Wednesday, January 10, 2018

गांधीजी के 150वीं जन्मशताब्दी पर आकर्षक कैलेन्डर


सत्य और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के 150वीं जन्मशताब्दी वर्ष पर गांधी भवन न्यास, ग्राम सेवा समिति और गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति राजघाट , नई दिल्ली की ओर से एक कैलेन्डर का प्रकाशन संयुक्त रूप से किया गया है, जिसमें महात्मा गांधी के विचारों और उनके आदर्शों को विशेष स्थान दिया गया है। इस कैलेन्डर का लोकार्पण गांधी भवन न्यास परिसर में एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रनसिंह परमार, गांधी भवन न्यासी सचिव नामदेव, पत्रकारों एवं युवाओं के  हाथों हुआ। कैलेन्डर में वर्ष 2018 और 2019 की तिथियों के साथ-साथ युवाओं को प्रेरित करने वाले गांधीजी के संदेशों को भी अंकित किया गया हैं।

Friday, January 5, 2018

स्कूलों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम(Right to Education Act (RTE) की धारा 21 का उल्लंघन



स्कूलों में  शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 21 का उल्लंघन
रूबी सरकार

 शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 21 में शासकीय और शासन से अनुदान प्राप्त प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं में शाला प्रबंधन समिति (एसएमसी) का गठन अनिवार्य किय गया है, जिसमें शाला में अध्ययनरत बच्चों के माता-पिता या संरक्षक और शिक्षकों तथा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को  सदस्य बनाने की बात कही गई हैं।
समय-समय पर मध्यप्रदेश शासन ने इस अधिनियम में कई संशोधन किये। 26 मई 2014 को मध्यप्रदेश शासन ने इस अधिनियम में पुन: संशोधन करते हुए  16 जून 2017 को शासकीय एवं अनुदान प्राप्त प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं के आगामी दो सत्रों के लिए 1 से 3 जुलाई तक शाला प्रबंधन समिति गठन किये जाने का सरकुलर जारी किया।  साथ ही नवगठित समिति की पहली बैठक 15 जुलाई को होनी तय की गई। इसके पीछे मूल भावना यह रही, कि  स्थानीय स्तर पर शालाओं के संचालन में समुदाय की भागीदारी हो सके, जिससे इस कानून को प्रभावी रूप से जनसहभागिता के साथ लागू किया जा सके और बच्चों की शिक्षा के प्रति अभिभावक सजग रहें।
लेकिन जब मध्यप्रदेश  लोक सहभागी साझा मंच ने प्रदेश के 8 जिलों के 85 शालाओं में इसकी ह$कीकत जानने की कोशिश की, तो पाया, कि शाला प्रबंध समिति की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद अभी तक कई शालाओं में इसका गठन नहीं किया गया है और अगर गठन हुआ भी है, तो अनेक कारणों से वे अपनी भूमिका नहीं निभा रहे हैं। महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट 2017 में भी कहा गया है, कि  मध्यप्रदेश के 12 फीसदी शालाओं में शाला प्रबंधन समिति का गठन ही नहीं हुआ है और 77 फीसदी शालाओं में विद्यालय विकास योजना तैयार ही नहीं की गई है। 13 शाला ऐसे हैं, जिसमें समिति के चयनित सदस्य शिक्षक स्वयं हैं।
साझा मंच के संयोजक जावेद अनीष ने बताया, कि शालाओं ने समिति के गठन में प्राथमिक शाला के समिति में कुल 18 सदस्यों में, 14 उस शाला में पढऩे वाले बच्चों के पालक-अभिभावक होंगे, जिसमें वंचित, कमजोर वर्ग के पालकों-अभिभावकों का भी प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा तथा 14 पालक-अभिभावक के सदस्यों में से 6 सदस्य वंचित वर्ग, 3 कमजोर वर्ग, 5 अन्य वर्ग  के साथ ही पूरे सदस्यों में 50 फीसदी महिलाएं सदस्य होंगीं। जबकि मौके पर इन नियमों का  उल्लंघन पाया गया । कुल 85 शालाओं में से 37 शालाओं ने प्रक्रियाओं का पालन न करते हुए वंचित, कमजोर वर्ग के पालकों अभिभावकों के प्रतिनिधित्व की संख्या की गणना नोटिस बोर्ड में नहीं प्रदर्शित की । वहीं 48 शालाओं में वंचित, कमजोर वर्ग के पालकों-अभिभावकों के प्रतिनिधित्व की संख्या की गणना कर नोटिस बोर्ड में प्रदर्शित किये गये थे। साथ ही 85 शालाओं में से 72 शालाओं में शाला प्रबंधन समिति का गठन अभिभावक, शिक्षक और समुदाय के समक्ष हुआ, जबकि 13 शालाओं में शाला प्रबंधन समिति में चयनित सदस्यों को शिक्षकों द्वारा होना पाया गया ।

