते श्रम प्रदान करते हैं। बाल श्रम कानून के प्रति हमारे समाज को जागरूक होने की जरूरत है। उन्हें यह समझने की जरूरत है कि हमारे बच्चों और बाल श्रमिकों के रूप में काम करने वालों के बीच कोई अंतर नहीं है। इस प्रकार, हमारा मानना है कि यह अभियान इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी स्थापित करने में एक व्यापक भूमिका निभा सकता है।

                   25 June 2023 Amrit Sandesh




डिजिटल हुआ तो सौ फीसदी जलकर अदा करने लगे ग्रामीण

 










 डिजिटल हुआ तो सौ फीसदी जलकर अदा करने लगे ग्रामीण

रूबी सरकार
 
राजगढ़ जिले में इससे पहले कई बार जाना हुआ। परंतु इस बार राजगढ़ जिले का कुडीबेह गांव की  लोग बहुत खुश दिखे। ं क्योंकि अब उनके दरवाजे पर कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (एफएचटीसी) के साथ-साथ मोबाइल या कम्प्यूटर पर उनका नाम भी दर्ज हो गया हैं। उन्हें जो घरेलू उद्देश्यों के लिए जो पर्याप्त पानी उपलब्ध हो रहा हैं,उसके लिए वे नियमित जलकर अदा कर रहे हैं। ग्रामीणों को अब लोकलाज का डर हो गया है कि अगर जलकर नहीं अदा करेंगे, तो उनका नाम सार्वजनिक हो जाएगा कि उन्होंने पानी का उपयोग तो कर लिया परंतु जलकर नहीं दिया। इससे उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आएगी। ग्रामीणों का यह बोध जलकर का डिजिटलीकृत होने से सामने आया है।
राजगढ़ जिला भारत के 117 आकांक्षी जिलों में से एक है। और यह जल संकट वाले 255 जिलों में 205 वें स्थान पर है (स्रोत डाउन टू अर्थ, सोमवार 16 मार्च 2020), राजगढ़ में भूजल स्तर 2-4 मीटर तक नीचे चला गया है।
यहां पानी की कमी के समाधान और पेयजल का एक स्थायी स्रोत प्रदान करने के लिए एमपीजेएनएम ने बहु-ग्रामीण जलापूर्ति योजना शुरू की हैं जो सतही जल स्रोत पर आधारित हैं। गोरखपुरा मल्टी विलेज ग्रामीण जलापूर्ति योजना उनमें से एक है जो राजगढ़ जिले के राजगढ़ और खिलचीपुर ब्लॉकों में लागू की गई है, जिसमें 115395 की आबादी के 156 गाँव (राजगढ़ के 124 और खिलचीपुर ब्लॉक के 32 गांव) शामिल हैं। यह एमवीएस संचालन और रखरखाव के अधीन है और अब 24000 से अधिक कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (एफएचटीसी) के माध्यम से 156 गांवों के लिए उपचारित पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है।
कुडीबेह गांव, कुडीबेह पंचायत का मुख्यालय योजना के उन गांवों में से एक है जहां पेयजल की आपूर्ति गृह सेवा कनेक्शन (एचएससी) से की जाती है। गांव में 127 घर हैं जो एससी, ओबीसी और सामान्य वर्ग के हैं। ग्रामीणों के लिए पीने के पानी का मुख्य स्रोत 4 खुले कुएं और 3 हैंडपंप थे जो भूजल पर आधारित थे, लेकिन हर गर्मियों में पानी की कमी एक बड़ी समस्या बन जाती थी। भूजल स्तर नीचे जाने और स्रोत सूखने से ग्रामीण परेशान थे।
कुडीबेह गांव की 85 वर्षीय बुजुर्ग महिला रतन बाई बहुत खुश हैं और सरकार का आभार व्यक्त करती हैं और अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहती हैं, “जब मैं छोटी थी और नवविवाहित थी तब से लेकर कुछ साल पहले तक मैं हर दिन घंटों पानी संग्रह करती थी।” कुओं से पानी, जो मेरे घर से करीब 1 से 2 किलोमीटर दूर स्थित था। अब मेरे घर में नल कनेक्शन है और इससे मुझे पानी इकट्ठा करने के बोझ से राहत मिल गई है, अन्यथा मैं इस उम्र में कुओं से पानी कैसे लाता।
गांव की दिव्यांग महिला कमला बाई बताती हैं, मेरा एक हाथ ठीक से काम नहीं करता है इसलिए पानी इकट्ठा करना मेरे लिए बड़ी चुनौती थी लेकिन मुझे कुओं से पानी इकट्ठा करना पड़ता था और छोटे बर्तनों में लेना पड़ता था, जिससे मेरा ज्यादातर समय पानी इकट्ठा करने में ही बीत जाता था। मुझे घर के दूसरे काम करने में देर हो जाती थी. अब मेरे घर में नल कनेक्शन है जो मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं है क्योंकि मेरे जैसी महिला जिसका एक हाथ ठीक से काम नहीं करता, उसके लिए घर से दूर कुएं से पानी लाना बहुत कष्टदायक था।
