Friday, January 5, 2018

पोषण आहार की नई नीति पर सरकार की चुप्पी ?


 पोषण आहार की नई नीति पर सरकार की चुप्पी ?
रूबी सरकार
कुपोषण खत्म करने को लम्बे अर्से से सक्रिय एक साथी ने सवाल उठाया है, कि  मध्यप्रदेश में बच्चों के पोषण आहार अनुबंध खत्म हो जाने के बाद भी मुनाफाखोर कंपनियों को काम जारी रखने का अवसर देने का मतलब ! उच्च न्यायालय  की अवमानना के साथ क्या चुनावी फंडिंग भी है इसकी एक वजह । अब तक पोषण नीति क्यों नहीं बनी।
आंगनवाडिय़ों में पोषण आहार व्यवस्था में विकेन्द्रीकरण की नीति को उच्च न्यायालय  के आदेश के बाद इस व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर स्व. सहायता समूहों को सौंपना होगा, लेकिन अब तक सिर्फ महिला समूहों को काम सौंपने की झूठी घोषणा ही हो रही है। पोषण नीति क्यों नहीं बनी। इससे बच्चों को बेहतर और उनकी पसंद का पोषण आहार मिल सकेगा। इस संबंध में 11 बिंदुओं पर सुझाव भी हैं। उच्च न्यायालय ने इन तर्कों का संज्ञान लिया, कि  सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अक्टूबर 2004 को निर्देश दिए थे, कि एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस)में ठेकेदार उपयोग में नहीं लाये जायेंगे, आईसीडीएस की राशि का उपयोग ग्राम समितियों, स्वयं सहायता समूहों और महिला मण्डलों के जरिये क्रियान्वयन के लिए किया जाएगा । इससे पहले  13 दिसंबर 2006 को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, कि सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को यह शपथ पत्र दाखिल करना होगा, कि आंगनवाड़ी पोषण आहार की आपूर्ति में ठेकेदारों को शामिल न करने के  निर्देश पर उन्होंने क्या कदम उठाये।
इधर, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने पीयूसीएल के इस तर्क का संज्ञान लिया है, कि  मध्यप्रदेश में स्वयं सहायता समूह पोषण आहार बनाए और वितरण का काम कर रहे हैं, ऐसे में टेक होम राशन बनाने और उसके वितरण का काम भी उन्हें की सौंपा जाये।
फिलहाल उच्चतम न्यायालय की गाइडलाइन का पालन करते हुए  प्रदेश सरकार ने पोषाहार आपूर्ति के लिए नई नीति के अंतर्गत निविदा दस्तावेज को अंतिम रूप दिया जा रहा है। लेकिन इसमें पेंच न्यायालय की गाइडलाइन के पात्रता शर्तों के मुताबिक स्व. सहायता समूहों की कमजोरी से कंपनियां घुसपैट कर सकती हैं।
समूहों के पात्रता में सबसे बड़ी दिक्कत उनका निर्माता एजेंंसी नहीं होना है। गाइडलाइन के मुताबिक संबंधित एजेंसी को निर्माता होना चाहिए। प्रदेश में जो स्व सहायता समूह हैं, वह इतने बड़े पैमाने पर मध्यान्ह भोजन के निर्माण व आपूर्ति का अनुभव ही नहीं रखते ।
नई नीति में यह प्रावधान किया गया है, कि यदि पात्र स्व सहायता समूह नहीं मिलता है, तो वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकेगी। इसमें कंपनियों के लिए राह निकल सकती है। इसमें स्व सहायता समूह को पैरेंट एजेंसी  तथा कंपनी को सब ऐजेंसी के रूप में काम देने का प्रावधान निविदा दस्तावेज में शामिल कर सकते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता राकेश मालवीय बताते हैं, कि सरकार को नीति बनाने की प्रक्रिया में संस्थाओं, बाल अधिकार समूहों, पोषण-खाद्य सुरक्षा के अधिकार पर काम कर रही संस्थाओं और संगठनों से संवाद करना चाहिए। श्री मालवीय ने कहा, ऐसी व्यवस्था बने, जिससे वास्तविक महिला समूहों को काम मिले और
समूहों के चुनाव की प्रक्रिया पारदर्शी हो तथा हर समूह की विश्वसनीयता समुदाय के स्तर पर भी जाँची जाए।
नई नीति में हितों के टकराव को खत्म किया जाना चाहिए। समूहों का किसी व्यापारिक संस्थान, राजनीतिक दल, प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से सम्बन्ध न हो। साथ ही महिला समूहों की क्षमता वृद्धि, बिना ब्याज का लम्बी अवधि का ऋण, अधोसंरचना स्थापित करने, तकनीक को समझने और पोषण की गुणवत्ता के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। विकासखण्ड स्तर पर पोषणाहार उत्पादन की व्यवस्था बनायी जाए और पोषण आहार में स्थानीय खाद्य सामग्रियों, पारंपरिक अनाजों, दालों, वनों से मिलने वाले उत्पादों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। आंगनवाड़ी में उपलब्ध होने वाले गरम पके हुए भोजन में भी स्थानीय सामग्रियों को शामिल किये जाने के साथ ही नई व्यवस्था में सशक्त सामाजिक अंकेक्षण और सशक्त सामुदायिक निगरानी का प्रावधान होना अनिवार्य हो । इसके अलावा टेक होम राशन का उत्पादन पकाने वाली महिलाओं को कुशल श्रम की मजदूरी का प्रावधान भी होना चाहिए।
 गौरतलब है, कि न्यायालय के  जवाब में सरकार ने पोषण आहार व्यवस्था स्व सहायता समूहों केा देने के फैसले के साथ ही नई व्यवस्था में ग्लोबल टेंडरिंग का हवाला दिया है।