साझा मंच के उपासना बेहार बताया, कि अध्ययन के दौरान यह देखा गया, कि लगभग 70 शालाओं में जिन पालकों-अभिभावकों का चयन शाला प्रबंधन समिति के लिए हुआ है, वे समिति के गठन के दौरान उपस्थित थे, जबकि 15 शालाओं में सभी चयनित सदस्यों में से कुछ  सदस्य अनुपस्थित थे।  अध्ययनरत 85 शालाओं में से 56 शालाओं में नवनिर्मित शाला प्रबंधन समिति की बैठक होना पाया गया, जिसमें 49 शालाओं में 15 जुलाई, 3 शालाओं में 17 जुलाई और 4 शालाओं में क्रमश: 4 जुलाई, 10 जुलाई, 12 जुलाई को शाला प्रबंधन समिति की बैठक हुई थी, जबकि 29 शालाओं की नवनिर्मित शाला प्रबंधन समिति की बैठक ही नहीं हुई। 
मंच ने शासन से सिफारिश की है, कि प्रदेश के सभी शालाओं में शाला प्रबंधन समिति के गठन के साथ-साथ नियमित बैंठकें हों। सभी शालाओं में शाला प्रबंधन समिति के नवनिर्वाचित सदस्यों के नाम और संपर्क नोटिस बोर्ड में प्रदर्शित किया जाये और सघन संपर्क अभियान और प्रचार- प्रसार द्वारा शाला प्रबंधन समिति के सदस्यों को उनके अधिकार, भूमिकाएं, कार्य और जिम्मेदारियों के प्रति प्रेरित किया जाए, जिससे वे समिति में सक्रिय भागीदारी करें। इसके अलावा वंचित और गरीब परिवारों के सदस्यों को शाला प्रबंधन समिति के बैठक में आने में दिक्कत होती है, क्योंकि उनकी उस दिन की दिहाड़ी मारी जाती है इसलिए इनकी भागीदारी बढऩे के लिए सदस्यों को न्यूनतम दैनिक मजदूरी के बराबर विशेष मानदेय दिया जाए, जिससे वो इन बैठकों में भागीदारी कर सकें।
प्रदेश के सभी शाला प्रबंधन समिति के नवनिर्वाचित सदस्यों को गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण दिया जाए, जिससे वे शिक्षा अधिकार कानून, शाला प्रबंधन समिति, उनके कार्य व जिम्मेदारियों आदि को समझ सकेगें और शाला के विकास में बेहतर तरीके से अपना योगदान दे पायेगें।
गौरतलब है, कि साझा मंच ने यह अध्ययन रीवा, सतना, शहडोल, जबलपुर, छतरपुर, दमोह, मंडला, शिवपुरी के कुल 85 शालाओं में किया है। अध्ययन किये गए शालाओं में 64 प्राथमिक शाला और 21 माध्यमिक शाला हैं।


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पोषण आहार की नई नीति पर सरकार की चुप्पी ?