पर्वत सिंह (वाल्व ऑपरेटर) ने बताया कि मेरा जन्म और पालन-पोषण इसी गांव में हुआ है और मैंने देखा है कि मेरी मां, बहन और कुछ समय मेरे पिता भी पीने के लिए कुओं से पानी लाते थे और गर्मियों के दौरान जब हमारे गांव के कुएं सूख जाते थे उस समय मुझे और मेरे पिता को दूसरे गांव से पानी लाना पड़ता था। पिछले पांच वर्षों से हमने और कुछ ग्रामीणों ने पीने के पानी का अस्थायी समाधान निकाला, हमने छोटे मोटर पंप और पाइपों की व्यवस्था बनाई, जिससे हम कुएं में मोटर डालकर पाइपों के माध्यम से घरों में पानी लेते थे। इसके लिए हमें कुएं से अपने घरों तक पानी ले जाने के लिए एक मोटर और पाइप खरीदना पड़ा, जिसकी लागत लगभग 15 से 20 हजार थी और यह केवल तभी काम करता है जब हमारे पास कुएं में पानी होता है, इसके लिए बिजली की भी आवश्यकता होती है। कभी-कभी पानी को लेकर झगड़े भी होते थे क्योंकि गर्मियों में कुओं का पानी बहुत नीचे चला जाता था और जो भी सुबह-सुबह मोटर डालकर पानी खाली कर देता था, दूसरे लोग उससे झगड़ने लगते थे।
गांव की फूला बाई, घीसी बाई और कुडीबेह गांव की अन्य महिलाएं कहती हैं कि हम और हमारे बच्चे विशेषकर लड़कियां अपने सिर पर दूर से पानी ढोकर लाती थी, क्योंकि हमारे पास कुओं पर मोटर लगाने के लिए पैसे नहीं थे। हमें पानी लाना पड़ता था, भले ही हम बीमार हों या गर्भवती हो (वह समाज के सीमांत वर्ग से आती हों) हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। कृष्णा (आशा कार्यकर्ता) ने वीडब्ल्यूएससी बैठक में हिस्सा लेते हुए कहती हैं कि नल का पानी हमारे स्वास्थ्य में सुधार कर रहा है और ग्रामीणों को जल जनित बीमारियों से भी बचा रहा है, विशेषकर 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित पेयजल का अधिक लाभ मिला है।
कुल्टा पवार (आंगनवाड़ी कार्यकर्ता) कहती हैं कि हम अपने घर में नल के पानी की आपूर्ति से खुश हैं । घरों में पानी की उपलब्धता के कारण अब किशोरियों को पानी लाने के लिए दूर नहीं जाना पड़ता है, जिससे उन्हें पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय मिलने लगा है और उन विशेष दिनों (मासिक धर्म) के दौरान व्यक्तिगत स्वच्छता में भी सुधार हुआ है और वे मासिक धर्म स्वच्छता का प्रबंधन कर रही हैं। .
अब कुडीबेह गांव प्रमाणित हर घर जल गांव बन गया है और गांव के सभी घरों में कार्यात्मक हाउस टैप कनेक्शन (एफएचटीसी) हैं, स्कूल, आंगनबाड़ी और पंचायत भवन में भी नल कनेक्शन हैं। गोरखपुरा एमवीएस ने घर पर सुरक्षित पानी तक किफायती पहुंच प्रदान की है। यही कारण है कि ग्रामीणों ने बिना किसी देरी के वीडब्ल्यूएससी को जल शुल्क 100 रुपए प्रति माह का भुगतान करना शुरू कर दिया है।
जल निगम मध्यप्रदेश की परियोजना क्रियान्वयन इकाई की प्रबंधक जन सहभागिता प्रियंका जैन बताती हैं कि कुडीबेह गांव से वीडब्ल्यूएससी  100 फीसदी जल राजस्व एकत्र कर रहा है और यह गांव जिले की पहली वीडब्ल्यूएससी ग्राम पंचायत बन गई है जो मप्र में जल कर के करदाताओं का पंजीकरण पंचायत दर्पण पोर्टल, जो सरकारी वेब पोर्टल है, पर किया है। ऑनलाइन या ऑफलाइन कर अदा करते ही पंचायत सचिव जल करदाताओं (नल कनेक्शन धारक) को ई-रसीद प्रदान कर रहा है। इतना ही नहीं यह गांव वीडब्ल्यूएससी मध्य प्रदेश जल निगम को समय पर थोक जल शुल्क (3.25 प्रति हजार लीटर) का भुगतान भी नियमित करता है।
Amrit Sandesh 02 July,2023