मध्यप्रदेश में आंगनवाडिय़ों के जरिए 6 साल तक के बच्चों और गर्भवती तथा धात्री माताओं को पोषणआहार दिया जाता है। यह काम अब तक तीन बड़ी कंपनियां करती आई हैं। इस पोषण आहार का लाभ बच्चों को नहीं मिल पा रहा हैए इसकी गुणवत्ता पर भी सवाल होते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने आदेश में गरम पका हुआ भोजन वितरित करने को कहा है। सरकार ने इस पर यह निर्णय लिया था, कि इस व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण किया जाएगा, लेकिन एक संस्था की जनहित याचिका पर इस निर्णय पर स्थगन ले लिया गया था। 13 सितम्बर को कोर्ट ने इस स्थगन को खारिज करते हुए विकेन्द्रित व्यवस्था अपनाने का आदेश देकर एक माह में नई नीति बनाने को कहा है।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने पीयूसीएल के इस तर्क का संज्ञान लिया है, कि चूंकि वैसे की मध्यप्रदेश में स्वयं सहायता समूह पोषण आहार बनाए और वितरण का काम कर रहे हैं, ऐसे में टेक होम राशन बनाने और उसके वितरण का काम भी उन्हें की सौंपा जा सकता है, यह काम एम पी एग्रो या इसके संयुक्त उपक्रमों के जरिये किये जाने की जरूरत नहीं है।
चूंकि मौजूदा ठेकेदार व्यवस्था का अनुबंध 31 मार्च 2017 को खत्म हो चुका है, तो मध्यप्रदेश सरकार उसे बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं है और वह कोई भी नीतिगत निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। पोषण आहार में विकेन्द्रीकरण इसलिए जरूरी है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर स्व. सहायता समूहों के हाथ में काम होने पर समुदाय और महिलाएं स्थानीय स्तर पर अपने बच्चों के लिए बनाये जा रहे भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्था की निगरानी कर पाएंगी। स्वयं सहायता समूह वे समूह हैं, जो महिलाएं आपस में जुड़ कर अपने सशक्तीकरण के लिए बनाती हैं।



आदेश के बिंदु

 क- मध्यप्रदेश सरकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पीयूसीएल बनाम भारत सरकार के केस (196/2001) में दिए गए निर्देशों, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून और भारत सरकार के निर्देशों के तारतम्य में पोषण आहार की नीति बनाए।
 ख- पूर्व में जो आपूर्तिकर्ता और उत्पादक टेक होम राशन की आपूर्ति कर रहे थे, उनका अनुबंध 31 मार्च 2017 को पूरा हो चुका है, अत: मौजूदा प्लांट, उत्पादन, वितरण और आपूर्ति को जारी रखने का आदेश देने के लिए दाखिल की गई याचिका को निराकृत किया जाता है।
ग-मध्यप्रदेश सरकार पोषण आहार पर नीतिगत निर्णय लें और 30 दिन में नई व्यवस्था बनायें।

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