 पोषण आहार की नई नीति पर सरकार की चुप्पी ?
रूबी सरकार
कुपोषण खत्म करने को लम्बे अर्से से सक्रिय एक साथी ने सवाल उठाया है, कि  मध्यप्रदेश में बच्चों के पोषण आहार अनुबंध खत्म हो जाने के बाद भी मुनाफाखोर कंपनियों को काम जारी रखने का अवसर देने का मतलब ! उच्च न्यायालय  की अवमानना के साथ क्या चुनावी फंडिंग भी है इसकी एक वजह । अब तक पोषण नीति क्यों नहीं बनी।
आंगनवाडिय़ों में पोषण आहार व्यवस्था में विकेन्द्रीकरण की नीति को उच्च न्यायालय  के आदेश के बाद इस व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर स्व. सहायता समूहों को सौंपना होगा, लेकिन अब तक सिर्फ महिला समूहों को काम सौंपने की झूठी घोषणा ही हो रही है। पोषण नीति क्यों नहीं बनी। इससे बच्चों को बेहतर और उनकी पसंद का पोषण आहार मिल सकेगा। इस संबंध में 11 बिंदुओं पर सुझाव भी हैं। उच्च न्यायालय ने इन तर्कों का संज्ञान लिया, कि  सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अक्टूबर 2004 को निर्देश दिए थे, कि एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस)में ठेकेदार उपयोग में नहीं लाये जायेंगे, आईसीडीएस की राशि का उपयोग ग्राम समितियों, स्वयं सहायता समूहों और महिला मण्डलों के जरिये क्रियान्वयन के लिए किया जाएगा । इससे पहले  13 दिसंबर 2006 को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, कि सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को यह शपथ पत्र दाखिल करना होगा, कि आंगनवाड़ी पोषण आहार की आपूर्ति में ठेकेदारों को शामिल न करने के  निर्देश पर उन्होंने क्या कदम उठाये।
इधर, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने पीयूसीएल के इस तर्क का संज्ञान लिया है, कि  मध्यप्रदेश में स्वयं सहायता समूह पोषण आहार बनाए और वितरण का काम कर रहे हैं, ऐसे में टेक होम राशन बनाने और उसके वितरण का काम भी उन्हें की सौंपा जाये।
फिलहाल उच्चतम न्यायालय की गाइडलाइन का पालन करते हुए  प्रदेश सरकार ने पोषाहार आपूर्ति के लिए नई नीति के अंतर्गत निविदा दस्तावेज को अंतिम रूप दिया जा रहा है। लेकिन इसमें पेंच न्यायालय की गाइडलाइन के पात्रता शर्तों के मुताबिक स्व. सहायता समूहों की कमजोरी से कंपनियां घुसपैट कर सकती हैं।
समूहों के पात्रता में सबसे बड़ी दिक्कत उनका निर्माता एजेंंसी नहीं होना है। गाइडलाइन के मुताबिक संबंधित एजेंसी को निर्माता होना चाहिए। प्रदेश में जो स्व सहायता समूह हैं, वह इतने बड़े पैमाने पर मध्यान्ह भोजन के निर्माण व आपूर्ति का अनुभव ही नहीं रखते ।
नई नीति में यह प्रावधान किया गया है, कि यदि पात्र स्व सहायता समूह नहीं मिलता है, तो वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकेगी। इसमें कंपनियों के लिए राह निकल सकती है। इसमें स्व सहायता समूह को पैरेंट एजेंसी  तथा कंपनी को सब ऐजेंसी के रूप में काम देने का प्रावधान निविदा दस्तावेज में शामिल कर सकते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता राकेश मालवीय बताते हैं, कि सरकार को नीति बनाने की प्रक्रिया में संस्थाओं, बाल अधिकार समूहों, पोषण-खाद्य सुरक्षा के अधिकार पर काम कर रही संस्थाओं और संगठनों से संवाद करना चाहिए। श्री मालवीय ने कहा, ऐसी व्यवस्था बने, जिससे वास्तविक महिला समूहों को काम मिले और
समूहों के चुनाव की प्रक्रिया पारदर्शी हो तथा हर समूह की विश्वसनीयता समुदाय के स्तर पर भी जाँची जाए।
नई नीति में हितों के टकराव को खत्म किया जाना चाहिए। समूहों का किसी व्यापारिक संस्थान, राजनीतिक दल, प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से सम्बन्ध न हो। साथ ही महिला समूहों की क्षमता वृद्धि, बिना ब्याज का लम्बी अवधि का ऋण, अधोसंरचना स्थापित करने, तकनीक को समझने और पोषण की गुणवत्ता के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। विकासखण्ड स्तर पर पोषणाहार उत्पादन की व्यवस्था बनायी जाए और पोषण आहार में स्थानीय खाद्य सामग्रियों, पारंपरिक अनाजों, दालों, वनों से मिलने वाले उत्पादों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। आंगनवाड़ी में उपलब्ध होने वाले गरम पके हुए भोजन में भी स्थानीय सामग्रियों को शामिल किये जाने के साथ ही नई व्यवस्था में सशक्त सामाजिक अंकेक्षण और सशक्त सामुदायिक निगरानी का प्रावधान होना अनिवार्य हो । इसके अलावा टेक होम राशन का उत्पादन पकाने वाली महिलाओं को कुशल श्रम की मजदूरी का प्रावधान भी होना चाहिए।
 गौरतलब है, कि न्यायालय के  जवाब में सरकार ने पोषण आहार व्यवस्था स्व सहायता समूहों केा देने के फैसले के साथ ही नई व्यवस्था में ग्लोबल टेंडरिंग का हवाला दिया है।

मध्यप्रदेश में आंगनवाडिय़ों के जरिए 6 साल तक के बच्चों और गर्भवती तथा धात्री माताओं को पोषणआहार दिया जाता है। यह काम अब तक तीन बड़ी कंपनियां करती आई हैं। इस पोषण आहार का लाभ बच्चों को नहीं मिल पा रहा हैए इसकी गुणवत्ता पर भी सवाल होते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने आदेश में गरम पका हुआ भोजन वितरित करने को कहा है। सरकार ने इस पर यह निर्णय लिया था, कि इस व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण किया जाएगा, लेकिन एक संस्था की जनहित याचिका पर इस निर्णय पर स्थगन ले लिया गया था। 13 सितम्बर को कोर्ट ने इस स्थगन को खारिज करते हुए विकेन्द्रित व्यवस्था अपनाने का आदेश देकर एक माह में नई नीति बनाने को कहा है।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने पीयूसीएल के इस तर्क का संज्ञान लिया है, कि चूंकि वैसे की मध्यप्रदेश में स्वयं सहायता समूह पोषण आहार बनाए और वितरण का काम कर रहे हैं, ऐसे में टेक होम राशन बनाने और उसके वितरण का काम भी उन्हें की सौंपा जा सकता है, यह काम एम पी एग्रो या इसके संयुक्त उपक्रमों के जरिये किये जाने की जरूरत नहीं है।
चूंकि मौजूदा ठेकेदार व्यवस्था का अनुबंध 31 मार्च 2017 को खत्म हो चुका है, तो मध्यप्रदेश सरकार उसे बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं है और वह कोई भी नीतिगत निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। पोषण आहार में विकेन्द्रीकरण इसलिए जरूरी है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर स्व. सहायता समूहों के हाथ में काम होने पर समुदाय और महिलाएं स्थानीय स्तर पर अपने बच्चों के लिए बनाये जा रहे भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्था की निगरानी कर पाएंगी। स्वयं सहायता समूह वे समूह हैं, जो महिलाएं आपस में जुड़ कर अपने सशक्तीकरण के लिए बनाती हैं।



आदेश के बिंदु

 क- मध्यप्रदेश सरकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पीयूसीएल बनाम भारत सरकार के केस (196/2001) में दिए गए निर्देशों, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून और भारत सरकार के निर्देशों के तारतम्य में पोषण आहार की नीति बनाए।
 ख- पूर्व में जो आपूर्तिकर्ता और उत्पादक टेक होम राशन की आपूर्ति कर रहे थे, उनका अनुबंध 31 मार्च 2017 को पूरा हो चुका है, अत: मौजूदा प्लांट, उत्पादन, वितरण और आपूर्ति को जारी रखने का आदेश देने के लिए दाखिल की गई याचिका को निराकृत किया जाता है।
ग-मध्यप्रदेश सरकार पोषण आहार पर नीतिगत निर्णय लें और 30 दिन में नई व्यवस्था बनायें।

Thursday, December 7, 2017

BHEEM KUND Chhatarpur

आपदा से पहले संकेत देने वाला कुंड



बड़ा मलहरा विकास खण्ड ,सागर-छतरपुर (मध्य प्रदेश) राजमार्ग  पर  भीमकुण्ड सुरम्य पहाडिय़ों के बीच स्थित है। यह  कुण्ड बुंदेलखण्ड के प्रमुख तीर्थेंा में से एक है।  वैसे तो देखने में एक साधारण कुण्ड लगता है,लेकिन इसकी खासियत है कि जब भी एशियाई महाद्वीप में कोई प्राकृतिक आपदा घटने वाली होती है तो इस कुण्ड का जलस्तर पहले ही खुद.ब.खुद बढऩे लगता है । इस कुण्ड का पुराणों में नीलकुण्ड के नाम से उल्लेख मिलता है, जबकि  अब इसे भीमकुण्ड के नाम से जाना जाता हैं। ऐसा माना जाता है, कि यहां स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं। मकर संक्रांति पर यहां डुबकी लगाने का रविशेष महत्व माना जाता है। 18वीं शताब्दी के अंतिम दशक में विजावर रियासत के  राजा ने यहां मेले का आयोजन किया । तब से प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर यहां भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।

अब तक मापी नहीं जा सकी है कुण्ड की गहराई


भीमकुण्ड की गहराई अब तक नहीं मापी जा सकी है। कुण्ड के चमत्कारिक गुणों का पता चलते ही डिस्कवरी चैनल की एक टीम कुण्ड की गहराई मापने के लिए आई थी, लेकिन ये इतना गहरा है, कि वे जितना नीचे गए उतना ही अंदर और इसका पानी दिखाई दिया। बाद में टीम वापिस लौट गई।

रोचक इतिहास

कहते हैं अज्ञातवास के दौरान एक बार भीम को प्यास लगीए काफी तलाशने के बाद भी जब पानी नहीं मिला तो भीम ने जमीन में अपनी गदा पूरी शक्ति से मारीए जिससे इस कुण्ड से पानी निकल आयाण् इसलिए इसे भीमकुण्ड कहा जाता है।

भौगोलिक घटना से पहले देता है संकेत










जब भी कोई भौगोलिक घटना होने वाली होती है यहां का जलस्तर बढऩे लगता हैए जिससे क्षेत्रीय लोग प्राकृतिक आपदा का पहले ही अनुमान लगा लेते हैंण् नोएडा और गुजरात में आए भूकंप के दौरान भी यहां का जलस्तर बढ़ा थाण् सुनामी के दौरान तो कुण्ड का जल 15 फीट ऊपर तक आ गया था।

Khajuraho- Matangeshwar Mandeer


खजुराहो चंदेल साम्राज्य की सांस्कृतिक राजधानी था। पर्यटन, ज्ञानअर्जन तथा अध्यात्मिक दृष्टि से यह दुनियां के श्रेष्ठतम नगरों में से एक है। चंदेल राजाओं द्वारा बनवाये गये मंदिरों में मतंगेश्वर  पहला मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण हर्षवर्मन ने 920 ई. के लगभग करवाया था। खजुराहो के पुरातत्व मंदिरों में यह ही एक मात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें आज भी पूजा-पाठ होता है तथा लोकमत के अनुसार निर्माण काल से निरंतर होता आया है। यह खजुराहो का पवित्रतम मंदिर है । मंदिर के बारे में मान्यता है, कि इसमें सबसे पहले महाराजा हर्षवर्मन ने मरकतमणी नामक मणि  की स्थापना की थी, इस मणि को भगवान शिव ने खुद सुधिष्ठिर को दिया था और युधिष्ठिर से ही चलकर यह मणि हर्षवर्मन तक पहुंची थी इस मणि की स्थापना के बाद ही वृहत जंघा तथा लिंग की स्थापना की गई थी। जंघा का व्यास 7.2 है एवं इसमें स्थित लिंग 2.5 मीटर ऊंचा तथा 1.1 मीटर व्यास का लिंग है, जो अपने तरह का एक ही है।
बालू पत्थर का बना हुआ यह मंदिर शिल्पकारी की दृष्टि से बहुत ही साधारण है, रचना की दृष्टि से ब्रह्मा मंदिर का ही विशाल रूप है। ऊंची जगती के ऊपर सामने सीढिय़ों से सुसज्जित गर्भगृह का द्वार है। गर्भगृह में जंघा एवं शिवलिंग की स्थापना है। मंदिर की छत वर्गाकार सुंदर तथा विशाल है। गर्भगृह के तीन और अहातेदार झरोखे हैं, जिनमें से उत्तरी झरोखे से होकर नीचे की ओर सीढिय़ां बनी है। मंदिर का एक ही शिखर  सूच्याकार या पिरामिड शैली का है। प्रवेश द्वार के ऊपर शिखर पर गड़े हुए मुकुट से शिखर का सौन्दर्य द्विगुणित हो जाता है। मंदिर के चबूतरे के दक्षिण ओर 1880 में बना हुआ संग्रहालय दिखाई देता है, जो अब पुरातत्व विभाग का अवशेष भण्डार है।